तेहि समय सुनिअ असीस जहँ तहँ
छन्द ४, दोहा ३२७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
छन्द पाठ
तेहि समय सुनिअ असीस जहँ तहँ नगर नभ आनँदु महा। चिरु जिअहुँ जोरीं चारु चार्यो मुदित मन सबहीं कहा॥ जोगींद्र सिद्ध मुनीस देव बिलोकि प्रभु दुंदुभि हनी। चले हरषि बरषि प्रसून निज निज लोक जय जय जय भनी॥ ४ ॥
अर्थ
उस समय नगर और आकाश में जहाँ सुनिये, वहीं आशीर्वाद की ध्वनि सुनायी दे रही है और महान् आनन्द छाया है। सभी ने प्रसन्न मन से कहा कि सुन्दर चारों जोड़ियाँ चिरंजीवी हों। योगींद्र, सिद्ध, मुनीश और देवताओं ने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को देखकर दुन्दुभी बजायी और हर्षित होकर फूलों की वर्षा करते हुए तथा “जय हो, जय हो, जय हो” कहते हुए वे अपने-अपने लोक को चले।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीसीता-राम विवाह” प्रकरण का छन्द ४, दोहा ३२७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीता-राम सहित चारों राजकुमारों के विवाह और जनकपुर के मंगलमय उत्सव का वर्णन है।