रावणादि का जन्म, तपस्या और उनका ऐश्वर्य तथा अत्याचार

शाप के परिणामस्वरूप रावण, कुंभकर्ण, विभीषण आदि का जन्म होता है। तपस्या से वर पाकर रावण महान ऐश्वर्य प्राप्त करता है, पर बाद में अत्याचार से तीनों लोकों को संतप्त करता है।

बालकाण्ड · प्रकरण ३४ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा। भयउ निसाचर सहित समाजा॥ दस सिर ताहि बीस भुजदंडा। रावन नाम बीर बरिबंडा॥ १ ॥

अर्थ:

हे मुनि! सुनो, समय पाकर वही राजा परिवार सहित रावण नामक राक्षस हुआ। उसके दस सिर और बीस भुजाएँ थीं और वह बड़ा ही प्रचण्ड शूरवीर था।

चौपाई

भूप अनुज अरिमर्दन नामा। भयउ सो कुंभकरन बलधामा॥ सचिव जो रहा धरमरुचि जासू। भयउ बिमात्र बंधु लघु तासू॥ २ ॥

अर्थ:

अरिमर्दन नामक जो राज का छोटा भाई था, वह बल का धाम कुम्भकर्ण हुआ। उसका जो मन्त्री था, जिसका नाम धर्मरुचि था, वह रावण का सौतेला छोटा भाई हुआ।

चौपाई

नाम बिभीषन जेहि जग जाना। बिष्नुभगत बिग्यान निधाना॥ रहे जे सुत सेवक नृप केरे। भए निसाचर घोर घनेरे॥ ३ ॥

अर्थ:

उसका विभीषण नाम था, जिसे सारा जगत्‌ जानता है। वह विष्णुभक्त और ज्ञान-विज्ञान का भण्डार था और जो राज के पुत्र और सेवक थे, वे सभी बड़े भयानक राक्षस हुए।

चौपाई

कामरूप खल जिनस अनेका। कुटिल भयंकर बिगत बिबेका॥ कृपा रहित हिंसक सब पापी। बरनि न जाहिं बिस्व परितापी॥ ४ ॥

अर्थ:

वे सब अनेकों जाति के, मनमाना रूप धारण करनेवाले, दुष्ट, कुटिल, भयंकर, विवेकरहित, निर्दयी, हिंसक, पापी और संसार भर को दुःख देनेवाले हुए; उनका वर्णन नहीं हो सकता।

दोहा

उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप। तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अघरूप॥ १७६ ॥

अर्थ:

यद्यपि वे पुलस्त्य ऋषि के पवित्र, निर्मल और अनुपम कुल में उत्पन्न हुए, तथापि ब्राह्मणों के शाप के कारण वे सब पापरूप हुए।

दोहा 177 के अंतर्गत
चौपाई

कीन्ह बिबिध तप तीनिहुँ भाई। परम उग्र नहिं बरनि सो जाई॥ गयउ निकट तप देखि बिधाता। मागहु बर प्रसन्न मैं ताता॥ १ ॥

अर्थ:

तीनों भाइयों ने अनेकों प्रकार की बड़ी ही कठिन तपस्या की, जिसका वर्णन नहीं हो सकता। [उनका उग्र] तप देखकर ब्रह्माजी उनके पास गये और बोले-हे तात! मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगो।

चौपाई

करि बिनती पद गहि दससीसा। बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा॥ हम काहू के मरहिं न मारें। बानर मनुज जाति दुइ बारें॥ २ ॥

अर्थ:

रावण ने विनय करके और चरण पकड़कर कहा-हे जगदीश्वर। सुनिये, वानर और मनुष्य-- इन दो जातियों को छोड़कर हम और किसी के मारे न मरें [यह वर दीजिये]।

चौपाई

एवमस्तु तुम्ह बड़ तप कीन्हा। मैं ब्रह्माँ मिलि तेहि बर दीन्हा॥ पुनि प्रभु कुंभकरन पहिं गयऊ। तेहि बिलोकि मन बिसमय भयऊ॥ ३ ॥

अर्थ:

[शिवजी कहते हैं कि--] मैंने और ब्रह्मे ने मिलकर उसे वर दिया कि ऐसा ही हो, तुमने बड़ा तप किया है। फिर ब्रह्माजी कुम्भकर्ण के पास गये। उसे देखकर उनके मन में बड़ा आश्चर्य हुआ।

