दीन्ह जाचकन्हि जो जेहि भावा
दीन्ह जाचकन्हि जो जेहि भावा
चौपाई ४, दोहा ३२६ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
दीन्ह जाचकन्हि जो जेहि भावा। उबरा सो जनवासेहिं आवा॥ तब कर जोरि जनकु मृदु बानी। बोले सब बरात सनमानी॥ ४ ॥
अर्थ
उन्होंने वह दहेज का सामान याचकों को, जो जिसे अच्छा लगा, दे दिया। जो बच रहा, वह जनवासे में चला आया। तब जनकजी हाथ जोड़कर सारी बारात का सम्मान करते हुए कोमल वाणी से बोले।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीसीता-राम विवाह” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३२६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीता-राम सहित चारों राजकुमारों के विवाह और जनकपुर के मंगलमय उत्सव का वर्णन है।
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श्रीसीता-राम विवाह