दशरथजी के पास जनकजी का दूत भेजना, अयोध्या से बारात का प्रस्थान

राजा जनक विवाह का शुभ समाचार अयोध्या भेजते हैं। संदेश पाकर महाराज दशरथ हर्षित होते हैं और समस्त राजपरिवार तथा बारात के साथ जनकपुर के लिए प्रस्थान करते हैं।

बालकाण्ड · प्रकरण ५५ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

दूत अवधपुर पठवहु जाई। आनहिं नृप दसरथहि बोलाई॥ मुदित राउ कहि भलेहिं कृपाला। पठए दूत बोलि तेहि काला॥ १ ॥

अर्थ:

जाकर अवधपुर में दूत भेजो, जो राजा दशरथ जी को बुला लाएँ। राजा प्रसन्न होकर बोले-- हे कृपालु! बहुत अच्छा! और उसी समय दूतों को बुलाकर भेज दिया।

चौपाई

बहुरि महाजन सकल बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिर नाए॥ हाट बाट मंदिर सुरबासा। नगरु सँवारहु चारिहुँ पासा॥ २ ॥

अर्थ:

फिर सब महाजनों को बुलाया और सब ने आकर राजा को आदरपूर्वक सिर नवाया। [राजा ने कहा-] बाजार, रास्ते, मंदिर, देवालय और सारे नगर को चारों ओर से सजाओ।

चौपाई

हरषि चले निज निज गृह आए। पुनि परिचारक बोलि पठाए॥ रचहु बिचित्र बितान बनाई। सिर धरि बचन चले सचु पाई॥ ३ ॥

अर्थ:

महाजन प्रसन्न होकर चले और अपने-अपने घर आये। फिर राजा ने नौकरों को बुला भेजा [और उन्हें आज्ञा दी कि] विचित्र मण्डप सजाकर तैयार करो। यह सुनकर वे सब राजा के वचन सिर पर धरकर और सुख पाकर चले।

चौपाई

पठए बोलि गुनी तिन्ह नाना। जे बितान बिधि कुसल सुजाना॥ बिधिहि बंदि तिन्ह कीन्ह अरंभा। बिरचे कनक कदलि के खंभा॥ ४ ॥

अर्थ:

उन्होंने अनेक कारीगरों को बुला भेजा, जो मण्डप बनाने में कुशल और चतुर थे। उन्होंने ब्रह्मा की वन्दना करके कार्य आरम्भ किया और [पहले] सोने के केले के खंभे बनाये।

दोहा

हरित मनिन्ह के पत्र फल पदुमराग के फूल। रचना देखि बिचित्र अति मनु बिरंचि कर भूल॥ २८७ ॥

अर्थ:

हरी-हरी मणियों (पन्ने) के पत्ते और फल बनाये तथा पद्मराग मणियों (माणिक) के फूल बनाये। मण्डप की अत्यन्त विचित्र रचना देखकर ब्रह्मा का मन भी भूल गया।

दोहा 288 के अंतर्गत
चौपाई

बेनु हरित मनिमय सब कीन्हे। सरल सपरब परहिं नहिं चीन्हे॥ कनक कलित अहिबेलि बनाई। लखि नहिं परइ सपरन सुहाई॥ १ ॥

अर्थ:

बाँस सब हरी-हरी मणियों (पन्ने) के सीधे और गाँठों से युक्त ऐसे बनाये जो पहचाने नहीं जाते थे [कि मणियों के हैं या साधारण]। सोने की सुन्दर नागबेलि (पान की लता) बनायी, जो पत्तों सहित ऐसी भली मालूम होती थी कि पहचानी नहीं जाती थी।

चौपाई

तेहि के रचि पचि बंध बनाए। बिच बिच मुकुता दाम सुहाए॥ मानिक मरकत कुलिस पिरोजा। चीरि कोरि पचि रचे सरोजा॥ २ ॥

अर्थ:

उसी नागबेलि को रचकर और पच्चीकारी करके बन्धन (बाँधने की रस्सी) बनाये। बीच-बीच में मोतियों की सुन्दर झालरें हैं। माणिक, पन्ने, हीरे और फिरोजे, इन रत्नों को चीरकर, कोरकर और पच्चीकारी करके, इनके [लाल, हरे, सफेद और फिरोजी रंग के] कमल बनाये।

चौपाई

किए भृंग बहुरंग बिहंगा। गुंजहिं कूजहिं पवन प्रसंगा॥ सुर प्रतिमा खंभन गढ़ि काढ़ीं। मंगल द्रब्य लिएँ सब ठाढ़ीं॥ ३ ॥

अर्थ:

भौरे और बहुत रंगों के पक्षी बनाये, जो हवा के सहारे गूँजते और कूजते थे। खंभों पर देवताओं की मूर्तियाँ गढ़कर निकालीं, जो सब मंगल द्रव्य लिये खड़ी थीं।

चौपाई

चौकें भाँति अनेक पुराईं। सिंधुर मनिमय सहज सुहाईं॥ ४ ॥

अर्थ:

गजमुक्ताओं के सहज ही सुहावने अनेकों तरह के चौक पुराये।

दोहा

सौरभ पल्लव सुभग सुठि किए नीलमनि कोरि। हेम बौर मरकत घवरि लसत पाटमय डोरि॥ २८८ ॥

अर्थ:

नीलमणि को कोरकर अत्यन्त सुन्दर आम के पत्ते बनाये। सोने के बौर (आम के फूल) और रेशम की डोरी से बँधे हुए पन्ने के बने फलों के गुच्छे सुशोभित हैं।

दोहा 289 के अंतर्गत
चौपाई

रचे रुचिर बर बंदनिवारे। मनहुँ मनोभवँ फंद सँवारे॥ मंगल कलस अनेक बनाए। ध्वज पताक पट चमर सुहाए॥ १ ॥

अर्थ:

ऐसे सुन्दर और उत्तम बंदनवार बनाये मानो कामदेव ने फंदे सजाये हों। अनेकों मंगल-कलश और सुन्दर ध्वजा, पताका, पट और चँवर बनाये।

चौपाई

दीप मनोहर मनिमय नाना। जाइ न बरनि बिचित्र बिताना॥ जेहिं मंडप दुलहिनि बैदेही। सो बरनै असि मति कबि केही॥ २ ॥

अर्थ:

