बारात का जनकपुर में आना और स्वागतादि

अयोध्या की बारात जनकपुर पहुँचती है, जहाँ उसका अत्यंत आदर और उत्साह से स्वागत होता है। नगर मंगलमय हो उठता है और दोनों कुलों का मिलन आनंद से भर जाता है।

बालकाण्ड · प्रकरण ५६ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं। मुदित देव दुंदुभीं बजावहिं॥ बस्तु सकल राखीं नृप आगें। बिनय कीन्हि तिन्ह अति अनुरागें॥ १ ॥

अर्थ:

देवसुन्दरियाँ फूल बरसाकर गीत गा रही हैं, और देवता आनन्दित होकर नगाड़े बजा रहे हैं। [अगवानी में आये हुए] उन लोगों ने सब चीजें दशरथजी के आगे रख दीं और अत्यन्त प्रेम से विनती की।

चौपाई

प्रेम समेत रायँ सबु लीन्हा। भै बकसीस जाचकन्हि दीन्हा॥ करि पूजा मान्यता बड़ाई। जनवासे कहुँ चले लवाई॥ २ ॥

अर्थ:

राजा दशरथजी ने प्रेम सहित सब वस्तुएँ ले लीं, फिर उनकी बख्शीशें होने लगीं और वे याचकों को दे दी गयीं। तदनन्तर पूजा, आदर-सत्कार और बड़ाई करके अगवान लोग उनको जनवासे की ओर लिवा ले चले।

चौपाई

बसन बिचित्र पाँवड़े परहीं। देखि धनदु धन मदु परिहरहीं॥ अति सुंदर दीन्हेउ जनवासा। जहँ सब कहुँ सब भाँति सुपासा॥ ३ ॥

अर्थ:

विलक्षण वस्त्रों के पाँवड़े पड़ रहे हैं, जिन्हें देखकर कुबेर भी अपने धन का अभिमान छोड़ देते हैं। बड़ा सुन्दर जनवासा दिया गया, जहाँ सबको सब प्रकार का सुभीता था।

चौपाई

जानी सियँ बरात पुर आई। कछु निज महिमा प्रगटि जनाई॥ हृदयँ सुमिरि सब सिद्धि बोलाईं। भूप पहुनई करन पठाईं॥ ४ ॥

अर्थ:

सीताजी ने बारात जनकपुर में आयी जानकर अपनी कुछ महिमा प्रकट करके दिखलायी। हृदय में स्मरण कर सब सिद्धियों को बुलाया और उन्हें राजा दशरथजी की मेहमानी करने के लिये भेजा।

दोहा

सिधि सब सिय आयसु अकनि गईं जहाँ जनवास। लिएँ संपदा सकल सुख सुरपुर भोग बिलास॥ ३०६ ॥

अर्थ:

सीताजी की आज्ञा सुनकर सब सिद्धियाँ जहाँ जनवासा था वहाँ सारी सम्पदा, सुख और इन्द्रपुर के भोग-विलास को लिये हुए गयीं।

दोहा 307 के अंतर्गत
चौपाई

निज निज बास बिलोकि बराती। सुरसुख सकल सुलभ सब भाँती॥ बिभव भेद कछु कोउ न जाना। सकल जनक कर करहिं बखाना॥ १ ॥

अर्थ:

बरातियों ने अपने-अपने ठहरने के स्थान देखे तो वहाँ देवताओं के सब सुखों को सब प्रकार से सुलभ पाया। इस ऐश्वर्य का कुछ भी भेद कोई जान न सका। सब जनकजी की बड़ाई कर रहे हैं।

चौपाई

सिय महिमा रघुनायक जानी। हरषे हृदयँ हेतु पहिचानी॥ पितु आगमनु सुनत दोउ भाई। हृदयँ न अति आनंदु अमाई॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी यह सब सीताजी की महिमा जानकर और उनका प्रेम पहचानकर हृदय में हर्षित हुए। पिता दशरथजी के आने का समाचार सुनकर दोनों भाइयों के हृदय में महान् आनन्द समाता न था।

चौपाई

सकुचन्ह कहि न सकत गुरु पाहीं। पितु दरसन लालचु मन माहीं॥ बिस्वामित्र बिनय बड़ि देखी। उपजा उर संतोषु बिसेषी॥ ३ ॥

अर्थ:

संकोचवश वे गुरु विश्वामित्रजी से कह नहीं सकते थे; परन्तु मन में पिताजी के दर्शनों की लालसा थी। विश्वामित्रजी ने उनकी बड़ी नम्रता देखी, तो उनके हृदय में बहुत सन्तोष उत्पन्न हुआ।

चौपाई

हरषि बंधु दोउ हृदयँ लगाए। पुलक अंग अंबक जल छाए॥ चले जहाँ दसरथु जनवासे। मनहुँ सरोबर तकेउ पिआसे॥ ४ ॥

अर्थ:

प्रसन्न होकर उन्होंने दोनों भाइयों को हृदय से लगा लिया। उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रों में (प्रेमाशुओं का) जल भर आया। वे उस जनवासा को चले, जहाँ दशरथजी थे। मानो सरोवर प्यासे की ओर लक्ष्य करके चला हो।

दोहा

भूप बिलोके जबहिं मुनि आवत सुतन्ह समेत। उठे हरषि सुखसिंधु महुँ चले थाह सी लेत॥ ३०७ ॥

अर्थ:

जब राजा दशरथजी ने पुत्रों सहित मुनि को आते देखा, तब वे हर्षित होकर उठे और सुख के समुद्र में थाह-सी लेते हुए चले।

दोहा 308 के अंतर्गत
चौपाई

मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा। बार बार पद रज धरि सीसा॥ कौसिक राउ लिए उर लाई। कहि असीस पूछी कुसलाई॥ १ ॥

अर्थ:

पृथ्वीपति दशरथजी ने मुनि की चरणधूलि को बार-बार सिर पर चढ़ाकर उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। विश्वामित्रजी ने राजा को उठाकर हृदय से लगा लिया और आशीर्वाद देकर कुशल पूछी।

चौपाई

पुनि दंडवत करत दोउ भाई। देखि नृपति उर सुखु न समाई॥ सुत हियँ लाइ दुसह दुख मेटे। मृतक सरीर प्रान जनु भेंटे॥ २ ॥

अर्थ:

फिर दोनों भाइयों को दण्डवत् प्रणाम करते देखकर राजा के हृदय में सुख समाया नहीं। पुत्रों को [उठाकर] हृदय से लगाकर उन्होंने अपने [वियोगजनित] दुःसह दुःख को मिटाया। मानो मृतक शरीर को प्राण मिल गये हों।

चौपाई

पुनि बसिष्ठ पद सिर तिन्ह नाए। प्रेम मुदित मुनिबर उर लाए॥ बिप्र बृंद बंदे दुहुँ भाईं। मनभावती असीसें पाईं॥ ३ ॥

अर्थ:

फिर उन्होंने वसिष्ठजी के चरणों में सिर नवाया। मुनिश्रेष्ठ ने प्रेम के आनन्द में उन्हें हृदय से लगा लिया। दोनों भाइयों ने सब ब्राह्मणों की वन्दना की और मनभाये आशीर्वाद पाये।

