बर कुअँरि करतल जोरि साखोचारु दोउ

छन्द ३, दोहा ३२४ के अंतर्गत · बालकाण्ड

छन्द पाठ

बर कुअँरि करतल जोरि साखोचारु दोउ कुलगुर करैं। भयो पानिगहनु बिलोकि बिधि सुर मनुज मुनि आनँद भरैं॥ सुखमूल दूलहु देखि दंपति पुलक तन हुलस्यो हियो। करि लोक बेद बिधानु कन्यादानु नृपभूषन कियो॥ ३ ॥

अर्थ

दोनों कुलों के गुरुवर और कन्या की हथेलियों को मिलाकर साखोचार करने लगे। पाणिग्रहण हुआ देखकर ब्रह्मादि देवता, मनुष्य और मुनि आनन्द में भर गये। सुख के मूल दूलह को देखकर राजा-रानी का शरीर पुलकित हो गया और हृदय आनन्द से उमँग उठा। राजाओं के अलंकारस्वरूप महाराज जनकजी ने लोक और वेद की रीति को करके कन्यादान किया।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “श्रीसीता-राम विवाह” प्रकरण का छन्द ३, दोहा ३२४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीता-राम सहित चारों राजकुमारों के विवाह और जनकपुर के मंगलमय उत्सव का वर्णन है।

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श्रीसीता-राम विवाह