मनु-शतरूपा तप एवं वरदान

मनु और शतरूपा कठोर तप करके भगवान से अपने पुत्र रूप में प्रकट होने का वर माँगते हैं। प्रसन्न होकर भगवान उन्हें वह दिव्य वरदान देते हैं।

बालकाण्ड · प्रकरण ३२ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

स्वायंभू मनु अरु सतरूपा। जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा॥ दंपति धरम आचरन नीका। अजहुँ गाव श्रुति जिन्ह कै लीका॥ १ ॥

अर्थ:

स्वायम्भुव मनु और [उनकी पत्नी] शतरूपा, जिनसे मनुष्यों की यह अनुपम सृष्टि हुई, इन दोनों पति-पत्नी के धर्म और आचरण बहुत अच्छे थे। आज भी श्रुति जिनकी मर्यादा का गान करती है।

चौपाई

नृप उत्तानपाद सुत तासू। ध्रुव हरिभगत भयउ सुत जासू॥ लघु सुत नाम प्रियब्रत ताही। बेद पुरान प्रसंसहिं जाही॥ २ ॥

अर्थ:

राजा उत्तानपाद उनके पुत्र थे, जिनके पुत्र [प्रसिद्ध] हरिभक्त ध्रुवजी हुए। उन (मनुजी) के छोटे लड़के का नाम प्रियव्रत था, जिसकी प्रशंसा वेद और पुराण करते हैं।

चौपाई

देवहूति पुनि तासु कुमारी। जो मुनि कर्दम कै प्रिय नारी॥ आदिदेव प्रभु दीनदयाला। जठर धरेउ जेहिं कपिल कृपाला॥ ३ ॥

अर्थ:

पुनः देवहूति उनकी कन्या थी, जो कर्दम मुनि की प्यारी पत्नी हुई और जिन्होंने आदिदेव, दीनों पर दया करनेवाले समर्थ एवं कृपालु भगवान् कपिल को गर्भ में धारण किया।

चौपाई

सांख्य सास्त्र जिन्ह प्रगट बखाना। तत्त्व बिचार निपुन भगवाना॥ तेहिं मनु राज कीन्ह बहु काला। प्रभु आयसु सब बिधि प्रतिपाला॥ ४ ॥

अर्थ:

तत्त्वों का विचार करने में अत्यन्त निपुण जिन (कपिल) भगवान् ने सांख्यशास्त्र का प्रकट रूप में वर्णन किया, उन (स्वायम्भुव) मनुजी ने बहुत समय तक राज्य किया और सब प्रकार से भगवान् की आज्ञा [रूप शास्त्रों की मर्यादा] का पालन किया।

सोरठा

होइ न बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन। हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु॥ १४२ ॥

अर्थ:

घर में रहते बुढ़ापा आ गया, परन्तु विषयों से वैराग्य नहीं होता; [इस बात को सोचकर] उनके मन में बड़ा दुःख हुआ कि श्रीहरि की भक्ति बिना जन्म यों ही चला गया।

दोहा 143 के अंतर्गत
चौपाई

बरबस राज सुतहि तब दीन्हा। नारि समेत गवन बन कीन्हा॥ तीरथ बर नैमिष बिख्याता। अति पुनीत साधक सिधि दाता॥ १ ॥

अर्थ:

तब मनुजी ने अपने पुत्र को जबर्दस्ती राज्य देकर स्वयं स्त्रीसहित वन को गमन किया। तीर्थों में श्रेष्ठ, अत्यन्त पवित्र और साधकों को सिद्धि देनेवाला नैमिषारण्य प्रसिद्ध है।

चौपाई

बसहिं तहाँ मुनि सिद्ध समाजा। तहँ हियँ हरषि चलेउ मनु राजा॥ पंथ जात सोहहिं मतिधीरा। ग्यान भगति जनु धरें सरीरा॥ २ ॥

अर्थ:

वहाँ मुनियों और सिद्धों के समूह बसते हैं। राजा मनु हृदय में हर्षित होकर वहीं चले। वे धीर बुद्धिवाले राजा-रानी मार्ग में जाते हुए ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो ज्ञान और भक्ति ही शरीर धारण किये जा रहे हों।

चौपाई

पहुँचे जाइ धेनुमति तीरा। हरषि नहाने निरमल नीरा॥ आए मिलन सिद्ध मुनि ग्यानी। धरम धुरंधर नृपरिषि जानी॥ ३ ॥

अर्थ:

वे गोमती के किनारे जा पहुँचे। हर्षित होकर उन्होंने निर्मल जल में स्नान किया। उनको धर्मधुरन्धर राजर्षि जानकर सिद्ध और ज्ञानी मुनि उनसे मिलने आये।

चौपाई

जहँ जहँ तीरथ रहे सुहाए। मुनिन्ह सकल सादर करवाए॥ कृस सरीर मुनिपट परिधाना। सत समाज नित सुनहिं पुराना॥ ४ ॥

अर्थ:

जहाँ-जहाँ सुन्दर तीर्थ थे, मुनियों ने आदरपूर्वक सभी तीर्थ उनको करा दिये। उनका शरीर दुर्बल हो गया था, वे मुनियों के-से (वल्कल) वस्त्र धारण करते थे और संतों के समाज में नित्य पुराण सुनते थे।

दोहा

द्वादस अच्छर मंत्र पुनि जपहिं सहित अनुराग। बासुदेव पद पंकरुह दंपति मन अति लाग॥ १४३ ॥

अर्थ:

और द्वादशाक्षर मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) का प्रेम सहित जप करते थे। भगवान् वासुदेव के चरणकमलों में उन राजा-रानी का मन बहुत ही लग गया।

दोहा 144 के अंतर्गत
चौपाई

करहिं अहार साक फल कंदा। सुमिरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा॥ पुनि हरि हेतु करन तप लागे। बारि अधार मूल फल त्यागे॥ १ ॥

अर्थ:

वे साग, फल और कन्द का आहार करते थे और सच्चिदानन्द ब्रह्म का स्मरण करते थे। फिर वे श्रीहरि के लिये तप करने लगे और मूल-फल को त्यागकर केवल जल के आधार पर रहने लगे।

चौपाई

उर अभिलाष निरंतर होई। देखिअ नयन परम प्रभु सोई॥ अगुन अखंड अनंत अनादी। जेहि चिंतहिं परमारथबादी॥ २ ॥

अर्थ:

हृदय में निरन्तर यही अभिलाषा होती कि हम [कैसे] उन परम प्रभु को आँखों से देखें, जो निर्गुण, अखण्ड, अनन्त और अनादि हैं और परमार्थवादी (ब्रह्मज्ञानी, तत्त्ववेत्ता) लोग जिनका चिन्तन किया करते हैं।

चौपाई

नेति नेति जेहि बेद निरूपा। निजानंद निरुपाधि अनूपा॥ संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। उपजहिं जासु अंस तें नाना॥ ३ ॥

अर्थ:

जिन्हें वेद 'नेति-नेति' (यह भी नहीं, यह भी नहीं) कहकर निरूपित करते हैं। जो आनन्दस्वरूप, उपाधिरहित और अनुपम हैं, एवं जिनके अंश से अनेकों शिव, ब्रह्मा और विष्णु भगवान् प्रकट होते हैं।

चौपाई

ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई। भगत हेतु लीलातनु गहई॥ जौं यह बचन सत्य श्रुति भाषा। तौ हमार पूजिहि अभिलाषा॥ ४ ॥

अर्थ:

ऐसे [महान] प्रभु भी सेवक के वश में हैं और भक्तों के लिये [दिव्य] लीलाविग्रह धारण करते हैं। यदि वेदों में यह वचन सत्य कहा है तो हमारी अभिलाषा भी अवश्य पूरी होगी।

दोहा

एहि बिधि बीते बरष षट सहस बारि आहार। संबत सप्त सहस्र पुनि रहे समीर अधार॥ १४४ ॥

अर्थ:

इस प्रकार जल का आहार [करके तप] करते छः हजार वर्ष बीत गये। फिर सात हजार वर्ष वे वायु के आधार पर रहे।

दोहा 145 के अंतर्गत
चौपाई

बरष सहस दस त्यागेउ सोऊ। ठाढ़े रहे एक पद दोऊ॥ बिधि हरि हर तप देखि अपारा। मनु समीप आए बहु बारा॥ १ ॥

अर्थ:

दस हजार वर्ष तक उन्होंने वायु का आधार भी छोड़ दिया। दोनों एक पैर से खड़े रहे। उनका अपार तप देखकर ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी कई बार मनुजी के पास आये।