जिसमें मणियों के अनेकों सुन्दर दीपक हैं, उस विचित्र मण्डप का तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। जिस मण्डप में श्रीजानकीजी दुलहिन होंगी, किस कवि की ऐसी बुद्धि है जो उसका वर्णन कर सके।

चौपाई

दूलहु रामु रूप गुन सागर। सो बितानु तिहुँ लोक उजागर॥ जनक भवन कै सोभा जैसी। गृह गृह प्रति पुर देखिअ तैसी॥ ३ ॥

अर्थ:

जिस मण्डप में रूप और गुणों के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी दूल्हे होंगे, वह मण्डप तीनों लोकों में प्रसिद्ध होना ही चाहिए। जनकजी के महल की जैसी शोभा है, वैसी ही शोभा नगर के प्रत्येक घर की दिखाई देती है।

चौपाई

जेहिं तेरहुति तेहि समय निहारी। तेहि लघु लगहिं भुवन दस चारी॥ जो संपदा नीच गृह सोहा। सो बिलोकि सुरनायक मोहा॥ ४ ॥

अर्थ:

उस समय जिसने तिरहुत को देखा, उसे चौदह भुवन तुच्छ जान पड़े। जनकपुर में नीच के घर भी उस समय जो सम्पदा सुशोभित थी, उसे देखकर सुरनायक मोहित हो गया।

दोहा

बसइ नगर जेहिं लच्छि करि कपट नारि बर बेषु। तेहि पुर कै सोभा कहत सकुचहिं सारद सेषु॥ २८९ ॥

अर्थ:

जिस नगर में साक्षात् लक्ष्मीजी कपट से स्त्री का सुन्दर वेष बनाकर बसती हैं, उस पुर की शोभा का वर्णन करने में सरस्वती और शेष भी सकुचाते हैं।

दोहा 290 के अंतर्गत
चौपाई

पहुँचे दूत राम पुर पावन। हरषे नगर बिलोकि सुहावन॥ भूप द्वार तिन्ह खबरि जनाई। दसरथ नृप सुनि लिए बोलाई॥ १ ॥

अर्थ:

जनकजी के दूत श्रीरामचन्द्रजी की पवित्र पुरी अयोध्या में पहुँचे। सुन्दर नगर देखकर वे हर्षित हुए। राजद्वार पर जाकर उन्होंने खबर भेजी; राजा दशरथजी ने सुनकर उन्हें बुला लिया।

चौपाई

करि प्रनामु तिन्ह पाती दीन्ही। मुदित महीप आपु उठि लीन्ही॥ बारि बिलोचन बाँचत पाती। पुलक गात आई भरि छाती॥ २ ॥

अर्थ:

दूतों ने प्रणाम करके चिट्ठी दी। प्रसन्न होकर राजा ने स्वयं उठकर उसे लिया। चिट्ठी बाँचते समय उनके नेत्रों में जल भर आया, शरीर पुलकित हो गया और छाती भर आयी।

चौपाई

रामु लखनु उर कर बर चीठी। रहि गए कहत न खाटी मीठी॥ पुनि धरि धीर पत्रिका बाँची। हरषी सभा बात सुनि साँची॥ ३ ॥

अर्थ:

हृदय में राम और लक्ष्मण हैं, हाथ में सुन्दर चिट्ठी है, राजा उसे हाथ में लिये ही रह गये, खट्टी-मीठी कुछ भी कह न सके। फिर धीरज धरकर उन्होंने पत्रिका पढ़ी। सारी सभा सच्ची बात सुनकर हर्षित हो गयी।

चौपाई

खेलत रहे तहाँ सुधि पाई। आए भरतु सहित हित भाई॥ पूछत अति सनेहँ सकुचाई। तात कहाँ तें पाती आई॥ ४ ॥

अर्थ:

भरतजी अपने हितभाइयों के साथ जहाँ खेलते थे, वहीं समाचार पाकर वे आ गये। बहुत प्रेम से सकुचाते हुए पूछते हैं--पिताजी! चिट्ठी कहाँ से आयी है ?

दोहा

कुसल प्रानप्रिय बंधु दोउ अहहिं कहहु केहिं देस। सुनि सनेह साने बचन बाची बहुरि नरेस॥ २९० ॥

अर्थ:

हमारे प्राणों से प्यारे दोनों भाई, कहिये सकुशल तो हैं और वे किस देश में हैं ? स्नेह से सने ये वचन सुनकर राजा ने फिर से चिट्ठी पढ़ी।

दोहा 291 के अंतर्गत
चौपाई

सुनि पाती पुलके दोउ भ्राता। अधिक सनेहु समात न गाता॥ प्रीति पुनीत भरत कै देखी। सकल सभाँ सुखु लहेउ बिसेषी॥ १ ॥

अर्थ:

चिट्ठी सुनकर दोनों भाई पुलकित हो गये। स्नेह इतना अधिक हो गया कि वह शरीर में समाता नहीं। भरतजी का पवित्र प्रेम देखकर सारी सभा ने विशेष सुख पाया।

चौपाई

तब नृप दूत निकट बैठारे। मधुर मनोहर बचन उचारे॥ भैआ कहहु कुसल दोउ बारे। तुम्ह नीकें निज नयन निहारे॥ २ ॥

अर्थ:

तब नृप ने दूतों को निकट बैठाया। मधुर और मनोहर वचन उचारे। भैया! कहो, दोनों बच्चे कुशल से तो हैं? तुमने नीकें निज नयन निहारे।

चौपाई

स्यामल गौर धरें धनु भाथा। बय किसोर कौसिक मुनि साथा॥ पहिचानहु तुम्ह कहहु सुभाऊ। प्रेम बिबस पुनि पुनि कह राऊ॥ ३ ॥

अर्थ:

साँवले और गोरे शरीरवाले वे धनुष और तरकस धारण किये रहते हैं, किशोर अवस्था है, कौसिक मुनि के साथ हैं। तुम उनको पहचानते हो तो उनका स्वभाव बताओ। राजा प्रेम के वश होने से बार-बार यह कह रहे हैं।

चौपाई

जा दिन तें मुनि गए लवाई। तब तें आजु साँचि सुधि पाई॥ कहहु बिदेह कवन बिधि जाने। सुनि प्रिय बचन दूत मुसुकाने॥ ४ ॥

अर्थ:

