करि बिनय सिय रामहि समरपी जोरि

छन्द, दोहा ३३६ के अंतर्गत · बालकाण्ड

छन्द पाठ

करि बिनय सिय रामहि समरपी जोरि कर पुनि पुनि कहै। बलि जाउँ तात सुजान तुम्ह कहुँ बिदित गति सब की अहै॥ परिवार पुरजन मोहि राजहि प्रानप्रिय सिय जानिबी। तुलसीस सीलु सनेहु लखि निज किंकरी करि मानिबी॥

अर्थ

विनती करके सीताजी को श्रीरामचन्द्रजी को समर्पित किया और हाथ जोड़कर बार- बार कहा-हे तात ! हे सुजान! मैं बलि जाती हूँ, तुमको सबकी गति (हाल) मालूम है। परिवार, पुरजन, मुझको और राजाजी को सीता प्राणों के समान प्रिय है, ऐसा जानियेगा। हे तुलसीस! इसके शील और स्नेह को देखकर इसे अपनी किंकरी करके मानियेगा॥।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “श्रीसीता-राम विवाह” प्रकरण का छन्द, दोहा ३३६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीता-राम सहित चारों राजकुमारों के विवाह और जनकपुर के मंगलमय उत्सव का वर्णन है।

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श्रीसीता-राम विवाह