कोहबरहिं आने कुअँर कुअँरि सुआसिनिन्ह सुख
कोहबरहिं आने कुअँर कुअँरि सुआसिनिन्ह सुख
छन्द २, दोहा ३२७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
छन्द पाठ
कोहबरहिं आने कुअँर कुअँरि सुआसिनिन्ह सुख पाइ कै। अति प्रीति लौकिक रीति लागीं करन मंगल गाइ कै॥ लहकौरि गौरि सिखाव रामहि सीय सन सारद कहैं। रनिवासु हास बिलास रस बस जन्म को फलु सब लहैं॥ २ ॥
अर्थ
सुहागिनी स्त्रियाँ सुख पाकर कुँअर और कुमारियों को कोहबर (कुलदेवता के स्थान) में लायीं और अत्यन्त प्रेम से मंगलगीत गा-गाकर लौकिक रीति करने लगीं। गौरीजी श्रीरामचन्द्रजी को लहकौर (वर-वधू का परस्पर ग्रास देना) सिखाती हैं और सरस्वतीजी सीताजी को सिखाती हैं। रनिवास हास-विलास के रस में मग्न है, [श्रीरामजी और सीताजी को देख-देखकर] सभी जन्म का फल पा रही हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीसीता-राम विवाह” प्रकरण का छन्द २, दोहा ३२७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीता-राम सहित चारों राजकुमारों के विवाह और जनकपुर के मंगलमय उत्सव का वर्णन है।
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श्रीसीता-राम विवाह