[भैया!] जिस दिन से मुनि उन्हें लिवा ले गये, तब से आज ही हमने सच्ची खबर पायी है। कहो तो महाराज जनक ने उन्हें कैसे पहचाना? ये प्रिय वचन सुनकर दूत मुसकराये।

दोहा

सुनहु महीपति मुकुट मनि तुम्ह सम धन्य न कोउ। रामु लखनु जिन्ह के तनय बिस्व बिभूषन दोउ॥ २९१ ॥

अर्थ:

सुनिये, हे राजाओं के मुकुटमणि! आपके समान धन्य और कोई नहीं है, जिनके राम-लक्ष्मण-जैसे पुत्र हैं, जो दोनों विश्व के विभूषण हैं।

दोहा 292 के अंतर्गत
चौपाई

पूछन जोगु न तनय तुम्हारे। पुरुषसिंघ तिहु पुर उजिआरे॥ जिन्ह के जस प्रताप कें आगे। ससि मलीन रबि सीतल लागे॥ १ ॥

अर्थ:

आपके पुत्र पूछने योग्य नहीं हैं। वे पुरुषसिंह तीनों पुरों के उजियारे हैं। जिनके यश के आगे चन्द्रमा मलिन और प्रताप के आगे सूर्य शीतल लगता है।

चौपाई

तिन्ह कहँ कहिअ नाथ किमि चीन्हे। देखिअ रबि कि दीप कर लीन्हे॥ सीय स्वयंबर भूप अनेका। समिटे सुभट एक तें एका॥ २ ॥

अर्थ:

हे नाथ! उनके लिये आप कहते हैं कि उन्हें कैसे पहचाना! क्या सूर्य को हाथ में दीपक लेकर देखा जाता है? सीताजी के स्वयंवर में अनेक राजा और एक-से-एक बढ़कर योद्धा एकत्र हुए थे।

चौपाई

संभु सरासनु काहुँ न टारा। हारे सकल बीर बरिआरा॥ तीनि लोक महँ जे भटमानी। सभ कै सकति संभु धनु भानी॥ ३ ॥

अर्थ:

परन्तु शिवजी के धनुष को कोई भी नहीं हटा सका। सारे बलवान वीर हार गये। तीनों लोकों में जो वीरता के अभिमानी थे, शिवजी के धनुष ने सबकी शक्ति तोड़ दी।

चौपाई

सकइ उठाइ सरासुर मेरू। सोउ हियँ हारि गयउ करि फेरू॥ जेहिं कौतुक सिवसैलु उठावा। सोउ तेहि सभाँ पराभउ पावा॥ ४ ॥

अर्थ:

बाणासुर, जो सुमेरु को भी उठा सकता था, वह भी हृदय में हारकर परिक्रमा करके चला गया; और जिसने खेल से ही कैलास को उठा लिया था, वह रावण भी उस सभा में पराजय को प्राप्त हुआ।

दोहा

तहाँ राम रघुबंसमनि सुनिअ महा महिपाल। भंजेउ चाप प्रयास बिनु जिमि गज पंकज नाल॥ २९२ ॥

अर्थ:

वहाँ राम रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजी ने बिना ही प्रयास शिवजी के धनुष को वैसे ही तोड़ डाला जैसे हाथी कमल की डंडी को तोड़ डालता है।

दोहा 293 के अंतर्गत
चौपाई

सुनि सरोष भृगुनायकु आए। बहुत भाँति तिन्ह आँखि देखाए॥ देखि राम बलु निज धनु दीन्हा। करि बहु बिनय गवनु बन कीन्हा॥ १ ॥

अर्थ:

धनुष टूटने की बात सुनकर परशुरामजी क्रोधभरे आये और उन्होंने बहुत प्रकार से आँखें दिखलायीं। देख कर श्रीराम का बल, उन्होंने अपना धनुष दे दिया और बहुत प्रकार से विनती करके वन को गमन किया।

चौपाई

राजन रामु अतुलबल जैसें। तेज निधान लखनु पुनि तैसें॥ कंपहिं भूप बिलोकत जाकें। जिमि गज हरि किसोर के ताकें॥ २ ॥

अर्थ:

हे राजन्! जैसे श्रीरामचन्द्रजी अतुलनीय बली हैं, वैसे ही तेजनिधान लक्ष्मणजी भी हैं, जिनके देखने मात्र से राजालोग ऐसे काँप उठते थे, जैसे हाथी सिंह के बच्चे को ताकने से काँप उठते हैं।

चौपाई

देव देखि तव बालक दोऊ। अब न आँखि तर आवत कोऊ॥ दूत बचन रचना प्रिय लागी। प्रेम प्रताप बीर रस पागी॥ ३ ॥

अर्थ:

हे देव! आपके दोनों बालकों को देखने के बाद अब आँख के नीचे कोई आता ही नहीं। प्रेम, प्रताप और वीर-रस में पगी हुई दूतों की वचनरचना सबको बहुत प्रिय लगी।

चौपाई

सभा समेत राउ अनुरागे। दूतन्ह देन निछावरि लागे॥ कहि अनीति ते मूदहिं काना। धरमु बिचारि सबहिं सुखु माना॥ ४ ॥

अर्थ:

सभा समेत राजा अनुराग में मग्न हो गये और दूतों को निछावर देने लगे। यह अनीति है, ऐसा कहकर दूत अपने हाथों से कान मूँदने लगे। धर्म को विचारकर सभी ने सुख माना।

दोहा

तब उठि भूप बसिष्ट कहुँ दीन्हि पत्रिका जाइ। कथा सुनाई गुरहि सब सादर दूत बोलाइ॥ २९३ ॥

अर्थ:

तब राजा उठकर वसिष्ठ जी के पास जाकर उन्हें पत्रिका दी और आदरपूर्वक दूतों को बुलाकर सारी कथा गुरुजी को सुना दी।

दोहा 294 के अंतर्गत
चौपाई

सुनि बोले गुर अति सुखु पाई। पुन्य पुरुष कहुँ महि सुख छाई॥ जिमि सरिता सागर महुँ जाहीं। जद्यपि ताहि कामना नाहीं॥ १ ॥

अर्थ:

सब समाचार सुनकर और अत्यन्त सुख पाकर गुरु बोले--पुण्यात्मा पुरुष के लिये पृथ्वी सुखों से छायी हुई है। जैसे नदियाँ समुद्र में जाती हैं, यद्यपि समुद्र को नदी की कामना नहीं होती।

