गाथे महामनि मौर मंजुल अंग सब

छन्द १, दोहा ३२७ के अंतर्गत · बालकाण्ड

छन्द पाठ

गाथे महामनि मौर मंजुल अंग सब चित चोरहीं। पुर नारि सुर सुंदरीं बरहि बिलोकि सब तिन तोरहीं॥ मनि बसन भूषन वारि आरति करहिं मंगल गावहीं। सुर सुमन बरिसहिं सूत मागध बंदि सुजसु सुनावहीं॥ १ ॥

अर्थ

सुन्दर मौर में बहुमूल्य मणियाँ गुँथी हुई हैं, सभी अंग चित्त को चुराये लेते हैं। सब नगर की स्त्रियाँ और देवसुंदरियाँ दूलह को देखकर तिनका तोड़ रही हैं (उनकी बलैयाँ ले रही हैं) और मणि, वस्त्र तथा आभूषण वार कर आरती उतार रही हैं और मंगल गा रही हैं। देवता फूल बरसा रहे हैं और सूत, मागध तथा भाट सुयश सुना रहे हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “श्रीसीता-राम विवाह” प्रकरण का छन्द १, दोहा ३२७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीता-राम सहित चारों राजकुमारों के विवाह और जनकपुर के मंगलमय उत्सव का वर्णन है।

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श्रीसीता-राम विवाह