चौपाई

भरत सहानुज कीन्ह प्रनामा। लिए उठाइ लाइ उर रामा॥ हरषे लखन देखि दोउ भ्राता। मिले प्रेम परिपूरित गाता॥ ४ ॥

अर्थ:

भरतजी ने छोटे भाई शत्रुघ्न सहित श्रीरामचन्द्रजी को प्रणाम किया। श्रीरामजी ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया। लक्ष्मणजी दोनों भाइयों को देखकर हर्षित हुए और प्रेम से परिपूर्ण हुए शरीर से उनसे मिले।

दोहा

पुरजन परिजन जातिजन जाचक मंत्री मीत। मिले जथाबिधि सबहि प्रभु परम कृपाल बिनीत॥ ३०८ ॥

अर्थ:

तदनन्तर परम कृपालु और विनयी श्रीरामचन्द्रजी अयोध्यावासियों, कुटुम्बियों, जाति के लोगों, याचकों, मन्त्रियों और मित्रों—सभी से यथायोग्य मिले।

दोहा 309 के अंतर्गत
चौपाई

रामहि देखि बरात जुड़ानी। प्रीति कि रीति न जाति बखानी॥ नृप समीप सोहहिं सुत चारी। जनु धन धरमादिक तनुधारी॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी को देखकर बारात शीतल हुई (राम के वियोग में सबके हृदय में जो आग जल रही थी, वह शान्त हो गयी)। प्रीति की रीति का बखान नहीं हो सकता। राजा के पास चारों पुत्र ऐसी शोभा पा रहे हैं मानो अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष शरीर धारण किये हुए हों।

चौपाई

सुतन्ह समेत दसरथहि देखी। मुदित नगर नर नारि बिसेषी॥ सुमन बरिसि सुर हनहिं निसाना। नाकनटीं नाचहिं करि गाना॥ २ ॥

अर्थ:

पुत्रों सहित दशरथजी को देखकर नगर के स्त्री-पुरुष बहुत ही प्रसन्न हो रहे हैं। [आकाश में] देवता फूलों की वर्षा करके नगाड़े बजा रहे हैं और अप्सराएँ गा-गाकर नाच रही हैं।

चौपाई

सतानंद अरु बिप्र सचिव गन। मागध सूत बिदुष बंदीजन॥ सहित बरात राउ सनमाना। आयसु मागि फिरे अगवाना॥ ३ ॥

अर्थ:

अगवानी में आये हुए शतानन्दजी, अन्य ब्राह्मण, मन्त्रीगण, मागध, सूत, विद्वान् और भाटों ने बारात सहित राजा दशरथजी का आदर-सत्कार किया। फिर आज्ञा लेकर वे वापस लौटे।

चौपाई

प्रथम बरात लगन तें आई। तातें पुर प्रमोदु अधिकाई॥ ब्रह्मानंदु लोग सब लहहीं। बढ़हुँ दिवस निसि बिधि सन कहहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

बारात लग्न के दिन से पहले आ गयी है, इससे जनकपुर में अधिक आनन्द छा रहा है। सब लोग ब्रह्मानन्द प्राप्त कर रहे हैं और विधाता से मनाकर कहते हैं कि दिन-रात बढ़ जाएँ।

दोहा

रामु सीय सोभा अवधि सुकृत अवधि दोउ राज। जहँ जहँ पुरजन कहहिं अस मिलि नर नारि समाज॥ ३०९ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी सुन्दरताकी सीमा हैं और दोनों राजा पुण्य की सीमा हैं, जहाँ-तहाँ जनकपुरवासी स्त्री-पुरुषों का समूह इकट्ठे हो-होकर यही कह रहे हैं।

दोहा 310 के अंतर्गत
चौपाई

जनक सुकृत मूरति बैदेही। दसरथ सुकृत रामु धरें देही॥ इन्ह सम काहुँ न सिव अवराधे। काहुँ न इन्ह समान फल लाधे॥ १ ॥

अर्थ:

जनकजी के सुकृत (पुण्य) की मूर्ति जानकीजी हैं और दशरथजी के सुकृत देह धारण किये हुए श्रीरामजी हैं। इन [दोनों राजाओं] के समान किसी ने शिवजी की आराधना नहीं की; और न इनके समान किसी ने फल ही पाया।

चौपाई

इन्ह सम कोउ न भयउ जग माहीं। है नहिं कतहूँ होनेउ नाहीं॥ हम सब सकल सुकृत कै रासी। भए जग जनमि जनकपुर बासी॥ २ ॥

अर्थ:

इनके समान जगत् में न कोई हुआ, न कहीं है, न होने का ही है। हम सब भी सम्पूर्ण पुण्यों की राशि हैं, जो जगत् में जन्म लेकर जनकपुर के निवासी हुए।

चौपाई

जिन्ह जानकी राम छबि देखी। को सुकृती हम सरिस बिसेषी॥ पुनि देखब रघुबीर बिआहू। लेब भली बिधि लोचन लाहू॥ ३ ॥

अर्थ:

और जिन्होंने जानकीजी और श्रीरामचन्द्रजी की छबि देखी है, हमारे-सरीखा विशेष पुण्यात्मा कौन होगा! और अब हम श्रीरघुबीरजी का विवाह देखेंगे और भली भाँति नेत्रों का लाभ लेंगे।

चौपाई

कहहिं परसपर कोकिलबयनीं। एहि बिआहँ बड़ लाभु सुनयनीं॥ बड़ें भाग बिधि बात बनाई। नयन अतिथि होइहहिं दोउ भाई॥ ४ ॥

अर्थ:

कोयल के समान मधुर बोलनेवाली स्त्रियाँ आपस में कहती हैं कि हे सुन्दर नेत्रों वाली! इस विवाह में बड़ा लाभ है। बड़े भाग्य से विधाता ने सब बात बना दी है, ये दोनों भाई हमारे नेत्रों के अतिथि हुआ करेंगे।

दोहा

बारहिं बार सनेह बस जनक बोलाउब सीय। लेन आइहहिं बंधु दोउ कोटि काम कमनीय॥ ३१० ॥

अर्थ:

जनकजी स्नेहवश बार-बार सीताजी को बुलावेंगे, और करोड़ों कामदेवों के समान सुन्दर दोनों भाई सीताजी को लेने (विदा कराने) आया करेंगे।

दोहा 311 के अंतर्गत
चौपाई

बिबिध भाँति होइहि पहुनाई। प्रिय न काहि अस सासुर माई॥ तब तब राम लखनहि निहारी। होइहहिं सब पुर लोग सुखारी॥ १ ॥

अर्थ:

तब उनकी अनेकों प्रकार से पहुनाई होगी। सखी! ऐसी ससुराल किसे प्यारी न होगी! तब-तब हम सब नगर निवासी श्रीराम-लक्ष्मण को देख-देखकर सुखी होंगे।

चौपाई

सखि जस राम लखन कर जोटा। तैसेइ भूप संग दुइ ढोटा॥ स्याम गौर सब अंग सुहाए। ते सब कहहिं देखि जे आए॥ २ ॥

अर्थ:

हे सखी! जैसा श्रीराम-लक्ष्मण का जोड़ा है, वैसे ही राजा के साथ और भी दो कुमार हैं। वे भी एक श्याम और दूसरे गौर वर्ण के हैं। उनके भी सब अंग बहुत सुन्दर हैं। जो लोग उन्हें देख आये हैं, वे सब यही कहते हैं।

चौपाई

कहा एक मैं आजु निहारे। जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे॥ भरतु रामही की अनुहारी। सहसा लखि न सकहिं नर नारी॥ ३ ॥

अर्थ:

एक ने कहा—मैंने आज ही उन्हें देखा है; इतने सुन्दर हैं, मानो ब्रह्माजी ने उन्हें अपने हाथ सँवारा है। भरत तो श्रीरामचन्द्रजी की ही शक्ल-सूरत के हैं। स्त्री-पुरुष उन्हें सहसा पहचान नहीं सकते।

चौपाई

लखनु सत्रुसूदनु एकरूपा। नख सिख ते सब अंग अनूपा॥ मन भावहिं मुख बरनि न जाहीं। उपमा कहुँ त्रिभुवन कोउ नाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

लक्ष्मण और शत्रुघ्न दोनों का एक रूप है। नख से शिखा तक सभी अंग अनुपम हैं। मन को बड़े अच्छे लगते हैं, पर मुख से उनका वर्णन नहीं हो सकता। उनकी उपमा के योग्य तीनों लोकों में कोई नहीं है।

छन्द

उपमा न कोउ कह दास तुलसी कतहुँ कबि कोबिद कहैं। बल बिनय बिद्या सील सोभा सिंधु इन्ह से एइ अहैं॥ पुर नारि सकल पसारि अंचल बिधिहि बचन सुनावहीं। ब्याहिअहुँ चारिउ भाइ एहिं पुर हम सुमंगल गावहीं॥

अर्थ:

दास तुलसी कहता है, कवि और कोविद (विद्वान) कहते हैं, इनकी उपमा कहीं कोई नहीं है। बल, विनय, विद्या, शील और शोभा के समुद्र इनसे ही हैं। जनकपुर की सब स्त्रियाँ आँचल फैलाकर विधाता को यह वचन (विनती) सुनाती हैं कि चारिउ भाइयों का विवाह इसी नगर में हो और हम सब सुमंगल गाएँ॥

सोरठा

कहहिं परस्पर नारि बारि बिलोचन पुलक तन। सखि सबु करब पुरारि पुन्य पयोनिधि भूप दोउ॥ ३११ ॥

अर्थ:

नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भरकर, पुलकित शरीर से स्त्रियाँ आपस में कह रही हैं कि हे सखी! दोनों राजा पुण्य के समुद्र हैं, त्रिपुरारि शिवजी सब मनोरथ पूर्ण करेंगे।

दोहा 312 के अंतर्गत
चौपाई

एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। आनँद उमगि उमगि उर भरहीं॥ जे नृप सीय स्वयंबर आए। देखि बंधु सब तिन्ह सुख पाए॥ १ ॥

अर्थ:

इस प्रकार सब मनोरथ कर रही हैं और हृदय को उमँग-उमँगकर आनन्द से भर रही हैं। सीताजी के स्वयंवर में जो राजा आये थे, उन्होंने भी चारों भाइयों को देखकर सुख पाया।

चौपाई

कहत राम जसु बिसद बिसाला। निज निज भवन गए महिपाला॥ गए बीति कछु दिन एहि भाँती। प्रमुदित पुरजन सकल बराती॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी का निर्मल और महान् यश कहते हुए राजा लोग अपने-अपने घर गये। इस प्रकार कुछ दिन बीत गये। जनकपुर निवासी और बराती सभी बड़े आनन्दित हैं।

चौपाई

मंगल मूल लगन दिनु आवा। हिम रितु अगहनु मासु सुहावा॥ ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू। लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू॥ ३ ॥

अर्थ:

मंगल मूल लग्न का दिन आ गया। हेमन्त-ऋतु और सुहावना अगहन का महीना था। ग्रह, तिथि, नक्षत्र, योग और वार श्रेष्ठ थे। लग्न (मुहूर्त) शोधकर ब्रह्माजी ने उस पर विचार किया।

चौपाई

पठै दीन्हि नारद सन सोई। गनी जनक के गनकन्ह जोई॥ सुनी सकल लोगन्ह यह बाता। कहहिं जोतिषी आहिं बिधाता॥ ४ ॥

अर्थ:

और उस (लग्नपत्रिका) को नारदजी के हाथ [जनकजी के यहाँ] भेज दिया। जनकजी के ज्योतिषियों ने भी वही गणना कर रखी थी। जब सब लोगों ने यह बात सुनी, तब वे कहने लगे—यहाँ के ज्योतिषी भी ब्रह्मा ही हैं।

दोहा

धेनुधूरि बेला बिमल सकल सुमंगल मूल। बिप्रन्ह कहेउ बिदेह सन जानि सगुन अनुकूल॥ ३१२ ॥

अर्थ:

निर्मल और सभी सुन्दर लग्नों की मूल गोधूलि की पवित्र वेला आ गयी और अनुकूल शकुन होने लगे, यह जानकर ब्राह्मणों ने जनकजी से कहा।

दोहा 313 के अंतर्गत
चौपाई

उपरोहितहि कहेउ नरनाहा। अब बिलंब कर कारनु काहा॥ सतानंद तब सचिव बोलाए। मंगल सकल साजि सब ल्याए॥ १ ॥

अर्थ:

तब राजा जनक ने पुरोहित शतानन्दजी से कहा कि अब देर का क्या कारण है। तब शतानन्दजी ने मंत्रियों को बुलाया। वे सब मंगल का सामान सजाकर ले आए।

चौपाई

संख निसान पनव बहु बाजे। मंगल कलस सगुन सुभ साजे॥ सुभग सुआसिनि गावहिं गीता। करहिं बेद धुनि बिप्र पुनीता॥ २ ॥

अर्थ:

शंख, निसान, पनव और बहुत-से बाजे बजने लगे तथा मंगल कलश और शुभ शकुन की वस्तुएँ सजायी गयीं। सुन्दर सुहागिन स्त्रियाँ गीत गा रही हैं और पवित्र ब्राह्मण वेद की ध्वनि कर रहे हैं।

चौपाई

लेन चले सादर एहि भाँती। गए जहाँ जनवास बराती॥ कोसलपति कर देखि समाजू। अति लघु लाग तिन्हहि सुरराजू॥ ३ ॥

अर्थ:

सब लोग इस प्रकार आदरपूर्वक बारात को लेने चले और जहाँ बारातियों का जनवासा था, वहाँ गये। अवधपति दशरथजी का समाज (वैभव) देखकर उन्हें देवराज इन्द्र भी बहुत ही तुच्छ लगने लगे।

चौपाई

भयउ समउ अब धारिअ पाऊ। यह सुनि परा निसानहिं घाऊ॥ गुरहि पूछि करि कुल बिधि राजा। चले संग मुनि साधु समाजा॥ ४ ॥

अर्थ:

[उन्होंने जाकर विनती की--] समय हो गया, अब पधारिए। यह सुनते ही नगाड़ों पर चोट पड़ी। गुरु से पूछकर और कुल की विधि करके राजा मुनियों और साधुओं के समाज को साथ लेकर चले।

दोहा

भाग्य बिभव अवधेस कर देखि देव ब्रह्मादि। लगे सराहन सहस मुख जानि जनम निज बादि॥ ३१३ ॥

अर्थ:

अवधनरेश दशरथजी का भाग्य और वैभव देखकर और अपना जन्म व्यर्थ समझकर, ब्रह्माजी आदि देवता हजारों मुखों से उसकी सराहना करने लगे।

दोहा 314 के अंतर्गत
चौपाई

सुरन्ह सुमंगल अवसरु जाना। बरषहिं सुमन बजाइ निसाना॥ सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरूथा। चढ़े बिमानन्हि नाना जूथा॥ १ ॥

अर्थ:

देवगण सुन्दर मंगल के अवसर को जानकर, नगाड़े बजा-बजा कर फूल बरसाते हैं। शिवजी, ब्रह्माजी आदि देववृन्द यूथ (टोलियाँ) बना-बनाकर विमानों पर चढ़े।

चौपाई

प्रेम पुलक तन हृदयँ उछाहू। चले बिलोकन राम बिआहू॥ देखि जनकपुरु सुर अनुरागे। निज निज लोक सबहिं लघु लागे॥ २ ॥

अर्थ:

और प्रेम से पुलकित-शरीर हो तथा हृदय में उत्साह भरकर श्रीरामचन्द्रजी का विवाह देखने चले। जनकपुर को देखकर देवता इतने अनुरक्त हो गये कि उन सबको अपने-अपने लोक बहुत तुच्छ लगने लगे।

चौपाई

चितवहिं चकित बिचित्र बिताना। रचना सकल अलौकिक नाना॥ नगर नारि नर रूप निधाना। सुघर सुधरम सुसील सुजाना॥ ३ ॥

अर्थ:

विचित्र बितानों को तथा नाना प्रकार की सब अलौकिक रचनाओं को वे चकित होकर देख रहे हैं। नगर के स्त्री-पुरुष रूप के भण्डार, सुघड़, श्रेष्ठ धर्मात्मा, सुशील और सुजान हैं।

चौपाई

तिन्हहि देखि सब सुर सुरनारीं। भए नखत जनु बिधु उजिआरीं॥ बिधिहि भयउ आचरजु बिसेषी। निज करनी कछु कतहुँ न देखी॥ ४ ॥

अर्थ:

उन्हें देखकर सब देवता और सुरनारियाँ ऐसे हो गये जैसे चन्द्रमा के उजियाले में तारे फीके पड़ जाते हैं। ब्रह्माजी को विशेष आश्चर्य हुआ; क्योंकि वहाँ उन्होंने अपनी कोई करनी (रचना) कहीं देखी ही नहीं।

दोहा

सिवँ समुझाए देव सब जनि आचरज भुलाहु। हृदयँ बिचारहु धीर धरि सिय रघुबीर बिआहु॥ ३१४ ॥

अर्थ:

तब शिवजी ने सब देवताओं को समझाया कि तुम लोग आश्चर्य में मत भूलो। हृदय में धीरज धरकर विचार तो करो कि यह श्रीसीताजी का और श्रीरामचन्द्रजी का विवाह है।

दोहा 315 के अंतर्गत
चौपाई

जिन्ह कर नामु लेत जग माहीं। सकल अमंगल मूल नसाहीं॥ करतल होहिं पदारथ चारी। तेइ सिय रामु कहेउ कामारी॥ १ ॥

अर्थ:

जिनका नाम लेते ही जगत में सारे अमंगलों की जड़ नष्ट हो जाती है और चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) मुट्ठी में आ जाते हैं, ये वही [जगत् के माता-पिता] श्रीसीतारामजी हैं; काम के शत्रु शिवजी ने ऐसा कहा।

चौपाई

एहि बिधि संभु सुरन्ह समुझावा। पुनि आगें बर बसह चलावा॥ देवन्ह देखे दसरथु जाता। महामोद मन पुलकित गाता॥ २ ॥

अर्थ:

इस प्रकार शिवजी ने देवताओं को समझाया और फिर अपने श्रेष्ठ बैल को आगे बढ़ाया। देवताओं ने देखा कि दशरथजी मन में बड़े ही प्रसन्न और शरीर से पुलकित हुए चले जा रहे हैं।

चौपाई

साधु समाज संग महिदेवा। जनु तनु धरें करहिं सुख सेवा॥ सोहत साथ सुभग सुत चारी। जनु अपबरग सकल तनुधारी॥ ३ ॥

अर्थ:

उनके साथ साधु समाज और ब्राह्मणों की मण्डली ऐसी शोभा दे रही है, मानो तन धारण किए हुए सुख सेवा कर रहे हों। चारों सुन्दर पुत्र साथ में ऐसे सुशोभित हैं, मानो सम्पूर्ण मोक्ष (सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य) शरीर धारण किए हुए हों।

चौपाई

मरकत कनक बरन बर जोरी। देखि सुरन्ह भै प्रीति न थोरी॥ पुनि रामहि बिलोकि हियँ हरषे। नृपहि सराहि सुमन तिन्ह बरषे॥ ४ ॥

अर्थ:

मरकत मणि और सुवर्ण के रंग की सुन्दर जोड़ियों को देखकर देवताओं को कम प्रीति नहीं हुई (अर्थात् बहुत ही प्रीति हुई)। फिर श्रीरामचन्द्रजी को देखकर वे हृदय में अत्यन्त हर्षित हुए और राजा की सराहना करके उन्होंने फूल बरसाये।

दोहा

राम रूपु नख सिख सुभग बारहिं बार निहारि। पुलक गात लोचन सजल उमा समेत पुरारि॥ ३१५ ॥

अर्थ:

नख से शिखा तक श्रीरामचन्द्रजी के सुन्दर रूप को बार-बार देखते हुए पार्वतीजी सहित श्रीशिवजी का शरीर पुलकित हो गया और उनके नेत्र [प्रेमाश्रुओं के] जल से भर गये।

दोहा 316 के अंतर्गत
चौपाई

केकि कंठ दुति स्यामल अंगा। तड़ित बिनिंदक बसन सुरंगा॥ ब्याह बिभूषन बिबिध बनाए। मंगल सब सब भाँति सुहाए॥ १ ॥

अर्थ:

रामजी का मोर के कण्ठ-सी कान्तिवाला श्यामल अंग है। बिजली का अत्यन्त निरादर करनेवाले प्रकाशमय सुन्दर रंग के वस्त्र हैं। विवाह के विविध आभूषण बनाए गए हैं, जो सब प्रकार से मंगलकारी और सुहावने हैं।

