रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि
रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि
दोहा १७० · बालकाण्ड
दोहा पाठ
रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु। अजहुँ देत दुख रबि ससिहि सिर अवसेषित राहु॥ १७० ॥
अर्थ
तेजस्वी शत्रु अकेला भी हो तो भी उसे छोटा नहीं समझना चाहिये। जिसका सिरमात्र बचा था, वह राहु आज तक सूर्य-चन्द्रमा को दुःख देता है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “प्रतापभानु की कथा” प्रकरण का दोहा १७० है। इस प्रकरण में राजा प्रतापभानु के छल द्वारा विपथित होने और ब्राह्मण-शाप से उनके विनाश का वर्णन है।
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प्रतापभानु की कथा