सचिव धरमरुचि हरि पद प्रीती
सचिव धरमरुचि हरि पद प्रीती
चौपाई २, दोहा १५५ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सचिव धरमरुचि हरि पद प्रीती। नृप हित हेतु सिखव नित नीती॥ गुर सुर संत पितर महिदेवा। करइ सदा नृप सब कै सेवा॥ २ ॥
अर्थ
धर्मरुचि मन्त्री का श्रीहरि के चरणों में प्रेम था। वह राजा के हित के लिए सदा उसको नीति सिखाया करता था। राजा गुरु, देवता, संत, पितर और ब्राह्मण--इन सब की सदा सेवा करता रहता था।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “प्रतापभानु की कथा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १५५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजा प्रतापभानु के छल द्वारा विपथित होने और ब्राह्मण-शाप से उनके विनाश का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
प्रतापभानु की कथा