हिमवंत जिमि गिरिजा महेसहि हरिहि श्री

छन्द ४, दोहा ३२४ के अंतर्गत · बालकाण्ड

छन्द पाठ

हिमवंत जिमि गिरिजा महेसहि हरिहि श्री सागर दई। तिमि जनक रामहि सिय समरपी बिस्व कल कीरति नई॥ क्यों करै बिनय बिदेहु कियो बिदेहु मूरति सावँरीं। करि होमु बिधिवत गाँठि जोरी होन लागीं भावँरीं॥ ४ ॥

अर्थ

जैसे हिमवान ने शिवजी को पार्वती जी और सागर ने भगवान् विष्णु को लक्ष्मी जी दी थीं, वैसे ही जनकजी ने श्रीरामचन्द्रजी को सीताजी समर्पित कीं, जिससे विश्व में सुन्दर नवीन कीर्ति छा गयी। विदेह (जनकजी) कैसे विनती करें! उस साँवली मूर्ति ने तो उन्हें सचमुच विदेह (देह की सुध-बुध से रहित) ही कर दिया। विधिपूर्वक हवन करके गठजोड़ी की गयी और भाँवरें होने लगीं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “श्रीसीता-राम विवाह” प्रकरण का छन्द ४, दोहा ३२४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीता-राम सहित चारों राजकुमारों के विवाह और जनकपुर के मंगलमय उत्सव का वर्णन है।

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श्रीसीता-राम विवाह