मनु-शतरूपा तप एवं वरदान
मनु और शतरूपा कठोर तप करके भगवान से अपने पुत्र रूप में प्रकट होने का वर माँगते हैं। प्रसन्न होकर भगवान उन्हें वह दिव्य वरदान देते हैं।
बालकाण्ड · प्रकरण ३२ / ५९
प्रकरण पाठ
सांख्य सास्त्र जिन्ह प्रगट बखाना। तत्त्व बिचार निपुन भगवाना॥ तेहिं मनु राज कीन्ह बहु काला। प्रभु आयसु सब बिधि प्रतिपाला॥ ४ ॥
अर्थ:
तत्त्वों का विचार करने में अत्यन्त निपुण जिन (कपिल) भगवान् ने सांख्यशास्त्र का प्रकट रूप में वर्णन किया, उन (स्वायम्भुव) मनुजी ने बहुत समय तक राज्य किया और सब प्रकार से भगवान् की आज्ञा [रूप शास्त्रों की मर्यादा] का पालन किया।
बसहिं तहाँ मुनि सिद्ध समाजा। तहँ हियँ हरषि चलेउ मनु राजा॥ पंथ जात सोहहिं मतिधीरा। ग्यान भगति जनु धरें सरीरा॥ २ ॥
अर्थ:
वहाँ मुनियों और सिद्धों के समूह बसते हैं। राजा मनु हृदय में हर्षित होकर वहीं चले। वे धीर बुद्धिवाले राजा-रानी मार्ग में जाते हुए ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो ज्ञान और भक्ति ही शरीर धारण किये जा रहे हों।
जहँ जहँ तीरथ रहे सुहाए। मुनिन्ह सकल सादर करवाए॥ कृस सरीर मुनिपट परिधाना। सत समाज नित सुनहिं पुराना॥ ४ ॥
अर्थ:
जहाँ-जहाँ सुन्दर तीर्थ थे, मुनियों ने आदरपूर्वक सभी तीर्थ उनको करा दिये। उनका शरीर दुर्बल हो गया था, वे मुनियों के-से (वल्कल) वस्त्र धारण करते थे और संतों के समाज में नित्य पुराण सुनते थे।
उर अभिलाष निरंतर होई। देखिअ नयन परम प्रभु सोई॥ अगुन अखंड अनंत अनादी। जेहि चिंतहिं परमारथबादी॥ २ ॥
अर्थ:
हृदय में निरन्तर यही अभिलाषा होती कि हम [कैसे] उन परम प्रभु को आँखों से देखें, जो निर्गुण, अखण्ड, अनन्त और अनादि हैं और परमार्थवादी (ब्रह्मज्ञानी, तत्त्ववेत्ता) लोग जिनका चिन्तन किया करते हैं।
नेति नेति जेहि बेद निरूपा। निजानंद निरुपाधि अनूपा॥ संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। उपजहिं जासु अंस तें नाना॥ ३ ॥
अर्थ:
जिन्हें वेद 'नेति-नेति' (यह भी नहीं, यह भी नहीं) कहकर निरूपित करते हैं। जो आनन्दस्वरूप, उपाधिरहित और अनुपम हैं, एवं जिनके अंश से अनेकों शिव, ब्रह्मा और विष्णु भगवान् प्रकट होते हैं।
मागहु बर बहु भाँति लोभाए। परम धीर नहिं चलहिं चलाए॥ अस्थिमात्र होइ रहे सरीरा। तदपि मनाग मनहिं नहिं पीरा॥ २ ॥
अर्थ:
उन्होंने इन्हें अनेक प्रकार से ललचाया और कहा कि कुछ वर माँगो। पर वे परम धैर्यवान् रहे; किसी के डिगाये नहीं डिगे। यद्यपि उनका शरीर हड्डियों का ढाँचा मात्र रह गया था, फिर भी उनके मन में जरा भी पीड़ा नहीं थी।
सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनू। बिधि हरि हर बंदित पद रेनू॥ सेवत सुलभ सकल सुखदायक। प्रनतपाल सचराचर नायक॥ १ ॥
अर्थ:
हे प्रभो! सुनिये, आप सेवकों के लिये कल्पवृक्ष और कामधेनु हैं। आपकी चरण-रज की ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी भी वन्दना करते हैं। आप सेवा करने में सुलभ हैं तथा सब सुखों के देनेवाले हैं। आप शरणागत के रक्षक और जड-चेतन के स्वामी हैं।
जो भुसुंडि मन मानस हंसा। सगुन अगुन जेहि निगम प्रसंसा॥ देखहिं हम सो रूप भरि लोचन। कृपा करहु प्रनतारति मोचन॥ ३ ॥
अर्थ:
जो काकभुशुण्डि के मनरूपी मानसरोवर में विहार करनेवाला हंस है, सगुण और निर्गुण कहकर वेद जिसकी प्रशंसा करते हैं, हे शरणागत के दुःख मिटानेवाले प्रभो! ऐसी कृपा कीजिये कि हम उसी रूप को नेत्र भरकर देखें।
कुंडल मकर मुकुट सिर भ्राजा। कुटिल केस जनु मधुप समाजा॥ उर श्रीबत्स रुचिर बनमाला। पदिक हार भूषन मनिजाला॥ ३ ॥
अर्थ:
कानों में मकराकृत (मछली के आकार के) कुण्डल और सिर पर मुकुट सुशोभित था। टेढ़े (घुँघराले) काले बाल ऐसे सघन थे, मानो भौंरों के झुंड हों। हृदय पर श्रीवत्स, सुन्दर वनमाला, रत्नजटित हार और मणियों के आभूषण सुशोभित थे।