चौपाई

तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ॥ तुम्ह गुर बिप्र धेनु सुर सेबी। तसि पुनीत कौसल्या देबी॥ २ ॥

अर्थ:

वैसे ही सुख और सम्पत्ति बिना ही बुलाये स्वाभाविक ही धर्मात्मा पुरुष के पास जाती हैं। तुम जैसे गुरु, ब्राह्मण, गाय और देवताओं की सेवा करनेवाले हो, वैसी ही पवित्र कौसल्या देवी भी हैं।

चौपाई

सुकृती तुम्ह समान जग माहीं। भयउ न है कोउ होनेउ नाहीं॥ तुम्ह ते अधिक पुन्य बड़ काकें। राजन राम सरिस सुत जाकें॥ ३ ॥

अर्थ:

तुम्हारे समान पुण्यात्मा जगत् में न कोई हुआ, न है और न होने का ही है। हे राजन्! तुमसे अधिक पुण्य और किसका होगा, जिसके राम-सरीखे पुत्र हैं।

चौपाई

बीर बिनीत धरम ब्रत धारी। गुन सागर बर बालक चारी॥ तुम्ह कहुँ सर्ब काल कल्याना। सजहु बरात बजाइ निसाना॥ ४ ॥

अर्थ:

और जिसके चारों बालक वीर, विनम्र, धर्म का व्रत धारण करनेवाले और गुणों के सुन्दर समुद्र हैं। तुम्हारे लिये सभी कालों में कल्याण है। अतएव डंका बजवाकर बारात सजाओ।

दोहा

चलहु बेगि सुनि गुर बचन भलेहिं नाथ सिरु नाइ। भूपति गवने भवन तब दूतन्ह बासु देवाइ॥ २९४ ॥

अर्थ:

और जल्दी चलो। गुरुजी के ऐसे वचन सुनकर, 'हे नाथ! बहुत अच्छा' कहकर और सिर नवाकर तथा दूतों को डेरा दिलवाकर राजा महल में गये।

दोहा 295 के अंतर्गत
चौपाई

राजा सबु रनिवास बोलाई। जनक पत्रिका बाचि सुनाई॥ सुनि संदेसु सकल हरषानीं। अपर कथा सब भूप बखानीं॥ १ ॥

अर्थ:

राजा ने सारे रनिवास को बुलाकर जनकजी की पत्रिका बाँचकर सुनायी। समाचार सुनकर सब रानियाँ हर्ष से भर गयीं। राजा ने फिर दूसरी सब बातों का, जो दूतों के मुख से सुनी थीं, वर्णन किया।

चौपाई

प्रेम प्रफुल्लित राजहिं रानी। मनहुँ सिखिनि सुनि बारिद बानी॥ मुदित असीस देहिं गुर नारीं। अति आनंद मगन महतारीं॥ २ ॥

अर्थ:

प्रेम में प्रफुल्लित हुई रानियाँ ऐसी सुशोभित हो रही हैं जैसे मोरनी बादलों की गरज सुनकर प्रफुल्लित होती है। बड़ी-बूढ़ी [अथवा गुरुजनों की] स्त्रियाँ प्रसन्न होकर आशीर्वाद दे रही हैं। माताएँ अत्यन्त आनन्द में मग्न हैं।

चौपाई

लेहिं परस्पर अति प्रिय पाती। हृदयँ लगाइ जुड़ावहिं छाती॥ राम लखन कै कीरति करनी। बारहिं बार भूपबर बरनी॥ ३ ॥

अर्थ:

उस अत्यन्त प्रिय पत्रिका को आपस में लेकर सब हृदय से लगाकर छाती शीतल करती हैं। राजाओं में श्रेष्ठ दशरथजी ने श्रीराम-लक्ष्मण की कीर्ति और करनी का बार-बार वर्णन किया।

चौपाई

मुनि प्रसादु कहि द्वार सिधाए। रानिन्ह तब महिदेव बोलाए॥ दिए दान आनंद समेता। चले बिप्रबर आसिष देता॥ ४ ॥

अर्थ:

“यह सब मुनि की कृपा है' ऐसा कहकर वे बाहर चले आये। तब रानियों ने ब्राह्मणों को बुलाया और आनन्द सहित उन्हें दान दिये। श्रेष्ठ ब्राह्मण आशीर्वाद देते हुए चले।

सोरठा

जाचक लिए हँकारि दीन्हि निछावरि कोटि बिधि। चिरु जीवहुँ सुत चारि चक्रबर्ति दसरत्थ के॥ २९५ ॥

अर्थ:

फिर भिक्षुकों को बुलाकर करोड़ों प्रकार की निछावरें उन्हें दीं। “चक्रवर्ती महाराज दशरथ के चारों पुत्र चिरंजीवी हों!”

दोहा 296 के अंतर्गत
चौपाई

कहत चले पहिरें पट नाना। हरषि हने गहगहे निसाना॥ समाचार सब लोगन्ह पाए। लागे घर घर होन बधाए॥ १ ॥

अर्थ:

यों कहते हुए वे अनेक प्रकार के सुन्दर वस्त्र पहन-पहनकर चले। आनन्दित होकर नगाड़ेवालों ने बड़े जोर से नगाड़ों पर चोट लगायी। सब लोगों ने जब यह समाचार पाया, तब घर-घर बधावे होने लगे।

चौपाई

भुवन चारि दस भरा उछाहू। जनकसुता रघुबीर बिआहू॥ सुनि सुभ कथा लोग अनुरागे। मग गृह गलीं सँवारन लागे॥ २ ॥

अर्थ:

चौदहों लोकों में उत्साह भर गया कि जानकीजी और श्रीरघुनाथजी का विवाह होगा। यह शुभ समाचार पाकर लोग प्रेममग्न हो गये और रास्ते, घर तथा गलियाँ सजाने लगे।

चौपाई

जद्यपि अवध सदैव सुहावनि। राम पुरी मंगलमय पावनि॥ तदपि प्रीति कै प्रीति सुहाई। मंगल रचना रची बनाई॥ ३ ॥

अर्थ:

यद्यपि अयोध्या सदा सुहावनी है, क्योंकि वह श्रीरामजी की मङ्गलमयी पवित्र पुरी है, तथापि प्रीति-पर-प्रीति होने से वह सुन्दर मङ्गल-रचना से सजायी गयी।

