दशरथजी के पास जनकजी का दूत भेजना, अयोध्या से बारात का प्रस्थान
राजा जनक विवाह का शुभ समाचार अयोध्या भेजते हैं। संदेश पाकर महाराज दशरथ हर्षित होते हैं और समस्त राजपरिवार तथा बारात के साथ जनकपुर के लिए प्रस्थान करते हैं।
बालकाण्ड · प्रकरण ५५ / ५९
प्रकरण पाठ
हरषि चले निज निज गृह आए। पुनि परिचारक बोलि पठाए॥ रचहु बिचित्र बितान बनाई। सिर धरि बचन चले सचु पाई॥ ३ ॥
अर्थ:
महाजन प्रसन्न होकर चले और अपने-अपने घर आये। फिर राजा ने नौकरों को बुला भेजा [और उन्हें आज्ञा दी कि] विचित्र मण्डप सजाकर तैयार करो। यह सुनकर वे सब राजा के वचन सिर पर धरकर और सुख पाकर चले।
बेनु हरित मनिमय सब कीन्हे। सरल सपरब परहिं नहिं चीन्हे॥ कनक कलित अहिबेलि बनाई। लखि नहिं परइ सपरन सुहाई॥ १ ॥
अर्थ:
बाँस सब हरी-हरी मणियों (पन्ने) के सीधे और गाँठों से युक्त ऐसे बनाये जो पहचाने नहीं जाते थे [कि मणियों के हैं या साधारण]। सोने की सुन्दर नागबेलि (पान की लता) बनायी, जो पत्तों सहित ऐसी भली मालूम होती थी कि पहचानी नहीं जाती थी।
तेहि के रचि पचि बंध बनाए। बिच बिच मुकुता दाम सुहाए॥ मानिक मरकत कुलिस पिरोजा। चीरि कोरि पचि रचे सरोजा॥ २ ॥
अर्थ:
उसी नागबेलि को रचकर और पच्चीकारी करके बन्धन (बाँधने की रस्सी) बनाये। बीच-बीच में मोतियों की सुन्दर झालरें हैं। माणिक, पन्ने, हीरे और फिरोजे, इन रत्नों को चीरकर, कोरकर और पच्चीकारी करके, इनके [लाल, हरे, सफेद और फिरोजी रंग के] कमल बनाये।
दूलहु रामु रूप गुन सागर। सो बितानु तिहुँ लोक उजागर॥ जनक भवन कै सोभा जैसी। गृह गृह प्रति पुर देखिअ तैसी॥ ३ ॥
अर्थ:
जिस मण्डप में रूप और गुणों के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी दूल्हे होंगे, वह मण्डप तीनों लोकों में प्रसिद्ध होना ही चाहिए। जनकजी के महल की जैसी शोभा है, वैसी ही शोभा नगर के प्रत्येक घर की दिखाई देती है।
रामु लखनु उर कर बर चीठी। रहि गए कहत न खाटी मीठी॥ पुनि धरि धीर पत्रिका बाँची। हरषी सभा बात सुनि साँची॥ ३ ॥
अर्थ:
हृदय में राम और लक्ष्मण हैं, हाथ में सुन्दर चिट्ठी है, राजा उसे हाथ में लिये ही रह गये, खट्टी-मीठी कुछ भी कह न सके। फिर धीरज धरकर उन्होंने पत्रिका पढ़ी। सारी सभा सच्ची बात सुनकर हर्षित हो गयी।
स्यामल गौर धरें धनु भाथा। बय किसोर कौसिक मुनि साथा॥ पहिचानहु तुम्ह कहहु सुभाऊ। प्रेम बिबस पुनि पुनि कह राऊ॥ ३ ॥
अर्थ:
साँवले और गोरे शरीरवाले वे धनुष और तरकस धारण किये रहते हैं, किशोर अवस्था है, कौसिक मुनि के साथ हैं। तुम उनको पहचानते हो तो उनका स्वभाव बताओ। राजा प्रेम के वश होने से बार-बार यह कह रहे हैं।
सुनि सरोष भृगुनायकु आए। बहुत भाँति तिन्ह आँखि देखाए॥ देखि राम बलु निज धनु दीन्हा। करि बहु बिनय गवनु बन कीन्हा॥ १ ॥
अर्थ:
धनुष टूटने की बात सुनकर परशुरामजी क्रोधभरे आये और उन्होंने बहुत प्रकार से आँखें दिखलायीं। देख कर श्रीराम का बल, उन्होंने अपना धनुष दे दिया और बहुत प्रकार से विनती करके वन को गमन किया।
सुनि बोले गुर अति सुखु पाई। पुन्य पुरुष कहुँ महि सुख छाई॥ जिमि सरिता सागर महुँ जाहीं। जद्यपि ताहि कामना नाहीं॥ १ ॥
अर्थ:
सब समाचार सुनकर और अत्यन्त सुख पाकर गुरु बोले--पुण्यात्मा पुरुष के लिये पृथ्वी सुखों से छायी हुई है। जैसे नदियाँ समुद्र में जाती हैं, यद्यपि समुद्र को नदी की कामना नहीं होती।
तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ॥ तुम्ह गुर बिप्र धेनु सुर सेबी। तसि पुनीत कौसल्या देबी॥ २ ॥
अर्थ:
वैसे ही सुख और सम्पत्ति बिना ही बुलाये स्वाभाविक ही धर्मात्मा पुरुष के पास जाती हैं। तुम जैसे गुरु, ब्राह्मण, गाय और देवताओं की सेवा करनेवाले हो, वैसी ही पवित्र कौसल्या देवी भी हैं।
प्रेम प्रफुल्लित राजहिं रानी। मनहुँ सिखिनि सुनि बारिद बानी॥ मुदित असीस देहिं गुर नारीं। अति आनंद मगन महतारीं॥ २ ॥
अर्थ:
प्रेम में प्रफुल्लित हुई रानियाँ ऐसी सुशोभित हो रही हैं जैसे मोरनी बादलों की गरज सुनकर प्रफुल्लित होती है। बड़ी-बूढ़ी [अथवा गुरुजनों की] स्त्रियाँ प्रसन्न होकर आशीर्वाद दे रही हैं। माताएँ अत्यन्त आनन्द में मग्न हैं।
जहँ तहँ जूथ जूथ मिलि भामिनि। सजि नवसप्त सकल दुति दामिनि॥ बिधुबदनीं मृग सावक लोचनि। निज सरूप रति मानु बिमोचनि॥ १ ॥
अर्थ:
बिजली की-सी कान्तिवाली, चन्द्रमुखी, हरिण के बच्चे के-से नेत्रवाली और अपने सुन्दर रूप से कामदेव की स्त्री रति के अभिमान को छुड़ानेवाली सुहागिनी स्त्रियाँ सभी सोलहों श्रृंगार सजकर, जहाँ-तहाँ झुंड-की-झुंड मिलकर,।
गावहिं सुंदरि मंगल गीता। लै लै नामु रामु अरु सीता॥ बहुत उछाहु भवनु अति थोरा। मानहुँ उमगि चला चहु ओरा॥ ४ ॥
अर्थ:
सुन्दरी स्त्रियाँ श्रीरामजी और श्रीसीताजी का नाम ले-लेकर मङ्गलगीत गा रही हैं। उत्साह बहुत है और महल अत्यन्त ही छोटा है। इससे [उसमें न समाकर] मानो वह उत्साह (आनन्द) चारों ओर उमड़ चला है।
भरत सकल साहनी बोलाए। आयसु दीन्ह मुदित उठि धाए॥ रचि रुचि जीन तुरग तिन्ह साजे। बरन बरन बर बाजि बिराजे॥ २ ॥
अर्थ:
भरतजी ने सब साहनी (घुड़साल के अध्यक्ष) बुलाये और उन्हें [घोड़ों को सजाने की ] आज्ञा दी, वे प्रसन्न होकर उठ दौड़े। उन्होंने रुचि के साथ (यथायोग्य) जीनें कसकर घोड़े सजाये। रंग-रंग के उत्तम घोड़े शोभित हो गये।
सुभग सकल सुठि चंचल करनी। अय इव जरत धरत पग धरनी॥ नाना जाति न जाहिं बखाने। निदरि पवनु जनु चहत उड़ाने॥ ३ ॥
अर्थ:
सब घोड़े बड़े ही सुन्दर और चञ्चल करनी (चाल) के हैं। वे धरती पर ऐसे पैर रखते हैं जैसे जलते हुए लोहे पर रखते हों। अनेकों जाति के घोड़े हैं, जिनका वर्णन नहीं हो सकता। [ ऐसी तेज चाल के हैं] मानो हवा का निरादर करके उड़ना चाहते हों।