चौपाई

मागहु बर बहु भाँति लोभाए। परम धीर नहिं चलहिं चलाए॥ अस्थिमात्र होइ रहे सरीरा। तदपि मनाग मनहिं नहिं पीरा॥ २ ॥

अर्थ:

उन्होंने इन्हें अनेक प्रकार से ललचाया और कहा कि कुछ वर माँगो। पर वे परम धैर्यवान् रहे; किसी के डिगाये नहीं डिगे। यद्यपि उनका शरीर हड्डियों का ढाँचा मात्र रह गया था, फिर भी उनके मन में जरा भी पीड़ा नहीं थी।

चौपाई

प्रभु सर्बग्य दास निज जानी। गति अनन्य तापस नृप रानी॥ मागु मागु बरु भै नभ बानी। परम गभीर कृपामृत सानी॥ ३ ॥

अर्थ:

सर्वज्ञ प्रभु ने अनन्य गति वाले तपस्वी राजा-रानी को अपना निज दास जाना। तब परम गम्भीर और कृपामृत से सनी हुई यह आकाशवाणी हुई—“वर माँगो, वर माँगो।”

चौपाई

मृतक जिआवनि गिरा सुहाई। श्रवन रंध्र होइ उर जब आई॥ हृष्ट पुष्ट तन भए सुहाए। मानहुँ अबहिं भवन ते आए॥ ४ ॥

अर्थ:

मुर्दे को भी जिला देनेवाली यह सुन्दर वाणी कानों के छिद्रों से होकर जब हृदय में आई, तब राजा-रानी के शरीर ऐसे सुन्दर और हृष्ट-पुष्ट हो गये, मानो अभी घर से आये हों।

दोहा

श्रवन सुधा सम बचन सुनि पुलक प्रफुल्लित गात। बोले मनु करि दंडवत प्रेम न हृदयँ समात॥ १४५ ॥

अर्थ:

कानों में अमृत के समान लगनेवाले वचन सुनकर उनका शरीर पुलकित और प्रफुल्लित हो गया। तब मनुजी दण्डवत् करके बोले—प्रेम हृदय में समाता न था।

दोहा 146 के अंतर्गत
चौपाई

सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनू। बिधि हरि हर बंदित पद रेनू॥ सेवत सुलभ सकल सुखदायक। प्रनतपाल सचराचर नायक॥ १ ॥

अर्थ:

हे प्रभो! सुनिये, आप सेवकों के लिये कल्पवृक्ष और कामधेनु हैं। आपकी चरण-रज की ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी भी वन्दना करते हैं। आप सेवा करने में सुलभ हैं तथा सब सुखों के देनेवाले हैं। आप शरणागत के रक्षक और जड-चेतन के स्वामी हैं।

चौपाई

जौं अनाथ हित हम पर नेहू। तौ प्रसन्न होइ यह बर देहू॥ जो सरूप बस सिव मन माहीं। जेहिं कारन मुनि जतन कराहीं॥ २ ॥

अर्थ:

हे अनाथों के हितकारी! यदि हम पर आपका स्नेह है, तो प्रसन्न होकर यह वर दीजिये कि जो स्वरूप शिवजी के मन में बसता है और जिसके लिए मुनि यत्न करते हैं।

चौपाई

जो भुसुंडि मन मानस हंसा। सगुन अगुन जेहि निगम प्रसंसा॥ देखहिं हम सो रूप भरि लोचन। कृपा करहु प्रनतारति मोचन॥ ३ ॥

अर्थ:

जो काकभुशुण्डि के मनरूपी मानसरोवर में विहार करनेवाला हंस है, सगुण और निर्गुण कहकर वेद जिसकी प्रशंसा करते हैं, हे शरणागत के दुःख मिटानेवाले प्रभो! ऐसी कृपा कीजिये कि हम उसी रूप को नेत्र भरकर देखें।

चौपाई

दंपति बचन परम प्रिय लागे। मृदुल बिनीत प्रेम रस पागे॥ भगत बछल प्रभु कृपानिधाना। बिस्वबास प्रगटे भगवाना॥ ४ ॥

अर्थ:

राजा-रानी के कोमल, विनययुक्त और प्रेमरस में पगे हुए वचन भगवान् को बहुत ही प्रिय लगे। भक्तवत्सल, कृपानिधान, समस्त विश्व के वासस्थान, सर्वसमर्थ भगवान् प्रकट हो गये।

दोहा

नील सरोरुह नील मनि नील नीरधर स्याम। लाजहिं तन सोभा निरखि कोटि कोटि सत काम॥ १४६ ॥

अर्थ:

भगवान् के नीले कमल, नीलमणि और नीले जलधर के समान [कोमल, प्रकाशमय और सरस] श्यामवर्ण [चिन्मय] शरीर की शोभा देखकर करोड़ों-करोड़ों कामदेव भी लजा जाते हैं।

दोहा 147 के अंतर्गत
चौपाई

सरद मयंक बदन छबि सींवा। चारु कपोल चिबुक दर ग्रीवा॥ अधर अरुन रद सुंदर नासा। बिधु कर निकर बिनिंदक हासा॥ १ ॥

अर्थ:

उनका मुख शरद् पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान छविसीमा था। सुन्दर कपोल, चिबुक और ग्रीवा थे। लाल ओठ, दाँत और नाक अत्यन्त सुन्दर थे। हँसी चन्द्रमा की किरणों को नीचा दिखानेवाली थी।

चौपाई

नव अंबुज अंबक छबि नीकी। चितवनि ललित भावँती जी की॥ भृकुटि मनोज चाप छबि हारी। तिलक ललाट पटल दुतिकारी॥ २ ॥

अर्थ:

नेत्रों की छवि नये कमल के समान बड़ी सुन्दर थी। मनोहर चितवन जी को बहुत प्यारी लगती थी। टेढ़ी भौंहें कामदेव के धनुष की शोभा को हरनेवाली थीं। ललाट-पटल पर प्रकाशमय तिलक था।

चौपाई

कुंडल मकर मुकुट सिर भ्राजा। कुटिल केस जनु मधुप समाजा॥ उर श्रीबत्स रुचिर बनमाला। पदिक हार भूषन मनिजाला॥ ३ ॥

अर्थ:

कानों में मकराकृत (मछली के आकार के) कुण्डल और सिर पर मुकुट सुशोभित था। टेढ़े (घुँघराले) काले बाल ऐसे सघन थे, मानो भौंरों के झुंड हों। हृदय पर श्रीवत्स, सुन्दर वनमाला, रत्नजटित हार और मणियों के आभूषण सुशोभित थे।

चौपाई

केहरि कंधर चारु जनेऊ। बाहु बिभूषन सुंदर तेऊ॥ करि कर सरिस सुभग भुजदंडा। कटि निषंग कर सर कोदंडा॥ ४ ॥

अर्थ:

सिंह की-सी गर्दन थी, सुन्दर जनेऊ था। भुजाओं के गहने भी सुन्दर थे। हाथी की सूँड़ के समान सुन्दर भुजदण्ड थे। कमर में तरकस और हाथ में बाण तथा धनुष शोभा पा रहे थे।

दोहा

तड़ित बिनिंदक पीत पट उदर रेख बर तीनि। नाभि मनोहर लेति जनु जमुन भवँर छबि छीनि॥ १४७ ॥

अर्थ:

बिजली को लजानेवाला पीत पट था। पेट पर सुन्दर तीन रेखाएँ (त्रिवली) थीं। नाभि ऐसी मनोहर थी, मानो यमुना के भँवरों की छबि को छीने लेती हो।

दोहा 148 के अंतर्गत
चौपाई

पद राजीव बरनि नहिं जाहीं। मुनि मन मधुप बसहिं जेन्ह माहीं॥ बाम भाग सोभति अनुकूला। आदिसक्ति छबिनिधि जगमूला॥ १ ॥

अर्थ:

जिनमें मुनियों के मनरूपी भौरे बसते हैं, भगवान् के उन चरणकमलों का तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। भगवान् के बायें भाग में सदा अनुकूल रहनेवाली, शोभा की राशि, जगत् की मूलकारणरूपा आदिशक्ति श्रीजानकीजी सुशोभित हैं।

चौपाई

जासु अंस उपजहिं गुनखानी। अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी॥ भृकुटि बिलास जासु जग होई। राम बाम दिसि सीता सोई॥ २ ॥

अर्थ:

जिनके अंश से गुणों की खान अगणित लक्ष्मी, उमा और ब्रह्माणी उत्पन्न होती हैं तथा जिनकी भौंह के इशारे से ही जगत् की रचना होती है, वही [भगवान् की स्वरूपा-शक्ति] श्रीसीताजी श्रीरामचन्द्रजी की बायीं ओर स्थित हैं।

चौपाई

छबिसमुद्र हरि रूप बिलोकी। एकटक रहे नयन पट रोकी॥ चितवहिं सादर रूप अनूपा। तृप्ति न मानहिं मनु सतरूपा॥ ३ ॥

अर्थ:

शोभा के समुद्र श्रीहरि के रूप को देखकर मनु-शतरूपा ने नेत्रों के पट (पलकें) रोके हुए एकटक रह गये। उस अनुपम रूप को वे आदर सहित देख रहे थे और देखते-देखते अघाते ही न थे।

चौपाई

हरष बिबस तन दसा भुलानी। परे दंड इव गहि पद पानी॥ सिर परसे प्रभु निज कर कंजा। तुरत उठाए करुनापुंजा॥ ४ ॥

अर्थ:

आनन्द के अधिक वश में हो जाने के कारण उन्हें अपने देह की सुधि भूल गयी। वे हाथों से भगवान् के चरण पकड़कर दण्ड की तरह भूमिपर गिर पड़े। कृपा की राशि प्रभु ने अपने करकमलों से उनके मस्तकों का स्पर्श किया और उन्हें तुरंत ही उठा लिया।

दोहा

बोले कृपानिधान पुनि अति प्रसन्न मोहि जानि। मागहु बर जोइ भाव मन महादानि अनुमानि॥ १४८ ॥

अर्थ:

फिर कृपानिधान भगवान् बोले—मुझे अत्यन्त प्रसन्न जानकर और बड़ा भारी दानी मानकर, जो मन को भाये वही वर माँग लो।

दोहा 149 के अंतर्गत
चौपाई

सुनि प्रभु बचन जोरि जुग पानी। धरि धीरजु बोली मृदु बानी॥ नाथ देखि पद कमल तुम्हारे। अब पूरे सब काम हमारे॥ १ ॥

अर्थ:

प्रभु के वचन सुनकर, दोनों हाथ जोड़कर और धीरज धरकर मनुजी ने कोमल वाणी कही—हे नाथ! आपके चरणकमलों को देखकर अब हमारी सारी मनःकामनाएँ पूरी हो गयीं।

चौपाई

एक लालसा बड़ि उर माहीं। सुगम अगम कहि जाति सो नाहीं॥ तुम्हहि देत अति सुगम गोसाईं। अगम लाग मोहि निज कृपनाईं॥ २ ॥

अर्थ:

फिर भी मन में एक बड़ी लालसा है। उसका पूरा होना सहज भी है और अत्यन्त कठिन भी, इसी से उसे कहते नहीं बनता। हे स्वामी! आपके लिये तो उसका पूरा करना बहुत सहज है, पर मुझे अपनी कृपणता के कारण वह अत्यन्त कठिन मालूम होता है।

चौपाई

जथा दरिद्र बिबुधतरु पाई। बहु संपति मागत सकुचाई॥ तासु प्रभाउ जान नहिं सोई। तथा हृदयँ मम संसय होई॥ ३ ॥

अर्थ:

जैसे कोई दरिद्र कल्पवृक्ष को पाकर भी अधिक संपत्ति माँगने में संकोच करता है, क्योंकि वह उसके प्रभाव को नहीं जानता, वैसे ही मेरे हृदय में संशय हो रहा है।

चौपाई

सो तुम्ह जानहु अंतरजामी। पुरवहु मोर मनोरथ स्वामी॥ सकुच बिहाइ मागु नृप मोही। मोरें नहिं अदेय कछु तोही॥ ४ ॥

अर्थ:

हे स्वामी! आप अन्तर्यामी हैं, इसलिये उसे जानते ही हैं। मेरा वह मनोरथ पूरा कीजिये। [भगवान् ने कहा—] हे राजन्! संकोच छोड़कर मुझसे माँगो। तुम्हें न दे सकूँ ऐसा मेरे पास कुछ भी नहीं है।

दोहा

दानि सिरोमनि कृपानिधि नाथ कहउँ सतिभाउ। चाहउँ तुम्हहि समान सुत प्रभु सन कवन दुराउ॥ १४९ ॥

अर्थ:

[राजा ने कहा—] हे दानियों के शिरोमणि! हे कृपानिधान! हे नाथ! मैं अपने मन का सच्चा भाव कहता हूँ कि मैं आपके समान पुत्र चाहता हूँ। प्रभु से भला क्या छिपाना!।

दोहा 150 के अंतर्गत
चौपाई

देखि प्रीति सुनि बचन अमोले। एवमस्तु करुनानिधि बोले॥ आपु सरिस खोजौं कहँ जाई। नृप तव तनय होब मैं आई॥ १ ॥

अर्थ:

राजा की प्रीति देखकर और उनके अमूल्य वचन सुनकर करुणानिधान भगवान् बोले-ऐसा ही हो। हे राजन्! मैं अपने समान [दूसरा] कहाँ जाकर खोजूँ। अतः स्वयं ही आकर तुम्हारा पुत्र बनूँगा।

चौपाई

सतरूपहि बिलोकि कर जोरें। देबि मागु बरु जो रुचि तोरें॥ जो बरु नाथ चतुर नृप मागा। सोइ कृपाल मोहि अति प्रिय लागा॥ २ ॥

अर्थ:

सतरूपाजी को हाथ जोड़े देखकर भगवान ने कहा-हे देवि! तुम्हारी जो इच्छा हो, सो वर माँग लो। [शतरूपा ने कहा--] हे नाथ! चतुर राजाने जो वर माँगा, हे कृपालु! वह मुझे बहुत ही प्रिय लगा।

चौपाई

प्रभु परंतु सुठि होति ढिठाई। जदपि भगत हित तुम्हहि सोहाई॥ तुम्ह ब्रह्मादि जनक जग स्वामी। ब्रह्म सकल उर अंतरजामी॥ ३ ॥

अर्थ:

हे प्रभु! बहुत ढिठाई हो रही है, यद्यपि हे भक्तों का हित करनेवाले! वह ढिठाई भी आपको अच्छी ही लगती है। आप ब्रह्मा आदि के जनक, जगत् के स्वामी और सब के हृदय के भीतर की जाननेवाले ब्रह्म हैं।

चौपाई

अस समुझत मन संसय होई। कहा जो प्रभु प्रवान पुनि सोई॥ जे निज भगत नाथ तव अहहीं। जो सुख पावहिं जो गति लहहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

ऐसा समझने पर मन में सन्देह होता है, फिर भी प्रभु ने जो कहा वही प्रमाण (सत्य) है। [मैं तो यह माँगती हूँ कि] हे नाथ! आपके जो निज जन हैं वे जो (अलौकिक, अखण्ड) सुख पाते हैं और जिस परम गति को प्राप्त होते हैं।

दोहा

सोइ सुख सोइ गति सोइ भगति सोइ निज चरन सनेहु। सोइ बिबेक सोइ रहनि प्रभु हमहि कृपा करि देहु॥ १५० ॥

अर्थ:

हे प्रभो! वही सुख, वही गति, वही भक्ति, वही अपने चरणों में प्रेम, वही ज्ञान और वही रहन-सहन कृपा करके हमें दीजिये।

दोहा 151 के अंतर्गत
चौपाई

सुनि मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना। कृपासिंधु बोले मृदु बचना॥ जो कछु रुचि तुम्हरे मन माहीं। मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं॥ १ ॥

अर्थ:

[रानी की] कोमल, गूढ़ और मनोहर श्रेष्ठ वाक्यरचना सुनकर कृपासिंधु बोले--तुम्हारे मन में जो कुछ इच्छा है, वह सब मैंने तुम्हें दिया, इसमें कोई सन्देह न समझना।

चौपाई

मातु बिबेक अलौकिक तोरें। कबहुँ न मिटिहि अनुग्रह मोरें॥ बंदि चरन मनु कहेउ बहोरी। अवर एक बिनती प्रभु मोरी॥ २ ॥

अर्थ:

हे माता! मेरी कृपा से तुम्हारा अलौकिक ज्ञान कभी नष्ट न होगा। तब मनु ने भगवान् के चरणों की वन्दना करके फिर कहा-हे प्रभु! मेरी एक विनती और है--।

