लागे पखारन पाय पंकज प्रेम तन

छन्द १, दोहा ३२४ के अंतर्गत · बालकाण्ड

छन्द पाठ

लागे पखारन पाय पंकज प्रेम तन पुलकावली। नभ नगर गान निसान जय धुनि उमगि जनु चहुँ दिसि चली॥ जे पद सरोज मनोज अरि उर सर सदैव बिराजहीं। जेसकृतसुमिरतबिमलता मनसकल कलि मल भाजहीं॥ १ ॥

अर्थ

वे श्रीरामजी के चरणकमलों को पखारने लगे, प्रेम से उनके शरीर में पुलकावली छा रही है। आकाश और नगर में गान, नगाड़े और जय-ध्वनि की आवाज़ मानो चारों दिशाओं में उमड़ चली। जो चरणसरोज कामदेव के शत्रु श्रीशिवजी के उर-सरोवर में सदा ही विराजते हैं, जिनका स्मरण करने से मन में निर्मलता आ जाती है और कलियुग के सारे मल भाग जाते हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “श्रीसीता-राम विवाह” प्रकरण का छन्द १, दोहा ३२४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीता-राम सहित चारों राजकुमारों के विवाह और जनकपुर के मंगलमय उत्सव का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
श्रीसीता-राम विवाह