पुनि बोलेउ मृदु गिरा सुहाई
पुनि बोलेउ मृदु गिरा सुहाई
चौपाई २, दोहा १६० के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
पुनि बोलेउ मृदु गिरा सुहाई। जानि पिता प्रभु करउँ ढिठाई॥ मोहि मुनीस सुत सेवक जानी। नाथ नाम निज कहहु बखानी॥ २ ॥
अर्थ
फिर सुन्दर कोमल वाणी से कहा--हे प्रभो! आपको पिता जानकर मैं ढिठाई करता हूँ। हे मुनीश्वर! मुझे अपना पुत्र और सेवक जानकर अपना नाम विस्तार से बतलाइये।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “प्रतापभानु की कथा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १६० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजा प्रतापभानु के छल द्वारा विपथित होने और ब्राह्मण-शाप से उनके विनाश का वर्णन है।
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प्रतापभानु की कथा