बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं
बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं
चौपाई ४, दोहा १६७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं। गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं॥ जलधि अगाध मौलि बह फेनू। संतत धरनि धरत सिर रेनू॥ ४ ॥
अर्थ
बड़े लोग छोटों पर स्नेह करते ही हैं। पर्वत अपने सिरों पर सदा तृण (घास) को धारण किये रहते हैं। अगाध समुद्र अपने मस्तक पर फेन को धारण करता है, और धरती अपने सिर पर सदा धूलि को धारण किये रहती है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “प्रतापभानु की कथा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १६७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजा प्रतापभानु के छल द्वारा विपथित होने और ब्राह्मण-शाप से उनके विनाश का वर्णन है।
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प्रतापभानु की कथा