कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं

चौपाई १, दोहा ३०० के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं। कहि न जाहिं जेहि भाँति सँवारीं॥ चले मत्त गज घंट बिराजी। मनहुँ सुभग सावन घन राजी॥ १ ॥

अर्थ

श्रेष्ठ हाथियों पर सुन्दर अंबारियाँ पड़ी हैं। वे जिस प्रकार सजायी गयी थीं, सो कहा नहीं जा सकता। मतवाले हाथी घंटों से सुशोभित होकर चले, मानो सावन के सुन्दर बादलों के समूह जा रहे हों।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३०० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।

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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान