अब लगि मोहि न मिलेउ कोउ

दोहा १६१ (क) · बालकाण्ड

दोहा पाठ

अब लगि मोहि न मिलेउ कोउ मैं न जनावउँ काहु। लोकमान्यता अनल सम कर तप कानन दाहु॥ १६१ (क) ॥

अर्थ

अब तक न तो कोई मुझसे मिला और न मैं अपने को किसी पर प्रकट करता हूँ; क्योंकि लोकमान्यता अग्नि के समान है, जो तप-रूपी वन को भस्म कर डालती है।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “प्रतापभानु की कथा” प्रकरण का दोहा १६१ (क) है। इस प्रकरण में राजा प्रतापभानु के छल द्वारा विपथित होने और ब्राह्मण-शाप से उनके विनाश का वर्णन है।

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प्रतापभानु की कथा