चौपाई

जौं एहिं खल नित करब अहारू। होइहि सब उजारि संसारू॥ सारद प्रेरि तासु मति फेरी। मागेसि नीद मास षट केरी॥ ४ ॥

अर्थ:

जो यह दुष्ट नित्य आहार करेगा, तो सारा संसार ही उजाड़ हो जाएगा। [ऐसा विचारकर] ब्रह्माजी ने सरस्वती को प्रेरणा करके उसकी बुद्धि फेर दी। [जिससे] उसने छः महीने की नींद माँगी।

दोहा

गए बिभीषन पास पुनि कहेउ पुत्र बर मागु। तेहिं मागेउ भगवंत पद कमल अमल अनुरागु॥ १७७ ॥

अर्थ:

फिर ब्रह्माजी विभीषण के पास गये और बोले-हे पुत्र! वर माँगो। उसने भगवान् के चरणकमलों में निर्मल (निष्काम और अनन्य) प्रेम माँगा।

दोहा 178 के अंतर्गत
चौपाई

तिन्हहि देइ बर ब्रह्म सिधाए। हरषित ते अपने गृह आए॥ मय तनुजा मंदोदरि नामा। परम सुंदरी नारि ललामा॥ १ ॥

अर्थ:

उनको वर देकर ब्रह्माजी चले गये और वे अपने घर लौट आये। मय दानव की मन्दोदरी नाम की कन्या परम सुन्दरी और स्त्रियों में शिरोमणि थी।

चौपाई

सोइ मयँ दीन्हि रावनहि आनी। होइहि जातुधानपति जानी॥ हरषित भयउ नारि भलि पाई। पुनि दोउ बंधु बिआहेसि जाई॥ २ ॥

अर्थ:

मय ने उसे लाकर रावण को दिया। उसने जान लिया कि यह राक्षसों का राजा होगा। अच्छी स्त्री पाकर रावण प्रसन्न हुआ और फिर उसने जाकर दोनों भाइयों का विवाह कर दिया।

चौपाई

गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी। बिधि निर्मित दुर्गम अति भारी॥ सोइ मय दानवँ बहुरि सँवारा। कनक रचित मनिभवन अपारा॥ ३ ॥

अर्थ:

समुद्र के बीच में त्रिकूट नामक पर्वत पर ब्रह्मा का बनाया हुआ एक बड़ा भारी किला था। [महान् मायावी और निपुण कारीगर] मय दानव ने उसे फिर से सजा दिया। उसमें मणियों से जड़े हुए सोने के अनगिनत महल थे।

चौपाई

भोगावति जसि अहिकुल बासा। अमरावति जसि सक्रनिवासा॥ तिन्ह तें अधिक रम्य अति बंका। जग बिख्यात नाम तेहि लंका॥ ४ ॥

अर्थ:

जैसी नागकुल के रहने की [पाताललोक में] भोगावती पुरी है और इन्द्र के रहने की [स्वर्गलोक में] अमरावती पुरी है, उनसे भी अधिक सुन्दर और बाँका वह दुर्ग था। जगत् में उसका नाम लंका प्रसिद्ध हुआ।

दोहा

खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव। कनक कोट मनिखचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव॥ १७८ (क) ॥

अर्थ:

उसे चारों ओर से समुद्र की अत्यन्त गहरी खाई घेरे हुए है। उस [दुर्ग] के मणियों से जड़ा हुआ सोने का मजबूत परकोटा है, जिसकी कारीगरी का वर्णन नहीं किया जा सकता।

दोहा

हरि प्रेरित जेहिं कलप जोइ जातुधानपति होइ। सूर प्रतापी अतुलबल दल समेत बस सोइ॥ १७८ (ख) ॥

अर्थ:

भगवान् की प्रेरणा से जिस कल्प में जो राक्षसों का राजा (रावण) होता है, वही शूर, प्रतापी, अतुल बलवान्, दल सहित उसी [लंका] में बसता है।

दोहा 179 के अंतर्गत
चौपाई

रहे तहाँ निसिचर भट भारे। ते सब सुरन्ह समर संघारे॥ अब तहँ रहहिं सक्र के प्रेरे। रच्छक कोटि जच्छपति केरे॥ १ ॥

