जाचक लिए हँकारि दीन्हि निछावरि कोटि

सोरठा २९५ · बालकाण्ड

सोरठा पाठ

जाचक लिए हँकारि दीन्हि निछावरि कोटि बिधि। चिरु जीवहुँ सुत चारि चक्रबर्ति दसरत्थ के॥ २९५ ॥

अर्थ

फिर भिक्षुकों को बुलाकर करोड़ों प्रकार की निछावरें उन्हें दीं। “चक्रवर्ती महाराज दशरथ के चारों पुत्र चिरंजीवी हों!”

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का सोरठा २९५ है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
जनक का दूत, बारात का प्रस्थान