चौपाई

ध्वज पताक पट चामर चारू। छावा परम बिचित्र बजारू॥ कनक कलस तोरन मनि जाला। हरद दूब दधि अच्छत माला॥ ४ ॥

अर्थ:

ध्वजा, पताका, परदे और सुन्दर चँवरों से सारा बाजार बहुत ही अनूठा छाया हुआ है। सोने के कलश, तोरण, मणियों की झालरें, हलदी, दूब, दही, अक्षत और मालाओं से--।

दोहा

मंगलमय निज निज भवन लोगन्ह रचे बनाइ। बीथीं सींचीं चतुरसम चौकें चारु पुराइ॥ २९६ ॥

अर्थ:

लोगों ने अपने-अपने घरों को सजाकर मङ्गलमय बना लिया। गलियों को चतुरसम से सींचा और [द्वारों पर] सुन्दर चौक पुराये। [चन्दन, केशर, कस्तूरी और कपूर से बने हुए एक सुगन्धित द्रव को चतुरसम कहते हैं]।

दोहा 297 के अंतर्गत
चौपाई

जहँ तहँ जूथ जूथ मिलि भामिनि। सजि नवसप्त सकल दुति दामिनि॥ बिधुबदनीं मृग सावक लोचनि। निज सरूप रति मानु बिमोचनि॥ १ ॥

अर्थ:

बिजली की-सी कान्तिवाली, चन्द्रमुखी, हरिण के बच्चे के-से नेत्रवाली और अपने सुन्दर रूप से कामदेव की स्त्री रति के अभिमान को छुड़ानेवाली सुहागिनी स्त्रियाँ सभी सोलहों श्रृंगार सजकर, जहाँ-तहाँ झुंड-की-झुंड मिलकर,।

चौपाई

गावहिं मंगल मंजुल बानीं। सुनि कलरव कलकंठि लजानीं॥ भूप भवन किमि जाइ बखाना। बिस्व बिमोहन रचेउ बिताना॥ २ ॥

अर्थ:

मनोहर वाणी से मङ्गल गीत गा रही हैं, जिनके सुन्दर स्वर को सुनकर कोयलें भी लजा जाती हैं। राजमहल का वर्णन कैसे किया जाय, जहाँ विश्व को विमोहित करनेवाला मण्डप बनाया गया है।

चौपाई

मंगल द्रब्य मनोहर नाना। राजत बाजत बिपुल निसाना॥ कतहुँ बिरिद बंदी उच्चरहीं। कतहुँ बेद धुनि भूसुर करहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

अनेक प्रकार के मनोहर माङ्गलिक पदार्थ शोभित हो रहे हैं और बहुत-से नगाड़े बज रहे हैं। कहीं भाट विरुदावली (कुलकीर्ति) का उच्चारण कर रहे हैं और कहीं ब्राह्मण वेदध्वनि कर रहे हैं।

चौपाई

गावहिं सुंदरि मंगल गीता। लै लै नामु रामु अरु सीता॥ बहुत उछाहु भवनु अति थोरा। मानहुँ उमगि चला चहु ओरा॥ ४ ॥

अर्थ:

सुन्दरी स्त्रियाँ श्रीरामजी और श्रीसीताजी का नाम ले-लेकर मङ्गलगीत गा रही हैं। उत्साह बहुत है और महल अत्यन्त ही छोटा है। इससे [उसमें न समाकर] मानो वह उत्साह (आनन्द) चारों ओर उमड़ चला है।

दोहा

सोभा दसरथ भवन कइ को कबि बरनै पार। जहाँ सकल सुर सीस मनि राम लीन्ह अवतार॥ २९७ ॥

अर्थ:

दशरथ के महल की शोभा का वर्णन कौन कवि कर सकता है, जहाँ समस्त देवताओं के शिरोमणि रामचन्द्रजी ने अवतार लिया है।

दोहा 298 के अंतर्गत
चौपाई

भूप भरत पुनि लिए बोलाई। हय गय स्यंदन साजहु जाई॥ चलहु बेगि रघुबीर बराता। सुनत पुलक पूरे दोउ भ्राता॥ १ ॥

अर्थ:

फिर राजा ने भरतजी को बुला लिया और कहा कि जाकर घोड़े, हाथी और रथ सजाओ, जल्दी रामचन्द्रजी की बारात में चलो। यह सुनते ही दोनों भाई (भरतजी और शत्रुघ्नजी) आनन्दवश पुलक से भर गये।

चौपाई

भरत सकल साहनी बोलाए। आयसु दीन्ह मुदित उठि धाए॥ रचि रुचि जीन तुरग तिन्ह साजे। बरन बरन बर बाजि बिराजे॥ २ ॥

अर्थ:

भरतजी ने सब साहनी (घुड़साल के अध्यक्ष) बुलाये और उन्हें [घोड़ों को सजाने की ] आज्ञा दी, वे प्रसन्न होकर उठ दौड़े। उन्होंने रुचि के साथ (यथायोग्य) जीनें कसकर घोड़े सजाये। रंग-रंग के उत्तम घोड़े शोभित हो गये।

चौपाई

सुभग सकल सुठि चंचल करनी। अय इव जरत धरत पग धरनी॥ नाना जाति न जाहिं बखाने। निदरि पवनु जनु चहत उड़ाने॥ ३ ॥

अर्थ:

सब घोड़े बड़े ही सुन्दर और चञ्चल करनी (चाल) के हैं। वे धरती पर ऐसे पैर रखते हैं जैसे जलते हुए लोहे पर रखते हों। अनेकों जाति के घोड़े हैं, जिनका वर्णन नहीं हो सकता। [ ऐसी तेज चाल के हैं] मानो हवा का निरादर करके उड़ना चाहते हों।

चौपाई

तिन्ह सब छयल भए असवारा। भरत सरिस बय राजकुमारा॥ सब सुंदर सब भूषनधारी। कर सर चाप तून कटि भारी॥ ४ ॥

अर्थ:

उन सब घोड़ों पर भरतजी के समान अवस्थावाले सब छैल-छबीले राजकुमार सवार हुए। वे सभी सुन्दर हैं और सब आभूषण धारण किये हुए हैं। उनके हाथों में बाण और धनुष हैं तथा कमर में भारी तरकस बँधे हैं।

दोहा

छरे छबीले छयल सब सूर सुजान नबीन। जुग पदचर असवार प्रति जे असिकला प्रबीन॥ २९८ ॥

अर्थ:

सभी चुने हुए छबीले छैल, शूरवीर, चतुर और नवयुवक हैं। प्रत्येक सवार के साथ दो पैदल सिपाही हैं, जो तलवार चलाने की कला में बड़े निपुण हैं।

दोहा 299 के अंतर्गत
चौपाई

बाँधें बिरद बीर रन गाढ़े। निकसि भए पुर बाहेर ठाढ़े॥ फेरहिं चतुर तुरग गति नाना। हरषहिं सुनि सुनि पनव निसाना॥ १ ॥

अर्थ:

शूरता का बाना धारण किये हुए रणधीर वीर सब निकलकर नगर के बाहर आ खड़े हुए। वे चतुर अपने घोड़ों को तरह-तरह की चालों से फेर रहे हैं और भेरी तथा नगाड़े की आवाज सुन-सुनकर प्रसन्न हो रहे हैं।

चौपाई

रथ सारथिन्ह बिचित्र बनाए। ध्वज पताक मनि भूषन लाए॥ चवँर चारु किंकिनि धुनि करहीं। भानु जान सोभा अपहरहीं॥ २ ॥

अर्थ:

सारथियों ने ध्वजा, पताका, मणि और आभूषणों को लगाकर रथों को बहुत विलक्षण बना दिया है। उनमें सुन्दर चँवर लगे हैं और घंटियाँ सुन्दर शब्द कर रही हैं। वे रथ इतने सुन्दर हैं मानो सूर्य के रथ की शोभा को छीन लेते हैं।

चौपाई

सावँकरन अगनित हय होते। ते तिन्ह रथन्ह सारथिन्ह जोते॥ सुंदर सकल अलंकृत सोहे। जिन्हहि बिलोकत मुनि मन मोहे॥ ३ ॥

अर्थ:

अगणित श्यामकर्ण घोड़े थे। उनको सारथियों ने उन रथों में जोत दिया है, जो सभी देखने में सुन्दर और गहनों से सजाये हुए सुशोभित हैं, और जिन्हें देखकर मुनियों के मन भी मोहित हो जाते हैं।

चौपाई

जे जल चलहिं थलहि की नाईं। टाप न बूड़ बेग अधिकाईं॥ अस्त्र सस्त्र सबु साजु बनाई। रथी सारथिन्ह लिए बोलाई॥ ४ ॥

अर्थ:

जो जल पर भी स्थल की तरह चलते हैं। वेग की अधिकता से उनकी टाप पानी में नहीं डूबती। अस्त्र-शस्त्र और सब साज सजाकर सारथियों ने रथियों को बुला लिया।

दोहा

चढ़ि चढ़ि रथ बाहेर नगर लागी जुरन बरात। होत सगुन सुंदर सबहि जो जेहि कारज जात॥ २९९ ॥

अर्थ:

रथों पर चढ़-चढ़कर बारात नगर के बाहर जुटने लगी। जो जिस काम के लिए जाता है, सभी को सुन्दर शकुन होते हैं।

दोहा 300 के अंतर्गत
चौपाई

कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं। कहि न जाहिं जेहि भाँति सँवारीं॥ चले मत्त गज घंट बिराजी। मनहुँ सुभग सावन घन राजी॥ १ ॥

अर्थ:

श्रेष्ठ हाथियों पर सुन्दर अंबारियाँ पड़ी हैं। वे जिस प्रकार सजायी गयी थीं, सो कहा नहीं जा सकता। मतवाले हाथी घंटों से सुशोभित होकर चले, मानो सावन के सुन्दर बादलों के समूह जा रहे हों।

चौपाई

बाहन अपर अनेक बिधाना। सिबिका सुभग सुखासन जाना॥ तिन्ह चढ़ि चले बिप्रबर बृंदा। जनु तनु धरें सकल श्रुति छंदा॥ २ ॥

अर्थ:

सुन्दर पालकियाँ, सुखासन और रथ आदि और भी अनेकों प्रकार की सवारियाँ हैं। उन पर श्रेष्ठ ब्राह्मणों के समूह चढ़कर चले, मानो सब वेदों के छन्द ही शरीर धारण किये हुए हों।

चौपाई

मागध सूत बंदि गुनगायक। चले जान चढ़ि जो जेहि लायक॥ बेसर ऊँट बृषभ बहु जाती। चले बस्तु भरि अगनित भाँती॥ ३ ॥

अर्थ:

मागध, सूत, बंदि और गुणगायक, जो जिस योग्य थे, वैसी सवारी पर चढ़कर चले। बहुत जातियों के खच्चर, ऊँट और बैल असंख्यों प्रकार की वस्तुएँ लाद-लादकर चले।

चौपाई

कोटिन्ह काँवरि चले कहारा। बिबिध बस्तु को बरनै पारा॥ चले सकल सेवक समुदाई। निज निज साजु समाजु बनाई॥ ४ ॥

अर्थ:

कहार करोड़ों काँवरें लेकर चले। उनमें अनेकों प्रकार की इतनी वस्तुएँ थीं कि जिनका वर्णन कौन कर सकता है। सब सेवकों के समूह अपना-अपना साज-समाज बनाकर चले।

दोहा

सब कें उर निर्भर हरषु पूरित पुलक सरीर। कबहिं देखिबे नयन भरि रामु लखनु दोउ बीर॥ ३०० ॥

अर्थ:

सबके हृदय में अपार हर्ष है और शरीर पुलक से भरे हैं। [सबको एक ही लालसा लगी है कि] हम श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाइयों को नेत्र भरकर कब देखेंगे।

दोहा 301 के अंतर्गत
चौपाई

गरजहिं गज घंटा धुनि घोरा। रथ रव बाजि हिंस चहु ओरा॥ निदरि घनहि घुर्म्मरहिं निसाना। निज पराइ कछु सुनिअ न काना॥ १ ॥

अर्थ:

हाथी गरज रहे हैं, उनके घंटों की भीषण ध्वनि हो रही है। चारों ओर रथों की घरघराहट और घोड़ों की हिनहिनाहट हो रही है। बादलों का निरादर करते हुए नगाड़े घोर शब्द कर रहे हैं। किसी को अपनी-परायी कोई बात कानों से सुनायी नहीं देती।

चौपाई

महा भीर भूपति के द्वारें। रज होइ जाइ पषान पबारें॥ चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नारीं। लिएँ आरती मंगल थारीं॥ २ ॥