चौपाई

सरद बिमल बिधु बदनु सुहावन। नयन नवल राजीव लजावन॥ सकल अलौकिक सुंदरताई। कहि न जाइ मनहीं मन भाई॥ २ ॥

अर्थ:

उनका सुन्दर मुख शरत्पूर्णिमा के निर्मल चन्द्रमा के समान और नेत्र नवीन कमल को लजानेवाले हैं। सारी सुन्दरता अलौकिक है। वह कही नहीं जा सकती, मन-ही-मन बहुत प्रिय लगती है।

चौपाई

बंधु मनोहर सोहहिं संगा। जात नचावत चपल तुरंगा॥ राजकुअँर बर बाजि देखावहिं। बंस प्रसंसक बिरिद सुनावहिं॥ ३ ॥

अर्थ:

साथ में मनोहर भाई शोभित हैं, जो चञ्चल घोड़ों को नचाते हुए चले जा रहे हैं। राजकुमार श्रेष्ठ घोड़ों को (उनकी चाल को) दिखला रहे हैं और वंश की प्रशंसा करनेवाले (मागध-भाट) विरुदावली सुना रहे हैं।

चौपाई

जेहि तुरंग पर रामु बिराजे। गति बिलोकि खगनायकु लाजे॥ कहि न जाइ सब भाँति सुहावा। बाजि बेषु जनु काम बनावा॥ ४ ॥

अर्थ:

जिस घोड़े पर श्रीरामजी विराजमान हैं, उसकी गति देखकर गरुड़ भी लजा जाते हैं। उसका वर्णन नहीं हो सकता, वह सब प्रकार से सुन्दर है। मानो कामदेव ने ही घोड़े का वेष धारण कर लिया हो।

छन्द

जनु बाजि बेषु बनाइ मनसिजु राम हित अति सोहई। आपनें बय बल रूप गुन गति सकल भुवन बिमोहई॥ जगमगत जीनु जराव जोति सुमोति मनि मानिक लगे। किंकिनि ललाम लगामु ललित बिलोकि सुर नर मुनि ठगे॥

अर्थ:

मानो श्रीरामचन्द्रजी के लिए कामदेव घोड़े का वेष बनाकर अत्यन्त शोभित हो रहा है। वह अपनी अवस्था, बल, रूप, गुण और चाल से समस्त लोकों को मोहित कर रहा है। सुंदर मोती, मणि और माणिक्य लगी हुई जड़ाऊ जीन ज्योति से जगमगा रही है। उसकी सुंदर घुँघरू लगी ललित लगाम को देखकर देवता, मनुष्य और मुनि सभी ठगे जाते हैं॥

दोहा

प्रभु मनसहिं लयलीन मनु चलत बाजि छबि पाव। भूषित उड़गन तड़ित घनु जनु बर बरहि नचाव॥ ३१६ ॥

अर्थ:

प्रभु की इच्छामें अपने मन को लीन किये चलता हुआ वह घोड़ा बड़ी शोभा पा रहा है। मानो तारागण तथा बिजली से अलंकृत मेघ सुन्दर मोर को नचा रहा हो।

दोहा 317 के अंतर्गत
चौपाई

जेहिं बर बाजि रामु असवारा। तेहि सारदउ न बरनै पारा॥ संकरु राम रूप अनुरागे। नयन पंचदस अति प्रिय लागे॥ १ ॥

अर्थ:

जिस श्रेष्ठ घोड़े पर श्रीरामचन्द्रजी सवार हैं, उसका वर्णन सरस्वतीजी भी नहीं कर सकतीं। शंकरजी श्रीरामचन्द्रजी के रूप में ऐसे अनुरक्त हुए कि उन्हें अपने पंद्रह नेत्र इस समय बहुत ही प्यारे लगने लगे।

चौपाई

हरि हित सहित रामु जब जोहे। रमा समेत रमापति मोहे॥ निरखि राम छबि बिधि हरषाने। आठइ नयन जानि पछिताने॥ २ ॥

अर्थ:

भगवान्‌ विष्णु ने जब प्रेमसहित श्रीराम को देखा, तब वे [रमणीयता की मूर्ति] श्रीलक्ष्मीजी के पति श्रीलक्ष्मीजी सहित मोहित हो गये। श्रीरामचन्द्रजी की शोभा देखकर ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुए, पर अपने आठ ही नेत्र जानकर पछताने लगे।

चौपाई

सुर सेनप उर बहुत उछाहू। बिधि ते डेवढ़ लोचन लाहू॥ रामहि चितव सुरेस सुजाना। गौतम श्रापु परम हित माना॥ ३ ॥

अर्थ:

देवताओं के सेनापति कार्तिकेय के हृदय में बड़ा उत्साह है, क्योंकि वे ब्रह्माजी से डेढ़ अर्थात् बारह नेत्रों से रामदर्शन का सुन्दर लाभ उठा रहे हैं। सुजान इन्द्र [अपने हजार नेत्रों से] श्रीरामचन्द्रजी को देख रहे हैं और गौतमजी के शाप को अपने लिए परम हितकर मान रहे हैं।

चौपाई

देव सकल सुरपतिहि सिहाहीं। आजु पुरंदर सम कोउ नाहीं॥ मुदित देवगन रामहि देखी। नृपसमाज दुहुँ हरषु बिसेषी॥ ४ ॥

अर्थ:

सभी देवता देवराज इन्द्र से ईर्ष्या कर रहे हैं और कह रहे हैं कि आज इन्द्र के समान भाग्यवान् दूसरा कोई नहीं है। श्रीरामचन्द्रजी को देखकर देवगण प्रसन्न हैं और दोनों राजाओं के समाज में विशेष हर्ष छा रहा है।

छन्द

अति हरषु राजसमाज दुहु दिसि दुंदुभीं बाजहिं घनी। बरषहिं सुमन सुर हरषि कहि जय जयति जय रघुकुलमनी॥ एहि भाँति जानि बरात आवत बाजने बहु बाजहीं। रानी सुआसिनि बोलि परिछनि हेतु मंगल साजहीं॥

अर्थ:

दोनों ओर से राजसमाज में अत्यन्त हर्ष है और बड़े जोर से नगाड़े बज रहे हैं। देवता प्रसन्न होकर और “रघुकुलमणि श्रीराम की जय हो, जय हो, जय हो” कहकर फूल बरसा रहे हैं। इस प्रकार बारात को आती हुई जानकर बहुत प्रकार के बाजे बजने लगे और रानी सुहागिन स्त्रियों को बुलाकर परछन के लिये मंगल साजने लगीं॥

दोहा

सजि आरती अनेक बिधि मंगल सकल सँवारि। चलीं मुदित परिछनि करन गजगामिनि बर नारि॥ ३१७ ॥

अर्थ:

अनेक प्रकार से आरती सजाकर और समस्त मंगल साजकर गजगामिनी (हाथी की-सी चाल वाली) उत्तम स्त्रियाँ आनन्दपूर्वक परछन के लिये चलीं।