चौपाई

सुत बिषइक तव पद रति होऊ। मोहि बड़ मूढ़ कहै किन कोऊ॥ मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना। मम जीवन तिमि तुम्हहि अधीना॥ ३ ॥

अर्थ:

आपके चरणों में मेरी वैसी ही प्रीति हो जैसी पुत्र के लिये पिता की होती है, चाहे मुझे कोई बड़ा भारी मूर्ख ही क्यों न कहे। जैसे मणि के बिना साँप और जल के बिना मछली [नहीं रह सकती], वैसे ही मेरा जीवन आपके अधीन रहे (आपके बिना न रह सके)।

चौपाई

अस बरु मागि चरन गहि रहेऊ। एवमस्तु करुनानिधि कहेऊ॥ अब तुम्ह मम अनुसासन मानी। बसहु जाइ सुरपति रजधानी॥ ४ ॥

अर्थ:

ऐसा वर माँगकर राजा भगवान् के चरण पकड़े रह गये। तब दया के निधान भगवान ने कहा--ऐसा ही हो। अब तुम मेरी आज्ञा मानकर देवराज इन्द्र की राजधानी (अमरावती) में जाकर वास करो।

सोरठा

तहँ करि भोग बिसाल तात गएँ कछु काल पुनि। होइहहु अवध भुआल तब मैं होब तुम्हार सुत॥ १५१ ॥

अर्थ:

हे तात! वहाँ [स्वर्ग के] बहुत-से भोग भोगकर, कुछ काल बीत जाने पर, तुम अवध के राजा होगे। तब मैं तुम्हारा पुत्र होऊँगा।

दोहा 152 के अंतर्गत
चौपाई

इच्छामय नरबेष सँवारें। होइहउँ प्रगट निकेत तुम्हारें॥ अंसन्ह सहित देह धरि ताता। करिहउँ चरित भगत सुखदाता॥ १ ॥

अर्थ:

इच्छामय मनुष्यरूप सजकर मैं तुम्हारे घर प्रकट होऊँगा। हे तात! मैं अपने अंशों सहित देह धारण करके भक्तों को सुख देनेवाले चरित्र करूँगा।

चौपाई

जे सुनि सादर नर बड़भागी। भव तरिहहिं ममता मद त्यागी॥ आदिसक्ति जेहिं जग उपजाया। सोउ अवतरिहि मोरि यह माया॥ २ ॥

अर्थ:

जिन (चरित्रों) को बड़े भाग्यशाली मनुष्य आदरसहित सुनकर, ममता और मद त्यागकर, भवसागर से तर जायँगे। आदिशक्ति यह मेरी [स्वरूपभूता] माया भी, जिसने जगत् को उत्पन्न किया है, अवतार लेगी।

चौपाई

पुरउब मैं अभिलाष तुम्हारा। सत्य सत्य पन सत्य हमारा॥ पुनि पुनि अस कहि कृपानिधाना। अंतरधान भए भगवाना॥ ३ ॥

अर्थ:

इस प्रकार मैं तुम्हारी अभिलाषा पूरी करूँगा। मेरा प्रण सत्य है, सत्य है, सत्य है। कृपानिधान भगवान् बार-बार ऐसा कहकर अन्तर्धान हो गये।

चौपाई

दंपति उर धरि भगत कृपाला। तेहिं आश्रम निवसे कछु काला॥ समय पाइ तनु तजि अनयासा। जाइ कीन्ह अमरावति बासा॥ ४ ॥

अर्थ:

वे स्त्री-पुरुष (राजा-रानी) भक्तों पर कृपा करनेवाले भगवान् को हृदय में धारण करके कुछ काल तक उस आश्रम में रहे। फिर उन्होंने समय पाकर, सहज ही (बिना किसी कष्ट के) शरीर छोड़कर, अमरावती (इन्द्र की पुरी) में जाकर वास किया।

दोहा

यह इतिहास पुनीत अति उमहि कही बृषकेतु। भरद्वाज सुनु अपर पुनि राम जनम कर हेतु॥ १५२ ॥

अर्थ:

याज्ञवल्क्यजी कहते हैं-- हे भरद्वाज। इस अत्यन्त पवित्र इतिहास को शिवजी ने पार्वती से कहा था। अब श्रीराम के अवतार लेने का दूसरा कारण सुनो।