जे परसि मुनिबनिता लही गति रही

छन्द २, दोहा ३२४ के अंतर्गत · बालकाण्ड

छन्द पाठ

जे परसि मुनिबनिता लही गति रही जो पातकमई। मकरंदु जिन्ह को संभु सिर सुचिता अवधि सुर बरनई॥ करि मधुप मन मुनि जोगिजन जे सेइ अभिमत गति लहैं। ते पद पखारत भाग्यभाजनु जनकु जय जय सब कहैं॥ २ ॥

अर्थ

जिनका स्पर्श पाकर गौतम मुनि की स्त्री अहल्या ने, जो पापमयी थी, परमगति पायी, जिन चरणकमलों का मकरन्द-रस शिवजी के मस्तक पर विराजमान है, जिसे देवता पवित्रता की सीमा बताते हैं; मुनि और योगीजन अपने मन को भौंरा बनाकर जिन चरणकमलों का सेवन करके मनोवांछित गति प्राप्त करते हैं; उन्हीं चरणों को भाग्यभाजन जनकजी धो रहे हैं; यह देखकर सब जय-जयकार कर रहे हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “श्रीसीता-राम विवाह” प्रकरण का छन्द २, दोहा ३२४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीता-राम सहित चारों राजकुमारों के विवाह और जनकपुर के मंगलमय उत्सव का वर्णन है।

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श्रीसीता-राम विवाह