दोहा 318 के अंतर्गत
चौपाई

बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि। सब निज तन छबि रति मदु मोचनि॥ पहिरें बरन बरन बर चीरा। सकल बिभूषन सजें सरीरा॥ १ ॥

अर्थ:

सभी स्त्रियाँ चन्द्रमुखी (चन्द्रमा के समान मुखवाली) और सभी मृगलोचनी (हरिण की-सी आँखोंवाली) हैं और सभी अपने शरीर की शोभा से रति के मद को छुड़ानेवाली हैं। रंग-रंग की सुन्दर साड़ियाँ पहने हैं और शरीर पर सब आभूषण सजे हुए हैं।

चौपाई

सकल सुमंगल अंग बनाएँ। करहिं गान कलकंठि लजाएँ॥ कंकन किंकिनि नूपुर बाजहिं। चालि बिलोकि काम गज लाजहिं॥ २ ॥

अर्थ:

समस्त अंगों को सुन्दर मंगल पदार्थों से सजाये हुए वे कोयल को भी लजाती हुईं [मधुर स्वर से] गान कर रही हैं। कंगन, किंकिनी और नूपुर बज रहे हैं। स्त्रियों की चाल देखकर कामदेव के हाथी भी लजा जाते हैं।

चौपाई

बाजहिं बाजने बिबिध प्रकारा। नभ अरु नगर सुमंगलचारा॥ सची सारदा रमा भवानी। जे सुरतिय सुचि सहज सयानी॥ ३ ॥

अर्थ:

अनेक प्रकार के बाजे बज रहे हैं, आकाश और नगर दोनों स्थानों में सुन्दर मंगलाचार हो रहे हैं। शची (इन्द्राणी), सरस्वती, लक्ष्मी, भवानी और जो सुरतियाँ शुचि सहज सयानी थीं,

चौपाई

कपट नारि बर बेष बनाई। मिलीं सकल रनिवासहिं जाई॥ करहिं गान कल मंगल बानीं। हरष बिबस सब काहुँ न जानीं॥ ४ ॥

अर्थ:

वे सब कपट से सुन्दर स्त्री का वेश बनाकर रनिवास में जा मिलीं और मनोहर वाणी से मंगलगान करने लगीं। सब कोई हर्ष के वश थे, अतः किसी ने उन्हें पहचाना नहीं।

छन्द

को जान केहि आनंद बस सब ब्रह्मु बर परिछन चली। कल गान मधुर निसान बरषहिं सुमन सुर सोभा भली॥ आनंदकंदु बिलोकि दूलहु सकल हियँ हरषित भई। अंभोज अंबक अंबु उमगि सुअंग पुलकावलि छई॥

अर्थ:

कौन किसे जाने! आनन्द के वश हुई सब ब्रह्म वर परछन करने चलीं। मनोहर गान हो रहा है। मधुर नगाड़े बज रहे हैं, देवता फूल बरसा रहे हैं, बड़ी अच्छी शोभा है। आनन्दकन्द दूलह को देखकर सब स्त्रियाँ हृदय में हर्षित हुईं। उनके कमल-सरीखे नेत्रों में प्रेमाश्रुओं का जल उमड़ आया और सुन्दर अंगों में पुलकावली छा गयी॥

दोहा

जो सुखु भा सिय मातु मन देखि राम बर बेषु। सो न सकहिं कहि कलप सत सहस सारदा सेषु॥ ३१८ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी का वरवेष देखकर सीताजी की माता सुनयनाजी के मन में जो सुख हुआ, उसे हजारों सरस्वती और शेषजी सौ कल्पों में भी नहीं कह सकते [अथवा लाखों सरस्वती और शेष लाखों कल्पों में भी नहीं कह सकते]।

दोहा 319 के अंतर्गत
चौपाई

नयन नीरु हटि मंगल जानी। परिछनि करहिं मुदित मन रानी॥ बेद बिहित अरु कुल आचारू। कीन्ह भली बिधि सब ब्यवहारू॥ १ ॥

अर्थ:

मंगल-अवसर जानकर नेत्रों के जल को रोके हुए रानी प्रसन्न मन से परछन कर रही हैं। वेदों में कहे हुए तथा कुलाचार के अनुसार सभी व्यवहार रानी ने भलीभाँति किये।

चौपाई

पंच सबद धुनि मंगल गाना। पट पाँवड़े परहिं बिधि नाना॥ करि आरती अरघु तिन्ह दीन्हा। राम गमनु मंडप तब कीन्हा॥ २ ॥

अर्थ:

पञ्चशब्दों की ध्वनि और मंगलगान हो रहे हैं। नाना प्रकार के पट-पाँवड़े बिछ रहे हैं। आरती करके और अर्घ्य देकर उन्होंने श्रीरामजी को मण्डप में पहुँचाया।

चौपाई

दसरथु सहित समाज बिराजे। बिभव बिलोकि लोकपति लाजे॥ समयँ समयँ सुर बरषहिं फूला। सांति पढ़हिं महिसुर अनुकूला॥ ३ ॥

अर्थ:

दशरथजी अपनी मण्डली सहित विराजमान हुए। उनके वैभव को देखकर लोकपाल भी लजा गये। समय-समय पर देवता फूल बरसाते हैं और भूदेव ब्राह्मण समयानुकूल शान्ति-पाठ करते हैं।

चौपाई

नभ अरु नगर कोलाहल होई। आपनि पर कछु सुनइ न कोई॥ एहि बिधि रामु मंडपहिं आए। अरघु देइ आसन बैठाए॥ ४ ॥

अर्थ:

आकाश और नगर में कोलाहल हो रहा है। अपनी-परायी कोई कुछ भी नहीं सुनता। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी मण्डप में आये और अर्घ्य देकर आसन पर बैठाये गये।

छन्द

बैठारि आसन आरती करि निरखि बरु सुखु पावहीं। मनि बसन भूषन भूरि वारहिं नारि मंगल गावहीं॥ ब्रह्मादि सुरबर बिप्र बेष बनाइ कौतुक देखहीं। अवलोकि रघुकुलकमल रबिछबिसुफल जीवन लेखहीं॥

अर्थ:

आसन पर बैठाकर, आरती करके दूलह को देखकर स्त्रियाँ सुख पा रही हैं। वे ढेर-के-ढेर मणि, वस्त्र और गहने वार रही हैं, मंगल गा रही हैं। ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता ब्राह्मण-वेष बनाकर कौतुक देख रहे हैं। रघुकुल-रूपी कमल को प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य श्रीरामचन्द्रजी की छवि देखकर वे अपने जीवन को सफल मान रहे हैं॥

दोहा

नाऊ बारी भाट नट राम निछावरि पाइ। मुदित असीसहिं नाइ सिर हरषु न हृदयँ समाइ॥ ३१९ ॥

अर्थ:

नाई, बारी, भाट और नट श्रीरामचन्द्रजी की निछावर पाकर आनन्दित हो सिर नवाकर आशीष देते हैं; उनके हृदय में हर्ष समाता नहीं है।

