सभा समेत राउ अनुरागे
सभा समेत राउ अनुरागे
चौपाई ४, दोहा २९३ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सभा समेत राउ अनुरागे। दूतन्ह देन निछावरि लागे॥ कहि अनीति ते मूदहिं काना। धरमु बिचारि सबहिं सुखु माना॥ ४ ॥
अर्थ
सभा समेत राजा अनुराग में मग्न हो गये और दूतों को निछावर देने लगे। यह अनीति है, ऐसा कहकर दूत अपने हाथों से कान मूँदने लगे। धर्म को विचारकर सभी ने सुख माना।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २९३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।
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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान