दरस लालसा सकुच न थोरी
दरस लालसा सकुच न थोरी
चौपाई ३, दोहा ३२५ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
दरस लालसा सकुच न थोरी। प्रगटत दुरत बहोरि बहोरी॥ भए मगन सब देखनिहारे। जनक समान अपान बिसारे॥ ३ ॥
अर्थ
उन्हें (कामदेव और रति को) दर्शन की लालसा और संकोच दोनों ही कम नहीं हैं (अर्थात् बहुत हैं); इसीलिये वे मानो बार-बार प्रकट होते और छिपते हैं। सब देखनेवाले आनन्दमग्न हो गये और जनकजी की भाँति सभी अपनी सुध भूल गये।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीसीता-राम विवाह” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३२५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीता-राम सहित चारों राजकुमारों के विवाह और जनकपुर के मंगलमय उत्सव का वर्णन है।
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श्रीसीता-राम विवाह