बारात का जनकपुर में आना और स्वागतादि
अयोध्या की बारात जनकपुर पहुँचती है, जहाँ उसका अत्यंत आदर और उत्साह से स्वागत होता है। नगर मंगलमय हो उठता है और दोनों कुलों का मिलन आनंद से भर जाता है।
बालकाण्ड · प्रकरण ५६ / ५९
प्रकरण पाठ
बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं। मुदित देव दुंदुभीं बजावहिं॥ बस्तु सकल राखीं नृप आगें। बिनय कीन्हि तिन्ह अति अनुरागें॥ १ ॥
अर्थ:
देवसुन्दरियाँ फूल बरसाकर गीत गा रही हैं, और देवता आनन्दित होकर नगाड़े बजा रहे हैं। [अगवानी में आये हुए] उन लोगों ने सब चीजें दशरथजी के आगे रख दीं और अत्यन्त प्रेम से विनती की।
हरषि बंधु दोउ हृदयँ लगाए। पुलक अंग अंबक जल छाए॥ चले जहाँ दसरथु जनवासे। मनहुँ सरोबर तकेउ पिआसे॥ ४ ॥
अर्थ:
प्रसन्न होकर उन्होंने दोनों भाइयों को हृदय से लगा लिया। उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रों में (प्रेमाशुओं का) जल भर आया। वे उस जनवासा को चले, जहाँ दशरथजी थे। मानो सरोवर प्यासे की ओर लक्ष्य करके चला हो।
पुनि दंडवत करत दोउ भाई। देखि नृपति उर सुखु न समाई॥ सुत हियँ लाइ दुसह दुख मेटे। मृतक सरीर प्रान जनु भेंटे॥ २ ॥
अर्थ:
फिर दोनों भाइयों को दण्डवत् प्रणाम करते देखकर राजा के हृदय में सुख समाया नहीं। पुत्रों को [उठाकर] हृदय से लगाकर उन्होंने अपने [वियोगजनित] दुःसह दुःख को मिटाया। मानो मृतक शरीर को प्राण मिल गये हों।
भरत सहानुज कीन्ह प्रनामा। लिए उठाइ लाइ उर रामा॥ हरषे लखन देखि दोउ भ्राता। मिले प्रेम परिपूरित गाता॥ ४ ॥
अर्थ:
भरतजी ने छोटे भाई शत्रुघ्न सहित श्रीरामचन्द्रजी को प्रणाम किया। श्रीरामजी ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया। लक्ष्मणजी दोनों भाइयों को देखकर हर्षित हुए और प्रेम से परिपूर्ण हुए शरीर से उनसे मिले।
रामहि देखि बरात जुड़ानी। प्रीति कि रीति न जाति बखानी॥ नृप समीप सोहहिं सुत चारी। जनु धन धरमादिक तनुधारी॥ १ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी को देखकर बारात शीतल हुई (राम के वियोग में सबके हृदय में जो आग जल रही थी, वह शान्त हो गयी)। प्रीति की रीति का बखान नहीं हो सकता। राजा के पास चारों पुत्र ऐसी शोभा पा रहे हैं मानो अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष शरीर धारण किये हुए हों।
जनक सुकृत मूरति बैदेही। दसरथ सुकृत रामु धरें देही॥ इन्ह सम काहुँ न सिव अवराधे। काहुँ न इन्ह समान फल लाधे॥ १ ॥
अर्थ:
जनकजी के सुकृत (पुण्य) की मूर्ति जानकीजी हैं और दशरथजी के सुकृत देह धारण किये हुए श्रीरामजी हैं। इन [दोनों राजाओं] के समान किसी ने शिवजी की आराधना नहीं की; और न इनके समान किसी ने फल ही पाया।