अर्थ:

[पहले] वहाँ बड़े-बड़े योद्धा राक्षस रहते थे। देवताओं ने उन सबको युद्ध में मार डाला। अब इन्द्र की प्रेरणा से वहाँ कुबेर के करोड़ों रक्षक (यक्ष लोग) रहते हैं—।

चौपाई

दसमुख कतहुँ खबरि असि पाई। सेन साजि गढ़ घेरेसि जाई॥ देखि बिकट भट बड़ि कटकाई। जच्छ जीव लै गए पराई॥ २ ॥

अर्थ:

रावण को कहीं ऐसी खबर मिली तब उसने सेना सजाकर किले को जा घेरा। उस बड़े विकट योद्धा और उसकी बड़ी सेना को देखकर यक्ष अपने प्राण लेकर भाग गये।

चौपाई

फिरि सब नगर दसानन देखा। गयउ सोच सुख भयउ बिसेषा॥ सुंदर सहज अगम अनुमानी। कीन्हि तहाँ रावन रजधानी॥ ३ ॥

अर्थ:

तब रावण ने घूम-फिरकर सारा नगर देखा, उसकी [स्थानसम्बन्धी] चिन्ता मिट गयी और उसे बहुत ही सुख हुआ। उस पुरी को स्वाभाविक ही सुन्दर और [बाहरवालों के लिये] दुर्गम जानकर रावण ने वहाँ अपनी राजधानी कायम की।

चौपाई

जेहि जस जोग बाँटि गृह दीन्हे। सुखी सकल रजनीचर कीन्हे॥ एक बार कुबेर पर धावा। पुष्पक जान जीति लै आवा॥ ४ ॥

अर्थ:

योग्यता के अनुसार घरों को बाँटकर रावण ने सब राक्षसों को सुखी किया। एक बार वह कुबेर पर चढ़ दौड़ा और उससे पुष्पक विमान जीतकर ले आया।

दोहा

कौतुकहीं कैलास पुनि लीन्हेसि जाइ उठाइ। मनहुँ तौलि निज बाहुबल चला बहुत सुख पाइ॥ १७९ ॥

अर्थ:

फिर उसने जाकर [एक बार] खिलवाड़ ही में कैलास पर्वत को उठा लिया और मानो अपनी भुजाओं का बल तौलकर, बहुत सुख पाकर वह वहाँ से चला आया।

दोहा 180 के अंतर्गत
चौपाई

सुख संपति सुत सेन सहाई। जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई॥ नित नूतन सब बाढ़त जाई। जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई॥ १ ॥

अर्थ:

सुख, सम्पत्ति, पुत्र, सेना, सहायक, जय, प्रताप, बल, बुद्धि और बड़ाई—ये सब उसके नित्य नये [वैसे ही] बढ़ते जाते थे, जैसे प्रत्येक लाभ पर लोभ बढ़ता है।

चौपाई

अतिबल कुंभकरन अस भ्राता। जेहि कहुँ नहिं प्रतिभट जग जाता॥ करइ पान सोवइ षट मासा। जागत होइ तिहूँ पुर त्रासा॥ २ ॥

अर्थ:

अत्यन्त बलवान् कुम्भकर्ण-सा उसका भाई था, जिसके जोड़ का योद्धा जगत् में पैदा ही नहीं हुआ। वह मदिरा पीकर छः महीने सोया करता था। उसके जागते ही तीनों लोकों में तहलका मच जाता था।

चौपाई

जौं दिन प्रति अहार कर सोई। बिस्व बेगि सब चौपट होई॥ समर धीर नहिं जाइ बखाना। तेहि सम अमित बीर बलवाना॥ ३ ॥

अर्थ:

यदि वह प्रतिदिन भोजन करता, तब तो सम्पूर्ण विश्व शीघ्र ही चौपट हो जाता। रणधीर ऐसा था कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। उसके समान असंख्य बलवान् वीर थे।

चौपाई

बारिदनाद जेठ सुत तासू। भट महुँ प्रथम लीक जग जासू॥ जेहि न होइ रन सनमुख कोई। सुरपुर नितहिं परावन होई॥ ४ ॥

अर्थ:

मेघनाद रावण का बड़ा लड़का था, जिसका जगत् के योद्धाओं में पहला नंबर था। रण में कोई भी उसका सामना नहीं कर सकता था। स्वर्ग में तो [उसके भय से] नित्य भगदड़ मची रहती थी।

