पहुँचावहिं फिरि मिलहिं बहोरी
पहुँचावहिं फिरि मिलहिं बहोरी
चौपाई ४, दोहा ३३७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
पहुँचावहिं फिरि मिलहिं बहोरी। बढ़ी परस्पर प्रीति न थोरी॥ पुनि पुनि मिलत सखिन्ह बिलगाई। बाल बच्छ जिमि धेनु लवाई॥ ४ ॥
अर्थ
पुत्रियोंको पहुँचाती हैं, फिर लौटकर मिलती हैं। परस्परमें थोड़ी नहीं, बहुत प्रीति बढ़ी। बार-बार मिलती हुई माताओंको सखियोंने अलग कर दिया। जैसे हालकी ब्यायी हुई गायको कोई उसके बालक बछड़े [या बछिया] से अलग कर दे।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीसीता-राम विवाह” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३३७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीता-राम सहित चारों राजकुमारों के विवाह और जनकपुर के मंगलमय उत्सव का वर्णन है।
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श्रीसीता-राम विवाह