अस कहि रही चरन गहि रानी
अस कहि रही चरन गहि रानी
चौपाई १, दोहा ३३७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
अस कहि रही चरन गहि रानी। प्रेम पंक जनु गिरा समानी॥ सुनि सनेहसानी बर बानी। बहुबिधि राम सासु सनमानी॥ १ ॥
अर्थ
ऐसा कहकर रानी चरणोंको पकड़कर[चुप] रह गयीं। मानो उनकी वाणी प्रेमरूपी दलदलमें समा गयी हो। स्नेहसे सनी हुई श्रेष्ठ वाणी सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने सासका बहुत प्रकारसे सम्मान किया।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीसीता-राम विवाह” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३३७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीता-राम सहित चारों राजकुमारों के विवाह और जनकपुर के मंगलमय उत्सव का वर्णन है।
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श्रीसीता-राम विवाह