दोहा 320 के अंतर्गत
चौपाई

मिले जनकु दसरथु अति प्रीतीं। करि बैदिक लौकिक सब रीतीं॥ मिलत महा दोउ राज बिराजे। उपमा खोजि खोजि कबि लाजे॥ १ ॥

अर्थ:

वैदिक और लौकिक सब रीतियाँ करके जनकजी और दशरथजी बड़े प्रेम से मिले। दोनों महाराज मिलते हुए बड़े ही शोभित हुए, कवि उनके लिये उपमा खोज-खोजकर लजा गये।

चौपाई

लही न कतहुँ हारि हियँ मानी। इन्ह सम एइ उपमा उर आनी॥ सामध देखि देव अनुरागे। सुमन बरषि जसु गावन लागे॥ २ ॥

अर्थ:

जब कहीं भी उपमा नहीं मिली, तब हृदय में हार मानकर उन्होंने मन में यही उपमा निश्चित की कि इनके समान ये ही हैं। समधियों का मिलाप या परस्पर सम्बन्ध देखकर देवता अनुरक्त हो गये और फूल बरसाकर उनका यश गाने लगे।

चौपाई

जगु बिरंचि उपजावा जब तें। देखे सुने ब्याह बहु तब तें॥ सकल भाँति सम साजु समाजू। सम समधी देखे हम आजू॥ ३ ॥

अर्थ:

जब से ब्रह्माजी ने जगत् को उत्पन्न किया, तब से हमने बहुत विवाह देखे-सुने; परन्तु सब प्रकार से समान साज-समाज और बराबरी के (पूर्ण समतायुक्त) समधी तो आज ही देखे।

चौपाई

देव गिरा सुनि सुंदर साँची। प्रीति अलौकिक दुहु दिसि माची॥ देत पाँवड़े अरघु सुहाए। सादर जनकु मंडपहिं ल्याए॥ ४ ॥

अर्थ:

देवताओं की सुन्दर सत्यवाणी सुनकर दोनों ओर अलौकिक प्रीति छा गयी। सुन्दर पाँवड़े और अर्घ्य देते हुए जनकजी दशरथजी को आदरपूर्वक मण्डप में ले आये।

छन्द

मंडपु बिलोकि बिचित्र रचनाँ रुचिरताँ मुनि मन हरे। निज पानि जनक सुजान सब कहुँ आनि सिंघासन धरे॥ कुल इष्ट सरिस बसिष्ट पूजे बिनय करि आसिष लही। कौसिकहि पूजत परम प्रीति कि रीति तौ न परै कही॥

अर्थ:

मण्डप को देखकर उसकी विचित्र रचना और सुन्दरता से मुनियों के मन भी हरे गये। सुजान जनकजी ने अपने हाथों से ला-लाकर सबके लिये सिंहासन रखे। उन्होंने अपने कुल के इष्टदेव के समान वसिष्ठजी की पूजा की और विनय करके आशीर्वाद प्राप्त किया। विश्वामित्रजी की पूजा करते समय की परम प्रीति की रीति तो कहते ही नहीं बनती॥

दोहा

बामदेव आदिक रिषय पूजे मुदित महीस। दिए दिब्य आसन सबहि सब सन लही असीस॥ ३२० ॥

अर्थ:

राजा ने वामदेव आदि ऋषियों की प्रसन्न मन से पूजा की। सभी को दिव्य आसन दिये और सबसे आशीर्वाद प्राप्त किया।

दोहा 321 के अंतर्गत
चौपाई

बहुरि कीन्हि कोसलपति पूजा। जानि ईस सम भाउ न दूजा॥ कीन्हि जोरि कर बिनय बड़ाई। कहि निज भाग्य बिभव बहुताई॥ १ ॥

अर्थ:

फिर उन्होंने कोसलाधीश राजा दशरथजी की पूजा, उन्हें ईश (महादेवजी) के समान जानकर, की; दूसरा भाव न था। तदनन्तर अपने भाग्य और वैभव की बहुताई कहकर हाथ जोड़कर विनय और बड़ाई की।

चौपाई

पूजे भूपति सकल बराती। समधी सम सादर सब भाँती॥ आसन उचित दिए सब काहू। कहौं काह मुख एक उछाहू॥ २ ॥

अर्थ:

राजा जनकजी ने सब बरातियों का समधी दशरथजी के समान ही सब प्रकार से आदरपूर्वक पूजन किया और सब को उचित आसन दिए। मैं एक मुख से उस उछाह का क्या वर्णन करूँ।

चौपाई

सकल बरात जनक सनमानी। दान मान बिनती बर बानी॥ बिधि हरि हरु दिसिपति दिनराऊ। जे जानहिं रघुबीर प्रभाऊ॥ ३ ॥

अर्थ:

राजा जनक ने दान, मान-सम्मान, विनय और उत्तम वाणी से सारी बारात का सम्मान किया। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दिक्पाल और सूर्य जो श्रीरघुबीरजी का प्रभाव जानते हैं।

चौपाई

कपट बिप्र बर बेष बनाएँ। कौतुक देखहिं अति सचु पाएँ॥ पूजे जनक देव सम जानें। दिए सुआसन बिनु पहिचानें॥ ४ ॥

अर्थ:

वे कपट से ब्राह्मणों का सुन्दर वेष बनाए बहुत ही सुख पाते हुए सब लीला देख रहे थे। जनकजी ने उनको देवताओं के समान जानकर उनका पूजन किया और बिना पहचाने भी उन्हें सुन्दर आसन दिए।

छन्द

पहिचान को केहि जान सबहि अपान सुधि भोरी भई। आनंद कंदु बिलोकि दूलहु उभय दिसि आनँदमई॥ सुर लखे राम सुजान पूजे मानसिक आसन दए। अवलोकि सीलु सुभाउ प्रभु को बिबुध मन प्रमुदित भए॥

अर्थ:

कौन किसको जाने-पहचाने! सबकी अपनी सुधि भोरी हुई है। आनन्दकन्द दूलह को देखकर दोनों ओर आनन्दमय स्थिति हो रही है। सुजान श्रीरामचन्द्रजी ने देवताओं को पहचान लिया और मानसिक पूजा करके उन्हें मानसिक आसन दिए। प्रभु का शील-स्वभाव देखकर देवगण मन में प्रमुदित हुए॥

दोहा

रामचंद्र मुख चंद्र छबि लोचन चारु चकोर। करत पान सादर सकल प्रेमु प्रमोदु न थोर॥ ३२१ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के मुखरूपी चन्द्रमा की छबि को सभी के सुन्दर नेत्ररूपी चकोर आदरपूर्वक पान कर रहे हैं; प्रेम और प्रमोद कम नहीं है (अर्थात् बहुत है)।

दोहा 322 के अंतर्गत
चौपाई

समउ बिलोकि बसिष्ठ बोलाए। सादर सतानंदु सुनि आए॥ बेगि कुअँरि अब आनहु जाई। चले मुदित मुनि आयसु पाई॥ १ ॥

अर्थ:

समय देखकर वसिष्ठजी ने शतानन्दजी को आदरपूर्वक बुलाया। वे सुनकर आदर के साथ आए। वसिष्ठजी ने कहा--अब जाकर राजकुमारी को शीघ्र ले आइए। मुनि की आज्ञा पाकर वे प्रसन्न होकर चले।

