निज पानि मनि महुँ देखिअति मूरति
निज पानि मनि महुँ देखिअति मूरति
छन्द ३, दोहा ३२७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
छन्द पाठ
निज पानि मनि महुँ देखिअति मूरति सुरूपनिधान की। चालति न भुजबल्ली बिलोकनि बिरह भय बस जानकी॥ कौतुक बिनोद प्रमोदु प्रेमु न जाइ कहि जानहिं अलीं। बर कुअँरि सुंदर सकल सखीं लवाइ जनवासेहि चलीं॥ ३ ॥
अर्थ
अपने हाथ की मणियों में सुन्दर रूप के भण्डार की मूर्ति दिखाई देती है। यह देखकर जानकीजी दर्शन में वियोग के भयवश बाहुरूपी लता को नहीं हिलातीं-डुलातीं। कौतुक, विनोद, प्रमोद और प्रेम का वर्णन नहीं किया जा सकता; उन्हें सखियाँ ही जानती हैं। तब वर-कन्याओं को सभी सुन्दर सखियाँ जनवासे को लिवा चलीं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीसीता-राम विवाह” प्रकरण का छन्द ३, दोहा ३२७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीता-राम सहित चारों राजकुमारों के विवाह और जनकपुर के मंगलमय उत्सव का वर्णन है।
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श्रीसीता-राम विवाह