अर्थ:

राजा दशरथ के दरवाजे पर इतनी भारी भीड़ हो रही है कि वहाँ पत्थर फेंका जाय तो वह भी पिसकर धूल हो जाय। अटारियों पर चढ़ी स्त्रियाँ मंगल थालों में आरती लिये देख रही हैं।

चौपाई

गावहिं गीत मनोहर नाना। अति आनंदु न जाइ बखाना॥ तब सुमंत्र दुइ स्यंदन साजी। जोते रबि हय निंदक बाजी॥ ३ ॥

अर्थ:

और नाना प्रकार के मनोहर गीत गा रही हैं। उनके अत्यन्त आनन्द का बखान नहीं हो सकता। तब सुमन्त्रजी ने दो रथ सजाकर उनमें सूर्य के घोड़ों को भी मात करनेवाले घोड़े जोते।

चौपाई

दोउ रथ रुचिर भूप पहिं आने। नहिं सारद पहिं जाहिं बखाने॥ राज समाजु एक रथ साजा। दूसर तेज पुंज अति भ्राजा॥ ४ ॥

अर्थ:

दोनों सुन्दर रथ वे राजा दशरथ के पास ले आये, जिनकी सुन्दरता का वर्णन सरस्वती से भी नहीं हो सकता। एक रथ पर राजसी सामान सजाया गया। और दूसरा जो तेज का पुंज और अत्यन्त ही शोभायमान था।

दोहा

तेहिं रथ रुचिर बसिष्ठ कहुँ हरषि चढ़ाइ नरेसु। आपु चढ़ेउ स्यंदन सुमिरि हर गुर गौरि गनेसु॥ ३०१ ॥

अर्थ:

उस सुन्दर रथ पर राजा वसिष्ठजी को हर्षपूर्वक चढ़ाकर फिर स्वयं शिव, गुरु, गौरी (पार्वती) और गणेशजी का स्मरण करके [दूसरे] रथ पर चढ़े।

दोहा 302 के अंतर्गत
चौपाई

सहित बसिष्ठ सोह नृप कैसें। सुर गुर संग पुरंदर जैसें॥ करि कुल रीति बेद बिधि राऊ। देखि सबहि सब भाँति बनाऊ॥ १ ॥

अर्थ:

वसिष्ठजी के साथ [जाते हुए] राजा दशरथजी कैसे शोभित हो रहे हैं, जैसे देवगुरु बृहस्पतिजी के साथ इन्द्र हों। वेद की विधि से और कुल की रीति के अनुसार सब कार्य करके तथा सबको सब प्रकार से सजा हुआ देखकर,

चौपाई

सुमिरि रामु गुर आयसु पाई। चले महीपति संख बजाई॥ हरषे बिबुध बिलोकि बराता। बरषहिं सुमन सुमंगल दाता॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी का स्मरण करके, गुरु की आज्ञा पाकर पृथ्वीपति दशरथजी शंख बजाकर चले। बारात देखकर देवता हर्षित हुए और सुन्दर मंगलदायक फूलों की वर्षा करने लगे।

चौपाई

भयउ कोलाहल हय गय गाजे। ब्योम बरात बाजने बाजे॥ सुर नर नारि सुमंगल गाईं। सरस राग बाजहिं सहनाईं॥ ३ ॥

अर्थ:

बड़ा शोर मच गया, घोड़े और हाथी गरजने लगे। आकाश में और बारात में [दोनों जगह] बाजे बजने लगे। देवांगनाएँ और मनुष्यों की स्त्रियाँ सुन्दर मंगलगान करने लगीं और रसीले राग से शहनाइयाँ बजने लगीं।

चौपाई

घंट घंटि धुनि बरनि न जाहीं। सरव करहिं पाइक फहराहीं॥ करहिं बिदूषक कौतुक नाना। हास कुसल कल गान सुजाना॥ ४ ॥

अर्थ:

घंटे-घंटियों की ध्वनि का वर्णन नहीं हो सकता। पैदल चलने वाले सेवकगण अथवा पट्टेबाज कसरत के खेल कर रहे हैं और फहरा रहे हैं (आकाश में ऊँचे उछलते हुए जा रहे हैं)। हँसी करने में निपुण और सुन्दर गाने में चतुर विदूषक (मसखरे) तरह-तरह के तमाशे कर रहे हैं।

दोहा

तुरग नचावहिं कुअँर बर अकनि मृदंग निसान। नागर नट चितवहिं चकित डगहिं न ताल बँधान॥ ३०२ ॥

अर्थ:

सुन्दर राजकुमार मृदंग और नगाड़े के शब्द सुनकर घोड़ों को उन्हीं के अनुसार इस प्रकार नचा रहे हैं कि वे ताल के बंधान से जरा भी डिगते नहीं हैं। चतुर नट चकित होकर यह देख रहे हैं।

दोहा 303 के अंतर्गत
चौपाई

बनइ न बरनत बनी बराता। होहिं सगुन सुंदर सुभदाता॥ चारा चाषु बाम दिसि लेई। मनहुँ सकल मंगल कहि देई॥ १ ॥

अर्थ:

बारात ऐसी बनी है कि उसका वर्णन करते नहीं बनता। सुन्दर शुभदायक शकुन हो रहे हैं। नीलकंठ पक्षी बायीं ओर चारा ले रहा है, मानो सम्पूर्ण मंगलों की सूचना दे रहा हो।

चौपाई

दाहिन काग सुखेत सुहावा। नकुल दरसु सब काहूँ पावा॥ सानुकूल बह त्रिबिध बयारी। सघट सबाल आव बर नारी॥ २ ॥

अर्थ:

दाहिनी ओर कौआ सुन्दर खेत में शोभा पा रहा है। नेवले का दर्शन भी सब किसी ने पाया। तीनों प्रकार की (शीतल, मन्द, सुगन्धित) हवा अनुकूल दिशा में चल रही है। श्रेष्ठ स्त्रियाँ भरे हुए घड़े और गोद में बालक लिये आ रही हैं।

चौपाई

लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा। सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा॥ मृगमाला फिरि दाहिनि आई। मंगल गन जनु दीन्हि देखाई॥ ३ ॥

अर्थ:

लोमड़ी फिर-फिरकर (बार-बार) दिखायी दे जाती है। गायें सामने खड़ी बछड़ों को दूध पिलाती हैं। हरिनों की टोली [बायीं ओर से] घूमकर दाहिनी ओर को आयी, मानो मंगलगण ने ही दिखा दिये हों।

चौपाई

छेमकरी कह छेम बिसेषी। स्यामा बाम सुतरु पर देखी॥ सनमुख आयउ दधि अरु मीना। कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना॥ ४ ॥

अर्थ:

क्षेमकरी (सफेद सिरवाली चील) विशेष रूप से क्षेम (कल्याण) कह रही है। श्यामा बायीं ओर सुन्दर पेड़ पर दिखाई पड़ी। दही, मछली और दो विद्वान् ब्राह्मण हाथ में पुस्तक लिये हुए सामने आये।

दोहा

मंगलमय कल्यानमय अभिमत फल दातार। जनु सब साचे होन हित भए सगुन एक बार॥ ३०३ ॥

अर्थ:

सभी मंगलमय, कल्याणमय और मनोवांछित फल देनेवाले शकुन मानो सच्चे होने के लिए एक ही साथ हो गये।

दोहा 304 के अंतर्गत
चौपाई

मंगल सगुन सुगम सब ताकें। सगुन ब्रह्म सुंदर सुत जाकें॥ राम सरिस बरु दुलहिनि सीता। समधी दसरथु जनकु पुनीता॥ १ ॥

अर्थ:

स्वयं सगुण ब्रह्म, जिसके सुन्दर पुत्र हैं, उसके लिये सब मंगल-शकुन सुलभ हैं। जहाँ श्रीरामचन्द्रजी-सरीखे दूल्हा और सीताजी-जैसी दुलहिन हैं तथा दशरथजी और जनकजी-जैसे पवित्र समधी हैं।

चौपाई

सुनि अस ब्याहु सगुन सब नाचे। अब कीन्हे बिरंचि हम साँचे॥ एहि बिधि कीन्ह बरात पयाना। हय गय गाजहिं हने निसाना॥ २ ॥

अर्थ:

ऐसा ब्याह सुनकर मानो सभी शकुन नाच उठे [और कहने लगे—] अब ब्रह्माजी ने हमको सच्चा कर दिया। इस तरह बारात ने प्रस्थान किया। घोड़े, हाथी गरज रहे हैं और निसान बज रहे हैं।

चौपाई

आवत जानि भानुकुल केतू। सरितन्हि जनक बँधाए सेतू॥ बीच बीच बर बास बनाए। सुरपुर सरिस संपदा छाए॥ ३ ॥

अर्थ:

सूर्यवंश के पताकास्वरूप दशरथजी को आते हुए जानकर जनकजी ने नदियों पर पुल बँधवा दिये। बीच-बीच में ठहरने के लिये सुन्दर घर (पड़ाव) बनवा दिये, जिनमें देवलोक के समान सम्पदा छायी है।

चौपाई

असन सयन बर बसन सुहाए। पावहिं सब निज निज मन भाए॥ नित नूतन सुख लखि अनुकूले। सकल बरातिन्ह मंदिर भूले॥ ४ ॥

अर्थ:

और जहाँ बारात के सब लोग अपने-अपने मन की पसंद के अनुसार सुहावने उत्तम भोजन, बिस्तर और वस्त्र पाते हैं। मन के अनुकूल नित्य नये सुखों को देखकर सभी बरातियों को अपने घर भूल गये।

दोहा

आवत जानि बरात बर सुनि गहगहे निसान। सजि गज रथ पदचर तुरग लेन चले अगवान॥ ३०४ ॥

अर्थ:

बड़े जोर से बजते हुए निसानों की आवाज सुनकर श्रेष्ठ बारात के आने की खबर पाकर अगवानी करने वाले हाथी, रथ, पैदल और घोड़े सजाकर बारात लेने चले।

दोहा 305 के अंतर्गत
चौपाई

कनक कलस भरि कोपर थारा। भाजन ललित अनेक प्रकारा॥ भरे सुधासम सब पकवाने। नाना भाँति न जाहिं बखाने॥ १ ॥

अर्थ:

[दूध, शर्बत, ठंडाई, जल आदि से] भरे हुए सोने के कलश तथा परात, थाल आदि अनेक प्रकार के सुन्दर बर्तन; भरे हुए अमृत के समान सब पकवान, जिनका नाना प्रकार से वर्णन नहीं किया जा सकता।

चौपाई

फल अनेक बर बस्तु सुहाईं। हरषि भेंट हित भूप पठाईं॥ भूषन बसन महामनि नाना। खग मृग हय गय बहु बिधि जाना॥ २ ॥

अर्थ:

उत्तम फल तथा और भी अनेकों सुन्दर वस्तुएँ राजा ने हर्षित होकर भेंट के लिये भेजीं। गहने, कपड़े, नाना प्रकार की मूल्यवान् मणियाँ, पक्षी, पशु, घोड़े, हाथी और बहुत तरह की सवारियाँ।

चौपाई

मंगल सगुन सुगंध सुहाए। बहुत भाँति महिपाल पठाए॥ दधि चिउरा उपहार अपारा। भरि भरि काँवरि चले कहारा॥ ३ ॥

अर्थ:

तथा बहुत प्रकार के सुगन्धित एवं सुहावने मंगल-द्रव्य और सगुन के पदार्थ राजा ने भेजे। दही, चिउरा और अगणित उपहार की चीजें काँवरों में भर-भरकर कहार चले।

चौपाई

अगवानन्ह जब दीखि बराता। उर आनंदु पुलक भर गाता॥ देखि बनाव सहित अगवाना। मुदित बरातिन्ह हने निसाना॥ ४ ॥

अर्थ:

अगवानी करनेवालों को जब बारात दिखाई दी, तब उनके हृदय में आनन्द छा गया और शरीर रोमांच से भर गया। अगवानों को सज-धज के साथ देखकर बरातियों ने प्रसन्न होकर निसान बजाये।

दोहा

हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले बगमेल। जनु आनंद समुद्र दुइ मिलत बिहाइ सुबेल॥ ३०५ ॥

अर्थ:

[बराती तथा अगवानों में से] कुछ लोग परस्पर मिलने के लिये हर्ष के मारे बाग छोड़कर (सरपट) दौड़ चले, और ऐसे मिले मानो आनन्द के दो समुद्र मर्यादा छोड़कर मिलते हों।