बाँधें बिरद बीर रन गाढ़े। निकसि भए पुर बाहेर ठाढ़े॥ फेरहिं चतुर तुरग गति नाना। हरषहिं सुनि सुनि पनव निसाना॥ १ ॥
अर्थ:
शूरता का बाना धारण किये हुए रणधीर वीर सब निकलकर नगर के बाहर आ खड़े हुए। वे चतुर अपने घोड़ों को तरह-तरह की चालों से फेर रहे हैं और भेरी तथा नगाड़े की आवाज सुन-सुनकर प्रसन्न हो रहे हैं।
रथ सारथिन्ह बिचित्र बनाए। ध्वज पताक मनि भूषन लाए॥ चवँर चारु किंकिनि धुनि करहीं। भानु जान सोभा अपहरहीं॥ २ ॥
अर्थ:
सारथियों ने ध्वजा, पताका, मणि और आभूषणों को लगाकर रथों को बहुत विलक्षण बना दिया है। उनमें सुन्दर चँवर लगे हैं और घंटियाँ सुन्दर शब्द कर रही हैं। वे रथ इतने सुन्दर हैं मानो सूर्य के रथ की शोभा को छीन लेते हैं।
कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं। कहि न जाहिं जेहि भाँति सँवारीं॥ चले मत्त गज घंट बिराजी। मनहुँ सुभग सावन घन राजी॥ १ ॥
अर्थ:
श्रेष्ठ हाथियों पर सुन्दर अंबारियाँ पड़ी हैं। वे जिस प्रकार सजायी गयी थीं, सो कहा नहीं जा सकता। मतवाले हाथी घंटों से सुशोभित होकर चले, मानो सावन के सुन्दर बादलों के समूह जा रहे हों।
गरजहिं गज घंटा धुनि घोरा। रथ रव बाजि हिंस चहु ओरा॥ निदरि घनहि घुर्म्मरहिं निसाना। निज पराइ कछु सुनिअ न काना॥ १ ॥
अर्थ:
हाथी गरज रहे हैं, उनके घंटों की भीषण ध्वनि हो रही है। चारों ओर रथों की घरघराहट और घोड़ों की हिनहिनाहट हो रही है। बादलों का निरादर करते हुए नगाड़े घोर शब्द कर रहे हैं। किसी को अपनी-परायी कोई बात कानों से सुनायी नहीं देती।
सहित बसिष्ठ सोह नृप कैसें। सुर गुर संग पुरंदर जैसें॥ करि कुल रीति बेद बिधि राऊ। देखि सबहि सब भाँति बनाऊ॥ १ ॥
अर्थ:
वसिष्ठजी के साथ [जाते हुए] राजा दशरथजी कैसे शोभित हो रहे हैं, जैसे देवगुरु बृहस्पतिजी के साथ इन्द्र हों। वेद की विधि से और कुल की रीति के अनुसार सब कार्य करके तथा सबको सब प्रकार से सजा हुआ देखकर,
घंट घंटि धुनि बरनि न जाहीं। सरव करहिं पाइक फहराहीं॥ करहिं बिदूषक कौतुक नाना। हास कुसल कल गान सुजाना॥ ४ ॥
अर्थ:
घंटे-घंटियों की ध्वनि का वर्णन नहीं हो सकता। पैदल चलने वाले सेवकगण अथवा पट्टेबाज कसरत के खेल कर रहे हैं और फहरा रहे हैं (आकाश में ऊँचे उछलते हुए जा रहे हैं)। हँसी करने में निपुण और सुन्दर गाने में चतुर विदूषक (मसखरे) तरह-तरह के तमाशे कर रहे हैं।
दाहिन काग सुखेत सुहावा। नकुल दरसु सब काहूँ पावा॥ सानुकूल बह त्रिबिध बयारी। सघट सबाल आव बर नारी॥ २ ॥
अर्थ:
दाहिनी ओर कौआ सुन्दर खेत में शोभा पा रहा है। नेवले का दर्शन भी सब किसी ने पाया। तीनों प्रकार की (शीतल, मन्द, सुगन्धित) हवा अनुकूल दिशा में चल रही है। श्रेष्ठ स्त्रियाँ भरे हुए घड़े और गोद में बालक लिये आ रही हैं।