रावणादि का जन्म, तपस्या और उनका ऐश्वर्य तथा अत्याचार
शाप के परिणामस्वरूप रावण, कुंभकर्ण, विभीषण आदि का जन्म होता है। तपस्या से वर पाकर रावण महान ऐश्वर्य प्राप्त करता है, पर बाद में अत्याचार से तीनों लोकों को संतप्त करता है।
बालकाण्ड · प्रकरण ३४ / ५९
प्रकरण पाठ
एवमस्तु तुम्ह बड़ तप कीन्हा। मैं ब्रह्माँ मिलि तेहि बर दीन्हा॥ पुनि प्रभु कुंभकरन पहिं गयऊ। तेहि बिलोकि मन बिसमय भयऊ॥ ३ ॥
अर्थ:
[शिवजी कहते हैं कि--] मैंने और ब्रह्मे ने मिलकर उसे वर दिया कि ऐसा ही हो, तुमने बड़ा तप किया है। फिर ब्रह्माजी कुम्भकर्ण के पास गये। उसे देखकर उनके मन में बड़ा आश्चर्य हुआ।
गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी। बिधि निर्मित दुर्गम अति भारी॥ सोइ मय दानवँ बहुरि सँवारा। कनक रचित मनिभवन अपारा॥ ३ ॥
अर्थ:
समुद्र के बीच में त्रिकूट नामक पर्वत पर ब्रह्मा का बनाया हुआ एक बड़ा भारी किला था। [महान् मायावी और निपुण कारीगर] मय दानव ने उसे फिर से सजा दिया। उसमें मणियों से जड़े हुए सोने के अनगिनत महल थे।
भोगावति जसि अहिकुल बासा। अमरावति जसि सक्रनिवासा॥ तिन्ह तें अधिक रम्य अति बंका। जग बिख्यात नाम तेहि लंका॥ ४ ॥
अर्थ:
जैसी नागकुल के रहने की [पाताललोक में] भोगावती पुरी है और इन्द्र के रहने की [स्वर्गलोक में] अमरावती पुरी है, उनसे भी अधिक सुन्दर और बाँका वह दुर्ग था। जगत् में उसका नाम लंका प्रसिद्ध हुआ।
फिरि सब नगर दसानन देखा। गयउ सोच सुख भयउ बिसेषा॥ सुंदर सहज अगम अनुमानी। कीन्हि तहाँ रावन रजधानी॥ ३ ॥
अर्थ:
तब रावण ने घूम-फिरकर सारा नगर देखा, उसकी [स्थानसम्बन्धी] चिन्ता मिट गयी और उसे बहुत ही सुख हुआ। उस पुरी को स्वाभाविक ही सुन्दर और [बाहरवालों के लिये] दुर्गम जानकर रावण ने वहाँ अपनी राजधानी कायम की।
मेघनाद कहुँ पुनि हँकरावा। दीन्ही सिख बलु बयरु बढ़ावा॥ जे सुर समर धीर बलवाना। जिन्ह कें लरिबे कर अभिमाना॥ १ ॥
अर्थ:
फिर उसने मेघनाद को बुलवाया और सिखा-पढ़ाकर उसके बल और [देवताओं के प्रति] वैरभाव को उत्तेजना दी। [फिर कहा--] हे पुत्र! जो देवता रण में धीर और बलवान् हैं और जिन्हें लड़ने का अभिमान है।
चलत दसानन डोलति अवनी। गर्जत गर्भ स्रवहिं सुर रवनी॥ रावन आवत सुनेउ सकोहा। देवन्ह तके मेरु गिरि खोहा॥ ३ ॥
अर्थ:
रावण के चलने से पृथ्वी डगमगाने लगी और उसकी गर्जना से देवरमणियों के गर्भ गिरने लगे। रावण को क्रोध सहित आते हुए सुनकर देवताओं ने सुमेरु पर्वत की गुफाएँ तकीं (भागकर सुमेरु की गुफाओं का आश्रय लिया)।
किंनर सिद्ध मनुज सुर नागा। हठि सबही के पंथहिं लागा॥ ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनुधारी। दसमुख बसबर्ती नर नारी॥ ६ ॥
अर्थ:
किन्नर, सिद्ध, मनुष्य, देवता और नाग--सभी के पीछे वह हठपूर्वक पड़ गया (किसी को भी उसने शान्तिपूर्वक नहीं बैठने दिया)। ब्रह्माजी की सृष्टि में जहाँ तक शरीरधारी स्त्री-पुरुष थे, सभी रावण के अधीन हो गये।
इंद्रजीत सन जो कछु कहेऊ। सो सब जनु पहिलहिं करि रहेऊ॥ प्रथमहिं जिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा। तिन्ह कर चरित सुनहु जो कीन्हा॥ १ ॥
अर्थ:
इंद्रजीत से उसने जो कुछ कहा, उसे उसने मानो पहले से ही कर रखा था (अर्थात् रावण के कहने भर की देर थी, उसने आज्ञापालन में तनिक भी देर नहीं की)। जिनको पहले ही आज्ञा दे रखी थी, उन्होंने जो करतूतें कीं उन्हें सुनो--।
सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई। देव बिप्र गुरु मान न कोई॥ नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना। सपनेहुँ सुनिअ न बेद पुराना॥ ४ ॥
अर्थ:
[उनके डर से] कहीं भी शुभ आचरण नहीं होते थे। देवता, ब्राह्मण और गुरु को कोई नहीं मानता था। न हरिभक्ति थी, न यज्ञ, तप और ज्ञान था। वेद और पुराण तो सपने में भी सुनने को नहीं मिलते थे।
जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा। आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा॥ अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहिं काना। तेहि बहुबिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना॥
अर्थ:
जप, योग, वैराग्य, तप तथा यज्ञ में [देवताओं के] भाग पाने की बात रावण कहीं कानों से सुन पाता, तो [उसी समय] स्वयं उठ दौड़ता। कुछ भी रहने नहीं पाता, वह सबको पकड़कर विध्वंस कर डालता था। संसार में ऐसा भ्रष्ट आचरण फैल गया कि धर्म तो कानों में भी सुनने में नहीं आता था; जो कोई वेद और पुराण कहता, उसको बहुत तरह से त्रास देता और देश से निकाल देता था॥।
जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी॥ अतिसय देखि धर्म कै ग्लानी। परम सभीत धरा अकुलानी॥ २ ॥
अर्थ:
[ श्रीशिवजी कहते हैं कि--] हे भवानी ! जिनके ऐसे आचरण हैं, उन सब प्राणियों को राक्षस ही समझना। इस प्रकार धर्म के प्रति [लोगों की] अत्यन्त ग्लानि देखकर पृथ्वी अत्यन्त भयभीत एवं व्याकुल हो गयी।
गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही। जस मोहि गरुअ एक परद्रोही॥ सकल धर्म देखइ बिपरीता। कहि न सकइ रावन भय भीता॥ ३ ॥
अर्थ:
[वह सोचने लगी कि] पर्वतों, नदियों और समुद्रों का बोझ मुझे इतना भारी नहीं जान पड़ता, जितना भारी मुझे एक परद्रोही (दूसरों का अनिष्ट करनेवाला) लगता है। पृथ्वी सारे धर्मों को विपरीत देख रही है, पर रावण से भयभीत हुई वह कुछ बोल नहीं सकती।