चौपाई

रानी सुनि उपरोहित बानी। प्रमुदित सखिन्ह समेत सयानी॥ बिप्र बधू कुल बृद्ध बोलाईं। करि कुलरीति सुमंगल गाईं॥ २ ॥

अर्थ:

बुद्धिमती रानी पुरोहित की वाणी सुनकर सखियों समेत बड़ी प्रसन्न हुईं। ब्राह्मणों की स्त्रियों और कुल की वृद्ध स्त्रियों को बुलाकर उन्होंने कुलरीति से सुन्दर मंगलगीत गाये।

चौपाई

नारि बेष जे सुर बर बामा। सकल सुभायँ सुंदरी स्यामा॥ तिन्हहि देखि सुखु पावहिं नारीं। बिनु पहिचानि प्रानहु ते प्यारीं॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रेष्ठ देवांगनाएँ, जो सुन्दर मनुष्य-स्त्रियों के वेष में हैं, सभी स्वभाव से ही सुन्दरी और श्यामा हैं। उनको देखकर रनिवास की स्त्रियाँ सुख पाती हैं और बिना पहचान के ही वे प्राणों से भी प्यारी हो रही हैं।

चौपाई

बार बार सनमानहिं रानी। उमा रमा सारद सम जानी॥ सीय सँवारि समाजु बनाई। मुदित मंडपहिं चलीं लवाई॥ ४ ॥

अर्थ:

उन्हें उमा, रमा और सरस्वती के समान जानकर रानी बार-बार उनका सम्मान करती हैं। सीताजी को सँवारकर समाज बनाया और प्रसन्न होकर उन्हें मण्डप में लिवा चलीं।

छन्द

चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर सजि सुमंगल भामिनीं। नवसप्त साजे सुंदरीं सब मत्त कुंजर गामिनीं॥ कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं काम कोकिल लाजहीं। मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गति बर बाजहीं॥

अर्थ:

सुन्दर मंगल वेश में सखियाँ सादर सीताजी को लिवा लाईं। सभी सुन्दरियाँ नवसप्त साजे हुए, मदमत्त हाथियों की चाल से चलने वाली हैं। मधुर गान सुनकर मुनि ध्यान त्याग देते हैं; काम की कोकिलाएँ लजाती हैं। मंजीर, नूपुर, कलित कंकण ताल-गति पर बड़े सुन्दर बजते हैं॥

दोहा

सोहति बनिता बृंद महुँ सहज सुहावनि सीय। छबि ललना गन मध्य जनु सुषमा तिय कमनीय॥ ३२२ ॥

अर्थ:

सहज ही सुन्दरी सीताजी स्त्रियों के समूह में इस प्रकार शोभा पा रही हैं, मानो छबिरूपी ललनाओं के समूह के बीच सुषमा-स्वरूप कोई कमनीय स्त्री सुशोभित हो।

दोहा 323 के अंतर्गत
चौपाई

सिय सुंदरता बरनि न जाई। लघु मति बहुत मनोहरताई॥ आवत दीखि बरातिन्ह सीता। रूप रासि सब भाँति पुनीता॥ १ ॥

अर्थ:

सीताजी की सुन्दरता का वर्णन नहीं किया जा सकता। बुद्धि छोटी है, पर मनोहरता बहुत बड़ी है। रूपराशि, सब प्रकार से पवित्र सीताजी को बरातियों ने आते देखा।

चौपाई

सबहि मनहिं मन किए प्रनामा। देखि राम भए पूरनकामा॥ हरषे दसरथ सुतन्ह समेता। कहि न जाइ उर आनँदु जेता॥ २ ॥

अर्थ:

सभी ने उन्हें मन-ही-मन प्रणाम किया। श्रीराम को देखकर तो सभी पूर्णकाम हो गये। राजा दशरथजी पुत्रों सहित हर्षित हुए। उनके हृदय में जितना आनन्द था, वह कहा नहीं जा सकता।

चौपाई

सुर प्रनामु करि बरिसहिं फूला। मुनि असीस धुनि मंगल मूला॥ गान निसान कोलाहलु भारी। प्रेम प्रमोद मगन नर नारी॥ ३ ॥

अर्थ:

देवता प्रणाम करके फूल बरसा रहे हैं। मुनियों की आशीष-ध्वनि मंगलमूल हो रही है। गान और निसान के कोलाहल से भारी शोर है। नर-नारी प्रेम और प्रमोद में मग्न हैं।

चौपाई

एहि बिधि सीय मंडपहिं आई। प्रमुदित सांति पढ़हिं मुनिराई॥ तेहि अवसर कर बिधि ब्यवहारू। दुहुँ कुलगुर सब कीन्ह अचारू॥ ४ ॥

अर्थ:

इस प्रकार सीताजी मण्डप में आयीं। मुनिराज बहुत ही आनन्दित होकर शान्तिपाठ पढ़ रहे हैं। उस अवसर की सब रीति, व्यवहार और कुलाचार दोनों कुलगुरुओं ने किये।

छन्द

आचारु करि गुर गौरि गनपति मुदित बिप्र पुजावहीं। सुर प्रगटि पूजा लेहिं देहिं असीस अति सुखु पावहीं॥ मधुपर्क मंगल द्रब्य जो जेहि समय मुनि मन महुँ चहैं। भरे कनक कोपर कलस सो तब लिएहिं परिचारक रहैं॥ १ ॥

अर्थ:

आचार करके गुरु, गौरी, गणपति और ब्राह्मणों की पूजा मुदित होकर कराई जाती है। देव प्रकट होकर पूजा लेते हैं, आशीष देते हैं और अति सुख पाते हैं। मधुपर्क और मंगल द्रव्य जो जिस समय मुनि मन में चाहें, भरे हुए सोने के कोपर और कलश तब परिचारक ले आते हैं।

छन्द

कुल रीति प्रीति समेत रबि कहि देत सबु सादर कियो। एहि भाँति देव पुजाइ सीतहि सुभग सिंघासनु दियो॥ सिय राम अवलोकनि परसपर प्रेमु काहु न लखि परै। मन बुद्धि बर बानी अगोचर प्रगट कबि कैसें करै॥ २ ॥

अर्थ:

कुल रीति प्रीति समेत रबि कहि देत सबु सादर कियो। इस भाँति देव पुजाइ सीतहि सुभग सिंघासनु दियो। सिय राम अवलोकनि परस्पर प्रेमु काहु न लखि परै। मन बुद्धि बर बानी अगोचर प्रगट कबि कैसे करै॥

दोहा

होम समय तनु धरि अनलु अति सुख आहुति लेहिं। बिप्र बेष धरि बेद सब कहि बिबाह बिधि देहिं॥ ३२३ ॥

अर्थ:

होम के समय अग्निदेव शरीर धारण करके बड़े सुख से आहुति लेते हैं। ब्राह्मण का वेष धरकर वेद सब कहकर विवाह की विधियाँ देते हैं।