पद राजीव बरनि नहिं जाहीं। मुनि मन मधुप बसहिं जेन्ह माहीं॥ बाम भाग सोभति अनुकूला। आदिसक्ति छबिनिधि जगमूला॥ १ ॥
अर्थ:
जिनमें मुनियों के मनरूपी भौरे बसते हैं, भगवान् के उन चरणकमलों का तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। भगवान् के बायें भाग में सदा अनुकूल रहनेवाली, शोभा की राशि, जगत् की मूलकारणरूपा आदिशक्ति श्रीजानकीजी सुशोभित हैं।
जासु अंस उपजहिं गुनखानी। अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी॥ भृकुटि बिलास जासु जग होई। राम बाम दिसि सीता सोई॥ २ ॥
अर्थ:
जिनके अंश से गुणों की खान अगणित लक्ष्मी, उमा और ब्रह्माणी उत्पन्न होती हैं तथा जिनकी भौंह के इशारे से ही जगत् की रचना होती है, वही [भगवान् की स्वरूपा-शक्ति] श्रीसीताजी श्रीरामचन्द्रजी की बायीं ओर स्थित हैं।
हरष बिबस तन दसा भुलानी। परे दंड इव गहि पद पानी॥ सिर परसे प्रभु निज कर कंजा। तुरत उठाए करुनापुंजा॥ ४ ॥
अर्थ:
आनन्द के अधिक वश में हो जाने के कारण उन्हें अपने देह की सुधि भूल गयी। वे हाथों से भगवान् के चरण पकड़कर दण्ड की तरह भूमिपर गिर पड़े। कृपा की राशि प्रभु ने अपने करकमलों से उनके मस्तकों का स्पर्श किया और उन्हें तुरंत ही उठा लिया।
एक लालसा बड़ि उर माहीं। सुगम अगम कहि जाति सो नाहीं॥ तुम्हहि देत अति सुगम गोसाईं। अगम लाग मोहि निज कृपनाईं॥ २ ॥
अर्थ:
फिर भी मन में एक बड़ी लालसा है। उसका पूरा होना सहज भी है और अत्यन्त कठिन भी, इसी से उसे कहते नहीं बनता। हे स्वामी! आपके लिये तो उसका पूरा करना बहुत सहज है, पर मुझे अपनी कृपणता के कारण वह अत्यन्त कठिन मालूम होता है।
सतरूपहि बिलोकि कर जोरें। देबि मागु बरु जो रुचि तोरें॥ जो बरु नाथ चतुर नृप मागा। सोइ कृपाल मोहि अति प्रिय लागा॥ २ ॥
अर्थ:
सतरूपाजी को हाथ जोड़े देखकर भगवान ने कहा-हे देवि! तुम्हारी जो इच्छा हो, सो वर माँग लो। [शतरूपा ने कहा--] हे नाथ! चतुर राजाने जो वर माँगा, हे कृपालु! वह मुझे बहुत ही प्रिय लगा।
प्रभु परंतु सुठि होति ढिठाई। जदपि भगत हित तुम्हहि सोहाई॥ तुम्ह ब्रह्मादि जनक जग स्वामी। ब्रह्म सकल उर अंतरजामी॥ ३ ॥
अर्थ:
हे प्रभु! बहुत ढिठाई हो रही है, यद्यपि हे भक्तों का हित करनेवाले! वह ढिठाई भी आपको अच्छी ही लगती है। आप ब्रह्मा आदि के जनक, जगत् के स्वामी और सब के हृदय के भीतर की जाननेवाले ब्रह्म हैं।
अस समुझत मन संसय होई। कहा जो प्रभु प्रवान पुनि सोई॥ जे निज भगत नाथ तव अहहीं। जो सुख पावहिं जो गति लहहीं॥ ४ ॥
अर्थ:
ऐसा समझने पर मन में सन्देह होता है, फिर भी प्रभु ने जो कहा वही प्रमाण (सत्य) है। [मैं तो यह माँगती हूँ कि] हे नाथ! आपके जो निज जन हैं वे जो (अलौकिक, अखण्ड) सुख पाते हैं और जिस परम गति को प्राप्त होते हैं।
सुत बिषइक तव पद रति होऊ। मोहि बड़ मूढ़ कहै किन कोऊ॥ मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना। मम जीवन तिमि तुम्हहि अधीना॥ ३ ॥
अर्थ:
आपके चरणों में मेरी वैसी ही प्रीति हो जैसी पुत्र के लिये पिता की होती है, चाहे मुझे कोई बड़ा भारी मूर्ख ही क्यों न कहे। जैसे मणि के बिना साँप और जल के बिना मछली [नहीं रह सकती], वैसे ही मेरा जीवन आपके अधीन रहे (आपके बिना न रह सके)।
दंपति उर धरि भगत कृपाला। तेहिं आश्रम निवसे कछु काला॥ समय पाइ तनु तजि अनयासा। जाइ कीन्ह अमरावति बासा॥ ४ ॥
अर्थ:
वे स्त्री-पुरुष (राजा-रानी) भक्तों पर कृपा करनेवाले भगवान् को हृदय में धारण करके कुछ काल तक उस आश्रम में रहे। फिर उन्होंने समय पाकर, सहज ही (बिना किसी कष्ट के) शरीर छोड़कर, अमरावती (इन्द्र की पुरी) में जाकर वास किया।