तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ
तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ
चौपाई २, दोहा २९४ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ॥ तुम्ह गुर बिप्र धेनु सुर सेबी। तसि पुनीत कौसल्या देबी॥ २ ॥
अर्थ
वैसे ही सुख और सम्पत्ति बिना ही बुलाये स्वाभाविक ही धर्मात्मा पुरुष के पास जाती हैं। तुम जैसे गुरु, ब्राह्मण, गाय और देवताओं की सेवा करनेवाले हो, वैसी ही पवित्र कौसल्या देवी भी हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २९४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।
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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान