अरुन पराग जलजु भरि नीकें

चौपाई ५, दोहा ३२५ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

अरुन पराग जलजु भरि नीकें। ससिहि भूष अहि लोभ अमी कें॥ बहुरि बसिष्ठ दीन्हि अनुसासन। बरु दुलहिनि बैठे एक आसन॥ ५ ॥

अर्थ

मानो कमल को लाल पराग से अच्छी तरह भरकर अमृत के लोभ से साँप चन्द्रमा को भूषित कर रहा है। [यहाँ श्रीराम के हाथ को कमल की, सिंदूर को पराग की, श्रीराम की श्याम भुजा को साँप की और सीताजी के मुख को चन्द्रमा की उपमा दी गयी है] फिर वसिष्ठजी ने आज्ञा दी, तब दूलह और दुलहिन एक आसन पर बैठे।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “श्रीसीता-राम विवाह” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ३२५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीता-राम सहित चारों राजकुमारों के विवाह और जनकपुर के मंगलमय उत्सव का वर्णन है।

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श्रीसीता-राम विवाह