बृंदारका गन सुमन बरिसहिं राउ जनवासेहि
बृंदारका गन सुमन बरिसहिं राउ जनवासेहि
छन्द ४, दोहा ३२६ के अंतर्गत · बालकाण्ड
छन्द पाठ
बृंदारका गन सुमन बरिसहिं राउ जनवासेहि चले। दुंदुभी जय धुनि बेद धुनि नभ नगर कौतूहल भले॥ तब सखीं मंगल गान करत मुनीस आयसु पाइ कै। दूलह दुलहिनिन्ह सहित सुंदरि चलीं कोहबर ल्याइ कै॥ ४ ॥
अर्थ
देवतागण फूल बरसा रहे हैं; राजा जनवासे को चले। नगाड़े की ध्वनि, जयध्वनि और वेद की ध्वनि हो रही है; आकाश और नगर दोनों में खूब कौतूहल हो रहा है (आनन्द छा रहा है)। तब मुनीश की आज्ञा पाकर सुन्दरी सखियाँ मंगल गान करती हुई दुलहिनों सहित दूल्हों को लिवाकर कोहबर को चलीं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीसीता-राम विवाह” प्रकरण का छन्द ४, दोहा ३२६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीता-राम सहित चारों राजकुमारों के विवाह और जनकपुर के मंगलमय उत्सव का वर्णन है।
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श्रीसीता-राम विवाह