नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल

दोहा १५६ · बालकाण्ड

दोहा पाठ

नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल बराहु। चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप हाँकि न होइ निबाहु॥ १५६ ॥

अर्थ

नील पर्वत के शिखर के समान विशाल [शरीर वाले] उस सूअर को देखकर राजा ने घोड़े को चाबुक लगाकर तेजी से चला और उसने सूअर को ललकारा कि अब तेरा बचाव नहीं हो सकता।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “प्रतापभानु की कथा” प्रकरण का दोहा १५६ है। इस प्रकरण में राजा प्रतापभानु के छल द्वारा विपथित होने और ब्राह्मण-शाप से उनके विनाश का वर्णन है।

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प्रतापभानु की कथा