दोहा

कुमुख अकंपन कुलिसरद धूमकेतु अतिकाय। एक एक जग जीति सक ऐसे सुभट निकाय॥ १८० ॥

अर्थ:

[इनके अतिरिक्त] कुमुख, अकम्पन, कुलिसरद, धूमकेतु और अतिकाय आदि ऐसे अनेक योद्धा थे, जो अकेले ही सारे जगत् को जीत सकते थे।

दोहा 181 के अंतर्गत
चौपाई

कामरूप जानहिं सब माया। सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया॥ दसमुख बैठ सभाँ एक बारा। देखि अमित आपन परिवारा॥ १ ॥

अर्थ:

सभी राक्षस मनमाना रूप बना सकते थे और [आसुरी] माया जानते थे। उनके दया-धर्म स्वप्न में भी नहीं था। एक बार सभामें बैठे हुए रावण ने अपने अगणित परिवार को देखा—।

चौपाई

सुत समूह जन परिजन नाती। गनै को पार निसाचर जाती॥ सेन बिलोकि सहज अभिमानी। बोला बचन क्रोध मद सानी॥ २ ॥

अर्थ:

पुत्र-पौत्र, कुटुम्बी और सेवक ढेर-के-ढेर थे। [सारी] राक्षसों की जातियों को तो गिन ही कौन सकता था? अपनी सेना को देखकर स्वभाव से ही अभिमानी रावण क्रोध और गर्व में सनी हुई वाणी बोला—।

चौपाई

सुनहु सकल रजनीचर जूथा। हमरे बैरी बिबुध बरूथा॥ ते सनमुख नहिं करहिं लराई। देखि सबल रिपु जाहिं पराई॥ ३ ॥

अर्थ:

हे समस्त राक्षसों के दलो! सुनो, देवतागण हमारे शत्रु हैं। वे सामने आकर युद्ध नहीं करते। बलवान् शत्रु को देखकर भाग जाते हैं।

चौपाई

तेन्ह कर मरन एक बिधि होई। कहउँ बुझाइ सुनहु अब सोई॥ द्विजभोजन मख होम सराधा। सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा॥ ४ ॥

अर्थ:

उनका मरण एक ही उपाय से हो सकता है, मैं समझाकर कहता हूँ। अब उसे सुनो। [उनके बल को बढ़ाने वाले] ब्राह्मणभोजन, यज्ञ, हवन और श्राद्ध—इन सबमें जाकर तुम बाधा डालो।

दोहा

छुधा छीन बलहीन सुर सहजेहिं मिलिहहिं आइ। तब मारिहउँ कि छाड़िहउँ भली भाँति अपनाइ॥ १८१ ॥

अर्थ:

भूख से दुर्बल और बलहीन होकर देवता सहज ही में आ मिलेंगे। तब उनको मैं मार डालूँगा या भली भाँति अपने अधीन करके छोड़ दूँगा।

दोहा 182 के अंतर्गत
चौपाई

मेघनाद कहुँ पुनि हँकरावा। दीन्ही सिख बलु बयरु बढ़ावा॥ जे सुर समर धीर बलवाना। जिन्ह कें लरिबे कर अभिमाना॥ १ ॥

अर्थ:

फिर उसने मेघनाद को बुलवाया और सिखा-पढ़ाकर उसके बल और [देवताओं के प्रति] वैरभाव को उत्तेजना दी। [फिर कहा--] हे पुत्र! जो देवता रण में धीर और बलवान् हैं और जिन्हें लड़ने का अभिमान है।

चौपाई

तिन्हहि जीति रन आनेसु बाँधी। उठि सुत पितु अनुसासन काँधी॥ एहि बिधि सबही अग्या दीन्ही। आपुनु चलेउ गदा कर लीन्ही॥ २ ॥

अर्थ:

उन्हें युद्ध में जीतकर बाँध लाना। बेटे ने उठकर पिता की आज्ञा को शिरोधार्य किया। इसी तरह उसने सबको आज्ञा दी और आप भी हाथ में गदा लेकर चल दिया।

चौपाई

चलत दसानन डोलति अवनी। गर्जत गर्भ स्रवहिं सुर रवनी॥ रावन आवत सुनेउ सकोहा। देवन्ह तके मेरु गिरि खोहा॥ ३ ॥

