अब प्रसन्न मैं संसय नाहीं
अब प्रसन्न मैं संसय नाहीं
चौपाई ३, दोहा १६४ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
अब प्रसन्न मैं संसय नाहीं। मागु जो भूप भाव मन माहीं॥ सुनि सुबचन भूपति हरषाना। गहि पद बिनय कीन्हि बिधि नाना॥ ३ ॥
अर्थ
अब मैं प्रसन्न हूँ, इसमें सन्देह न करना। हे राजन्! जो मन को भावे वही माँग लो। सुन्दर वचन सुनकर राजा हर्षित हो गया और पैर पकड़कर उसने बहुत प्रकार से विनती की।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “प्रतापभानु की कथा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १६४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजा प्रतापभानु के छल द्वारा विपथित होने और ब्राह्मण-शाप से उनके विनाश का वर्णन है।
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प्रतापभानु की कथा