अनुरूप बर दुलहिनि परस्पर लखि सकुच
छन्द ४, दोहा ३२५ के अंतर्गत · बालकाण्ड
छन्द पाठ
अनुरूप बर दुलहिनि परस्पर लखि सकुच हियँ हरषहीं। सब मुदित सुंदरता सराहहिं सुमन सुर गन बरषहीं॥ सुंदरीं सुंदर बरन्ह सह सब एक मंडप राजहीं। जनु जीव उर चारिउ अवस्था बिभुन सहित बिराजहीं॥ ४ ॥
अर्थ
दूलह और दुलहिनें परस्पर अपने-अपने अनुरूप जोड़ी को देखकर सकुचते हुए हृदय में हर्षित हो रही हैं। सब लोग प्रसन्न होकर उनकी सुन्दरता की सराहना करते हैं और देवगण फूल बरसा रहे हैं। सब सुन्दरी दुलहिनें सुन्दर दूल्हों के साथ एक ही मण्डप में ऐसी शोभा पा रही हैं, मानो जीव के हृदय में चारों अवस्थाएँ (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय) अपने चारों स्वामियों (विश्व, तैजस, प्राज्ञ और ब्रह्म) सहित विराजमान हों।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीसीता-राम विवाह” प्रकरण का छन्द ४, दोहा ३२५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीता-राम सहित चारों राजकुमारों के विवाह और जनकपुर के मंगलमय उत्सव का वर्णन है।