बैठे बरासन रामु जानकि मुदित मन
बैठे बरासन रामु जानकि मुदित मन
छन्द १, दोहा ३२५ के अंतर्गत · बालकाण्ड
छन्द पाठ
बैठे बरासन रामु जानकि मुदित मन दसरथु भए। तनु पुलक पुनि पुनि देखि अपनें सुकृत सुरतरु फल नए॥ भरि भुवन रहा उछाहु राम बिबाहु भा सबहीं कहा। केहि भाँति बरनि सिरात रसना एक यहु मंगलु महा॥ १ ॥
अर्थ
श्रीरामजी और जानकीजी श्रेष्ठ आसन पर बैठे; उन्हें देखकर दशरथजी मन में बहुत आनन्दित हुए। अपने सुकृतरूपी कल्पवृक्ष में नये फल [आये] देखकर उनका शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है। चौदहों भुवनों में उत्साह भर गया; सबने कहा कि श्रीरामचन्द्रजी का विवाह हो गया। जीभ एक है और यह मंगल महान् है; फिर भला, वह वर्णन करके किस प्रकार समाप्त किया जा सकता है!
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीसीता-राम विवाह” प्रकरण का छन्द १, दोहा ३२५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीता-राम सहित चारों राजकुमारों के विवाह और जनकपुर के मंगलमय उत्सव का वर्णन है।
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श्रीसीता-राम विवाह