कहहिं परसपर कोकिलबयनीं। एहि बिआहँ बड़ लाभु सुनयनीं॥ बड़ें भाग बिधि बात बनाई। नयन अतिथि होइहहिं दोउ भाई॥ ४ ॥
अर्थ:
कोयल के समान मधुर बोलनेवाली स्त्रियाँ आपस में कहती हैं कि हे सुन्दर नेत्रों वाली! इस विवाह में बड़ा लाभ है। बड़े भाग्य से विधाता ने सब बात बना दी है, ये दोनों भाई हमारे नेत्रों के अतिथि हुआ करेंगे।
सखि जस राम लखन कर जोटा। तैसेइ भूप संग दुइ ढोटा॥ स्याम गौर सब अंग सुहाए। ते सब कहहिं देखि जे आए॥ २ ॥
अर्थ:
हे सखी! जैसा श्रीराम-लक्ष्मण का जोड़ा है, वैसे ही राजा के साथ और भी दो कुमार हैं। वे भी एक श्याम और दूसरे गौर वर्ण के हैं। उनके भी सब अंग बहुत सुन्दर हैं। जो लोग उन्हें देख आये हैं, वे सब यही कहते हैं।
कहा एक मैं आजु निहारे। जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे॥ भरतु रामही की अनुहारी। सहसा लखि न सकहिं नर नारी॥ ३ ॥
अर्थ:
एक ने कहा—मैंने आज ही उन्हें देखा है; इतने सुन्दर हैं, मानो ब्रह्माजी ने उन्हें अपने हाथ सँवारा है। भरत तो श्रीरामचन्द्रजी की ही शक्ल-सूरत के हैं। स्त्री-पुरुष उन्हें सहसा पहचान नहीं सकते।
लखनु सत्रुसूदनु एकरूपा। नख सिख ते सब अंग अनूपा॥ मन भावहिं मुख बरनि न जाहीं। उपमा कहुँ त्रिभुवन कोउ नाहीं॥ ४ ॥
अर्थ:
लक्ष्मण और शत्रुघ्न दोनों का एक रूप है। नख से शिखा तक सभी अंग अनुपम हैं। मन को बड़े अच्छे लगते हैं, पर मुख से उनका वर्णन नहीं हो सकता। उनकी उपमा के योग्य तीनों लोकों में कोई नहीं है।
उपमा न कोउ कह दास तुलसी कतहुँ कबि कोबिद कहैं। बल बिनय बिद्या सील सोभा सिंधु इन्ह से एइ अहैं॥ पुर नारि सकल पसारि अंचल बिधिहि बचन सुनावहीं। ब्याहिअहुँ चारिउ भाइ एहिं पुर हम सुमंगल गावहीं॥
अर्थ:
दास तुलसी कहता है, कवि और कोविद (विद्वान) कहते हैं, इनकी उपमा कहीं कोई नहीं है। बल, विनय, विद्या, शील और शोभा के समुद्र इनसे ही हैं। जनकपुर की सब स्त्रियाँ आँचल फैलाकर विधाता को यह वचन (विनती) सुनाती हैं कि चारिउ भाइयों का विवाह इसी नगर में हो और हम सब सुमंगल गाएँ॥
पठै दीन्हि नारद सन सोई। गनी जनक के गनकन्ह जोई॥ सुनी सकल लोगन्ह यह बाता। कहहिं जोतिषी आहिं बिधाता॥ ४ ॥
अर्थ:
और उस (लग्नपत्रिका) को नारदजी के हाथ [जनकजी के यहाँ] भेज दिया। जनकजी के ज्योतिषियों ने भी वही गणना कर रखी थी। जब सब लोगों ने यह बात सुनी, तब वे कहने लगे—यहाँ के ज्योतिषी भी ब्रह्मा ही हैं।
तिन्हहि देखि सब सुर सुरनारीं। भए नखत जनु बिधु उजिआरीं॥ बिधिहि भयउ आचरजु बिसेषी। निज करनी कछु कतहुँ न देखी॥ ४ ॥
अर्थ:
उन्हें देखकर सब देवता और सुरनारियाँ ऐसे हो गये जैसे चन्द्रमा के उजियाले में तारे फीके पड़ जाते हैं। ब्रह्माजी को विशेष आश्चर्य हुआ; क्योंकि वहाँ उन्होंने अपनी कोई करनी (रचना) कहीं देखी ही नहीं।
जिन्ह कर नामु लेत जग माहीं। सकल अमंगल मूल नसाहीं॥ करतल होहिं पदारथ चारी। तेइ सिय रामु कहेउ कामारी॥ १ ॥
अर्थ:
जिनका नाम लेते ही जगत में सारे अमंगलों की जड़ नष्ट हो जाती है और चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) मुट्ठी में आ जाते हैं, ये वही [जगत् के माता-पिता] श्रीसीतारामजी हैं; काम के शत्रु शिवजी ने ऐसा कहा।
साधु समाज संग महिदेवा। जनु तनु धरें करहिं सुख सेवा॥ सोहत साथ सुभग सुत चारी। जनु अपबरग सकल तनुधारी॥ ३ ॥
अर्थ:
उनके साथ साधु समाज और ब्राह्मणों की मण्डली ऐसी शोभा दे रही है, मानो तन धारण किए हुए सुख सेवा कर रहे हों। चारों सुन्दर पुत्र साथ में ऐसे सुशोभित हैं, मानो सम्पूर्ण मोक्ष (सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य) शरीर धारण किए हुए हों।
मरकत कनक बरन बर जोरी। देखि सुरन्ह भै प्रीति न थोरी॥ पुनि रामहि बिलोकि हियँ हरषे। नृपहि सराहि सुमन तिन्ह बरषे॥ ४ ॥
अर्थ:
मरकत मणि और सुवर्ण के रंग की सुन्दर जोड़ियों को देखकर देवताओं को कम प्रीति नहीं हुई (अर्थात् बहुत ही प्रीति हुई)। फिर श्रीरामचन्द्रजी को देखकर वे हृदय में अत्यन्त हर्षित हुए और राजा की सराहना करके उन्होंने फूल बरसाये।
केकि कंठ दुति स्यामल अंगा। तड़ित बिनिंदक बसन सुरंगा॥ ब्याह बिभूषन बिबिध बनाए। मंगल सब सब भाँति सुहाए॥ १ ॥
अर्थ:
रामजी का मोर के कण्ठ-सी कान्तिवाला श्यामल अंग है। बिजली का अत्यन्त निरादर करनेवाले प्रकाशमय सुन्दर रंग के वस्त्र हैं। विवाह के विविध आभूषण बनाए गए हैं, जो सब प्रकार से मंगलकारी और सुहावने हैं।
बंधु मनोहर सोहहिं संगा। जात नचावत चपल तुरंगा॥ राजकुअँर बर बाजि देखावहिं। बंस प्रसंसक बिरिद सुनावहिं॥ ३ ॥
अर्थ:
साथ में मनोहर भाई शोभित हैं, जो चञ्चल घोड़ों को नचाते हुए चले जा रहे हैं। राजकुमार श्रेष्ठ घोड़ों को (उनकी चाल को) दिखला रहे हैं और वंश की प्रशंसा करनेवाले (मागध-भाट) विरुदावली सुना रहे हैं।
जनु बाजि बेषु बनाइ मनसिजु राम हित अति सोहई। आपनें बय बल रूप गुन गति सकल भुवन बिमोहई॥ जगमगत जीनु जराव जोति सुमोति मनि मानिक लगे। किंकिनि ललाम लगामु ललित बिलोकि सुर नर मुनि ठगे॥
अर्थ:
मानो श्रीरामचन्द्रजी के लिए कामदेव घोड़े का वेष बनाकर अत्यन्त शोभित हो रहा है। वह अपनी अवस्था, बल, रूप, गुण और चाल से समस्त लोकों को मोहित कर रहा है। सुंदर मोती, मणि और माणिक्य लगी हुई जड़ाऊ जीन ज्योति से जगमगा रही है। उसकी सुंदर घुँघरू लगी ललित लगाम को देखकर देवता, मनुष्य और मुनि सभी ठगे जाते हैं॥
जेहिं बर बाजि रामु असवारा। तेहि सारदउ न बरनै पारा॥ संकरु राम रूप अनुरागे। नयन पंचदस अति प्रिय लागे॥ १ ॥
अर्थ:
जिस श्रेष्ठ घोड़े पर श्रीरामचन्द्रजी सवार हैं, उसका वर्णन सरस्वतीजी भी नहीं कर सकतीं। शंकरजी श्रीरामचन्द्रजी के रूप में ऐसे अनुरक्त हुए कि उन्हें अपने पंद्रह नेत्र इस समय बहुत ही प्यारे लगने लगे।
हरि हित सहित रामु जब जोहे। रमा समेत रमापति मोहे॥ निरखि राम छबि बिधि हरषाने। आठइ नयन जानि पछिताने॥ २ ॥
अर्थ:
भगवान् विष्णु ने जब प्रेमसहित श्रीराम को देखा, तब वे [रमणीयता की मूर्ति] श्रीलक्ष्मीजी के पति श्रीलक्ष्मीजी सहित मोहित हो गये। श्रीरामचन्द्रजी की शोभा देखकर ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुए, पर अपने आठ ही नेत्र जानकर पछताने लगे।
सुर सेनप उर बहुत उछाहू। बिधि ते डेवढ़ लोचन लाहू॥ रामहि चितव सुरेस सुजाना। गौतम श्रापु परम हित माना॥ ३ ॥
अर्थ:
देवताओं के सेनापति कार्तिकेय के हृदय में बड़ा उत्साह है, क्योंकि वे ब्रह्माजी से डेढ़ अर्थात् बारह नेत्रों से रामदर्शन का सुन्दर लाभ उठा रहे हैं। सुजान इन्द्र [अपने हजार नेत्रों से] श्रीरामचन्द्रजी को देख रहे हैं और गौतमजी के शाप को अपने लिए परम हितकर मान रहे हैं।
देव सकल सुरपतिहि सिहाहीं। आजु पुरंदर सम कोउ नाहीं॥ मुदित देवगन रामहि देखी। नृपसमाज दुहुँ हरषु बिसेषी॥ ४ ॥
अर्थ:
सभी देवता देवराज इन्द्र से ईर्ष्या कर रहे हैं और कह रहे हैं कि आज इन्द्र के समान भाग्यवान् दूसरा कोई नहीं है। श्रीरामचन्द्रजी को देखकर देवगण प्रसन्न हैं और दोनों राजाओं के समाज में विशेष हर्ष छा रहा है।
अति हरषु राजसमाज दुहु दिसि दुंदुभीं बाजहिं घनी। बरषहिं सुमन सुर हरषि कहि जय जयति जय रघुकुलमनी॥ एहि भाँति जानि बरात आवत बाजने बहु बाजहीं। रानी सुआसिनि बोलि परिछनि हेतु मंगल साजहीं॥
अर्थ:
दोनों ओर से राजसमाज में अत्यन्त हर्ष है और बड़े जोर से नगाड़े बज रहे हैं। देवता प्रसन्न होकर और “रघुकुलमणि श्रीराम की जय हो, जय हो, जय हो” कहकर फूल बरसा रहे हैं। इस प्रकार बारात को आती हुई जानकर बहुत प्रकार के बाजे बजने लगे और रानी सुहागिन स्त्रियों को बुलाकर परछन के लिये मंगल साजने लगीं॥
बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि। सब निज तन छबि रति मदु मोचनि॥ पहिरें बरन बरन बर चीरा। सकल बिभूषन सजें सरीरा॥ १ ॥
अर्थ:
सभी स्त्रियाँ चन्द्रमुखी (चन्द्रमा के समान मुखवाली) और सभी मृगलोचनी (हरिण की-सी आँखोंवाली) हैं और सभी अपने शरीर की शोभा से रति के मद को छुड़ानेवाली हैं। रंग-रंग की सुन्दर साड़ियाँ पहने हैं और शरीर पर सब आभूषण सजे हुए हैं।
सकल सुमंगल अंग बनाएँ। करहिं गान कलकंठि लजाएँ॥ कंकन किंकिनि नूपुर बाजहिं। चालि बिलोकि काम गज लाजहिं॥ २ ॥
अर्थ:
समस्त अंगों को सुन्दर मंगल पदार्थों से सजाये हुए वे कोयल को भी लजाती हुईं [मधुर स्वर से] गान कर रही हैं। कंगन, किंकिनी और नूपुर बज रहे हैं। स्त्रियों की चाल देखकर कामदेव के हाथी भी लजा जाते हैं।
को जान केहि आनंद बस सब ब्रह्मु बर परिछन चली। कल गान मधुर निसान बरषहिं सुमन सुर सोभा भली॥ आनंदकंदु बिलोकि दूलहु सकल हियँ हरषित भई। अंभोज अंबक अंबु उमगि सुअंग पुलकावलि छई॥
अर्थ:
कौन किसे जाने! आनन्द के वश हुई सब ब्रह्म वर परछन करने चलीं। मनोहर गान हो रहा है। मधुर नगाड़े बज रहे हैं, देवता फूल बरसा रहे हैं, बड़ी अच्छी शोभा है। आनन्दकन्द दूलह को देखकर सब स्त्रियाँ हृदय में हर्षित हुईं। उनके कमल-सरीखे नेत्रों में प्रेमाश्रुओं का जल उमड़ आया और सुन्दर अंगों में पुलकावली छा गयी॥
बैठारि आसन आरती करि निरखि बरु सुखु पावहीं। मनि बसन भूषन भूरि वारहिं नारि मंगल गावहीं॥ ब्रह्मादि सुरबर बिप्र बेष बनाइ कौतुक देखहीं। अवलोकि रघुकुलकमल रबिछबिसुफल जीवन लेखहीं॥
अर्थ:
आसन पर बैठाकर, आरती करके दूलह को देखकर स्त्रियाँ सुख पा रही हैं। वे ढेर-के-ढेर मणि, वस्त्र और गहने वार रही हैं, मंगल गा रही हैं। ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता ब्राह्मण-वेष बनाकर कौतुक देख रहे हैं। रघुकुल-रूपी कमल को प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य श्रीरामचन्द्रजी की छवि देखकर वे अपने जीवन को सफल मान रहे हैं॥
लही न कतहुँ हारि हियँ मानी। इन्ह सम एइ उपमा उर आनी॥ सामध देखि देव अनुरागे। सुमन बरषि जसु गावन लागे॥ २ ॥
अर्थ:
जब कहीं भी उपमा नहीं मिली, तब हृदय में हार मानकर उन्होंने मन में यही उपमा निश्चित की कि इनके समान ये ही हैं। समधियों का मिलाप या परस्पर सम्बन्ध देखकर देवता अनुरक्त हो गये और फूल बरसाकर उनका यश गाने लगे।
मंडपु बिलोकि बिचित्र रचनाँ रुचिरताँ मुनि मन हरे। निज पानि जनक सुजान सब कहुँ आनि सिंघासन धरे॥ कुल इष्ट सरिस बसिष्ट पूजे बिनय करि आसिष लही। कौसिकहि पूजत परम प्रीति कि रीति तौ न परै कही॥
अर्थ:
मण्डप को देखकर उसकी विचित्र रचना और सुन्दरता से मुनियों के मन भी हरे गये। सुजान जनकजी ने अपने हाथों से ला-लाकर सबके लिये सिंहासन रखे। उन्होंने अपने कुल के इष्टदेव के समान वसिष्ठजी की पूजा की और विनय करके आशीर्वाद प्राप्त किया। विश्वामित्रजी की पूजा करते समय की परम प्रीति की रीति तो कहते ही नहीं बनती॥
पहिचान को केहि जान सबहि अपान सुधि भोरी भई। आनंद कंदु बिलोकि दूलहु उभय दिसि आनँदमई॥ सुर लखे राम सुजान पूजे मानसिक आसन दए। अवलोकि सीलु सुभाउ प्रभु को बिबुध मन प्रमुदित भए॥
अर्थ:
कौन किसको जाने-पहचाने! सबकी अपनी सुधि भोरी हुई है। आनन्दकन्द दूलह को देखकर दोनों ओर आनन्दमय स्थिति हो रही है। सुजान श्रीरामचन्द्रजी ने देवताओं को पहचान लिया और मानसिक पूजा करके उन्हें मानसिक आसन दिए। प्रभु का शील-स्वभाव देखकर देवगण मन में प्रमुदित हुए॥
नारि बेष जे सुर बर बामा। सकल सुभायँ सुंदरी स्यामा॥ तिन्हहि देखि सुखु पावहिं नारीं। बिनु पहिचानि प्रानहु ते प्यारीं॥ ३ ॥
अर्थ:
श्रेष्ठ देवांगनाएँ, जो सुन्दर मनुष्य-स्त्रियों के वेष में हैं, सभी स्वभाव से ही सुन्दरी और श्यामा हैं। उनको देखकर रनिवास की स्त्रियाँ सुख पाती हैं और बिना पहचान के ही वे प्राणों से भी प्यारी हो रही हैं।
चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर सजि सुमंगल भामिनीं। नवसप्त साजे सुंदरीं सब मत्त कुंजर गामिनीं॥ कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं काम कोकिल लाजहीं। मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गति बर बाजहीं॥
अर्थ:
सुन्दर मंगल वेश में सखियाँ सादर सीताजी को लिवा लाईं। सभी सुन्दरियाँ नवसप्त साजे हुए, मदमत्त हाथियों की चाल से चलने वाली हैं। मधुर गान सुनकर मुनि ध्यान त्याग देते हैं; काम की कोकिलाएँ लजाती हैं। मंजीर, नूपुर, कलित कंकण ताल-गति पर बड़े सुन्दर बजते हैं॥
आचारु करि गुर गौरि गनपति मुदित बिप्र पुजावहीं। सुर प्रगटि पूजा लेहिं देहिं असीस अति सुखु पावहीं॥ मधुपर्क मंगल द्रब्य जो जेहि समय मुनि मन महुँ चहैं। भरे कनक कोपर कलस सो तब लिएहिं परिचारक रहैं॥ १ ॥
अर्थ:
आचार करके गुरु, गौरी, गणपति और ब्राह्मणों की पूजा मुदित होकर कराई जाती है। देव प्रकट होकर पूजा लेते हैं, आशीष देते हैं और अति सुख पाते हैं। मधुपर्क और मंगल द्रव्य जो जिस समय मुनि मन में चाहें, भरे हुए सोने के कोपर और कलश तब परिचारक ले आते हैं।
कुल रीति प्रीति समेत रबि कहि देत सबु सादर कियो। एहि भाँति देव पुजाइ सीतहि सुभग सिंघासनु दियो॥ सिय राम अवलोकनि परसपर प्रेमु काहु न लखि परै। मन बुद्धि बर बानी अगोचर प्रगट कबि कैसें करै॥ २ ॥
अर्थ:
कुल रीति प्रीति समेत रबि कहि देत सबु सादर कियो। इस भाँति देव पुजाइ सीतहि सुभग सिंघासनु दियो। सिय राम अवलोकनि परस्पर प्रेमु काहु न लखि परै। मन बुद्धि बर बानी अगोचर प्रगट कबि कैसे करै॥