अर्थ:

रावण के चलने से पृथ्वी डगमगाने लगी और उसकी गर्जना से देवरमणियों के गर्भ गिरने लगे। रावण को क्रोध सहित आते हुए सुनकर देवताओं ने सुमेरु पर्वत की गुफाएँ तकीं (भागकर सुमेरु की गुफाओं का आश्रय लिया)।

चौपाई

दिगपालन्ह के लोक सुहाए। सूने सकल दसानन पाए॥ पुनि पुनि सिंघनाद करि भारी। देइ देवतन्ह गारि पचारी॥ ४ ॥

अर्थ:

दिक्पालों के सारे सुन्दर लोकों को रावण ने सूना पाया। वह बार-बार भारी सिंहगर्जना करके देवताओं को ललकार-ललकारकर गालियाँ देता था।

चौपाई

रन मद मत्त फिरइ जग धावा। प्रतिभट खोजत कतहुँ न पावा॥ रबि ससि पवन बरुन धनधारी। अगिनि काल जम सब अधिकारी॥ ५ ॥

अर्थ:

रण के मद में मतवाला होकर वह जगत् भर में दौड़ता फिरा, प्रतिभट खोजता, पर कहीं नहीं पाया। सूर्य, चन्द्रमा, पवन, वरुण, धनधारी, अग्नि, काल, यम आदि सब अधिकारी।

चौपाई

किंनर सिद्ध मनुज सुर नागा। हठि सबही के पंथहिं लागा॥ ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनुधारी। दसमुख बसबर्ती नर नारी॥ ६ ॥

अर्थ:

किन्नर, सिद्ध, मनुष्य, देवता और नाग--सभी के पीछे वह हठपूर्वक पड़ गया (किसी को भी उसने शान्तिपूर्वक नहीं बैठने दिया)। ब्रह्माजी की सृष्टि में जहाँ तक शरीरधारी स्त्री-पुरुष थे, सभी रावण के अधीन हो गये।

चौपाई

आयसु करहिं सकल भयभीता। नवहिं आइ नित चरन बिनीता॥ ७ ॥

अर्थ:

डर के मारे सभी उसकी आज्ञा का पालन करते थे और नित्य आकर विनीत होकर उसके चरणों में सिर नवाते थे।

दोहा

भुजबल बिस्व बस्य करि राखेसि कोउ न सुतंत्र। मंडलीक मनि रावन राज करइ निज मंत्र॥ १८२ (क) ॥

अर्थ:

उसने भुजाओं के बल से सारे विश्व को वश में कर लिया, किसी को स्वतन्त्र नहीं रहने दिया। [इस प्रकार] मण्डलीक राजाओं का शिरोमणि (सार्वभौम सम्राट) रावण अपने इच्छानुसार राज्य करने लगा।

दोहा

देव जच्छ गंधर्ब नर किंनर नाग कुमारि। जीति बरीं निज बाहुबल बहु सुंदर बर नारि॥ १८२ (ख) ॥

अर्थ:

देवता, यक्ष, गन्धर्व, मनुष्य, किन्नर और नागों की कन्याओं तथा बहुत-सी अन्य सुन्दरी और उत्तम स्त्रियों को उसने अपनी भुजाओं के बल से जीतकर ब्याह लिया।

दोहा 183 के अंतर्गत
चौपाई

इंद्रजीत सन जो कछु कहेऊ। सो सब जनु पहिलहिं करि रहेऊ॥ प्रथमहिं जिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा। तिन्ह कर चरित सुनहु जो कीन्हा॥ १ ॥

अर्थ:

इंद्रजीत से उसने जो कुछ कहा, उसे उसने मानो पहले से ही कर रखा था (अर्थात् रावण के कहने भर की देर थी, उसने आज्ञापालन में तनिक भी देर नहीं की)। जिनको पहले ही आज्ञा दे रखी थी, उन्होंने जो करतूतें कीं उन्हें सुनो--।

चौपाई

देखत भीमरूप सब पापी। निसिचर निकर देव परितापी॥ करहिं उपद्रव असुर निकाया। नाना रूप धरहिं करि माया॥ २ ॥

अर्थ:

सब राक्षसों के समूह देखने में बड़े भयानक, पापी और देवताओं को दुःख देनेवाले थे। वे असुरों के समूह उपद्रव करते थे और माया से अनेकों प्रकार के रूप धरते थे।

चौपाई

जेहि बिधि होइ धर्म निर्मूला। सो सब करहिं बेद प्रतिकूला॥ जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं। नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं॥ ३ ॥

अर्थ:

जिस प्रकार धर्म की जड़ कटे, वे वही सब वेदविरुद्ध काम करते थे। जिस-जिस स्थान में वे गौ और ब्राह्मणों को पाते थे, उसी नगर, गाँव और पुर में आग लगा देते थे।

चौपाई

सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई। देव बिप्र गुरु मान न कोई॥ नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना। सपनेहुँ सुनिअ न बेद पुराना॥ ४ ॥

अर्थ:

[उनके डर से] कहीं भी शुभ आचरण नहीं होते थे। देवता, ब्राह्मण और गुरु को कोई नहीं मानता था। न हरिभक्ति थी, न यज्ञ, तप और ज्ञान था। वेद और पुराण तो सपने में भी सुनने को नहीं मिलते थे।

छन्द

जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा। आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा॥ अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहिं काना। तेहि बहुबिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना॥

अर्थ:

जप, योग, वैराग्य, तप तथा यज्ञ में [देवताओं के] भाग पाने की बात रावण कहीं कानों से सुन पाता, तो [उसी समय] स्वयं उठ दौड़ता। कुछ भी रहने नहीं पाता, वह सबको पकड़कर विध्वंस कर डालता था। संसार में ऐसा भ्रष्ट आचरण फैल गया कि धर्म तो कानों में भी सुनने में नहीं आता था; जो कोई वेद और पुराण कहता, उसको बहुत तरह से त्रास देता और देश से निकाल देता था॥।

सोरठा

बरनि न जाइ अनीति घोर निसाचर जो करहिं। हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापहि कवनि मिति॥ १८३ ॥

अर्थ:

राक्षस लोग जो घोर अत्याचार करते थे, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। हिंसा पर ही जिनकी प्रीति है, उनके पापों का क्या ठिकाना !

दोहा 184 के अंतर्गत
चौपाई

बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लंपट परधन परदारा॥ मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा॥ १ ॥

अर्थ:

पराये धन और परायी स्त्री पर मन चलानेवाले, दुष्ट, चोर और जुआरी बहुत बढ़ गये। लोग माता-पिता और देवताओं को नहीं मानते थे और साधुओं [की सेवा करना तो दूर रहा, उलटे उनसे] सेवा करवाते थे।

चौपाई

जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी॥ अतिसय देखि धर्म कै ग्लानी। परम सभीत धरा अकुलानी॥ २ ॥

अर्थ:

[ श्रीशिवजी कहते हैं कि--] हे भवानी ! जिनके ऐसे आचरण हैं, उन सब प्राणियों को राक्षस ही समझना। इस प्रकार धर्म के प्रति [लोगों की] अत्यन्त ग्लानि देखकर पृथ्वी अत्यन्त भयभीत एवं व्याकुल हो गयी।

चौपाई

गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही। जस मोहि गरुअ एक परद्रोही॥ सकल धर्म देखइ बिपरीता। कहि न सकइ रावन भय भीता॥ ३ ॥

अर्थ:

[वह सोचने लगी कि] पर्वतों, नदियों और समुद्रों का बोझ मुझे इतना भारी नहीं जान पड़ता, जितना भारी मुझे एक परद्रोही (दूसरों का अनिष्ट करनेवाला) लगता है। पृथ्वी सारे धर्मों को विपरीत देख रही है, पर रावण से भयभीत हुई वह कुछ बोल नहीं सकती।

चौपाई

धेनु रूप धरि हृदयँ बिचारी। गई तहाँ जहँ सुर मुनि झारी॥ निज संताप सुनाएसि रोई। काहू तें कछु काज न होई॥ ४ ॥

अर्थ:

[अन्त में] हृदय में सोच-विचारकर, गौ का रूप धारण कर धरती वहाँ गयी, जहाँ सब देवता और मुनि [छिपे] थे। पृथ्वी ने रोकर उनको अपना दुःख सुनाया, पर किसी से कुछ काम न बना।