तब जनक पाइ बसिष्ठ आयसु ब्याह
तब जनक पाइ बसिष्ठ आयसु ब्याह
छन्द २, दोहा ३२५ के अंतर्गत · बालकाण्ड
छन्द पाठ
तब जनक पाइ बसिष्ठ आयसु ब्याह साज सँवारि कै। मांडवी श्रुतकीरति उरमिला कुअँरि लईं हँकारि कै॥ कुसकेतु कन्या प्रथम जो गुन सील सुख सोभामई। सब रीति प्रीति समेत करि सो ब्याहि नृप भरतहि दई॥ २ ॥
अर्थ
तब वसिष्ठजी की आज्ञा पाकर जनकजी ने विवाह का सामान सजाकर माण्डवीजी, श्रुतकीर्तिजी और उर्मिलाजी—इन तीनों राजकुमारियों को बुला लिया। कुशकेतु की बड़ी कन्या माण्डवीजी को, जो गुण, शील, सुख और शोभा की रूप ही थीं, राजा जनक ने प्रेमपूर्वक सब रीतियाँ करके भरतजी को ब्याह दिया।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीसीता-राम विवाह” प्रकरण का छन्द २, दोहा ३२५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीता-राम सहित चारों राजकुमारों के विवाह और जनकपुर के मंगलमय उत्सव का वर्णन है।
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श्रीसीता-राम विवाह