श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद
धनुषभंग का समाचार पाकर परशुरामजी क्रोध सहित सभा में आते हैं। श्रीरामजी की विनय और श्रीलक्ष्मणजी के तीखे वचनों के बीच संवाद होता है, अंत में परशुरामजी श्रीरामजी का दिव्य स्वरूप पहचानकर शांत हो जाते हैं।
बालकाण्ड · प्रकरण ५४ / ५९
प्रकरण पाठ
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥ एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥ ४ ॥
अर्थ:
हे गोसाईं! लड़कपन में हमने बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डालीं। किन्तु आपने ऐसा क्रोध कभी नहीं किया। इसी धनुष पर इतनी ममता किस कारण से है? यह सुनकर भृगुकुलकेतु परशुरामजी कुपित होकर कहने लगे--।
छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू॥ बोले चितइ परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा॥ २ ॥
अर्थ:
फिर यह तो छूते ही टूट गया, इसमें रघुनाथजी का भी कोई दोष नहीं है। मुनि! आप बिना ही कारण किसलिए क्रोध करते हैं? परशुरामजी अपने फरसे की ओर देखकर बोले--ओरे दुष्ट! तूने मेरा स्वभाव नहीं सुना।
बधें पापु अपकीरति हारें। मारतहूँ पा परिअ तुम्हारें॥ कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा॥ ४ ॥
अर्थ:
क्योंकि इन्हें मारने से पाप लगता है और इनसे हार जाने पर अपकीर्ति होती है। इसलिये आप मारें तो भी आपके पैर ही पड़ना चाहिये। आपका एक-एक वचन ही करोड़ों वज्रों के समान है। धनुष-बाण और कुठार तो आप व्यर्थ ही धारण करते हैं।
कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू॥ खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगें अपराधी गुरुद्रोही॥ ३ ॥
अर्थ:
विश्वामित्रजी ने कहा--अपराध क्षमा कीजिये। बालकों के दोष और गुण को साधु लोग नहीं गिनते। [परशुरामजी बोले--] तीखी धार का कुठार, मैं दयारहित और क्रोधी, और यह गुरुद्रोही और अपराधी मेरे सामने--।
उतर देत छोड़उँ बिनु मारें। केवल कौसिक सील तुम्हारें॥ न त एहि काटि कुठार कठोरें। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें॥ ४ ॥
अर्थ:
उत्तर दे रहा हूँ। इतने पर भी मैं इसे बिना मारे छोड़ रहा हूँ, सो हे विश्वामित्र! केवल तुम्हारे शील (प्रेम) से। नहीं तो इसे इस कठोर कुठार से काटकर थोड़े ही परिश्रम से गुरु से उऋण हो जाता।
गाधिसूनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ। अयमय खाँड़ न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ॥ २७५ ॥
अर्थ:
विश्वामित्रजी ने हृदय में हँसकर कहा--मुनि को हरा-ही-हरा सूझ रहा है (अर्थात् सर्वत्र विजयी होने के कारण ये श्रीराम-लक्ष्मण को भी साधारण क्षत्रिय ही समझ रहे हैं)। किन्तु यह लोहमयी (केवल फौलाद की बनी हुई) खाँड़ है, ऊख की खाँड़ नहीं है। खेद है, मुनि अब भी बेसमझ बने हुए हैं; इनके प्रभाव को नहीं समझ रहे हैं।
कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहिं जान बिदित संसारा॥ माता पितहि उरिन भए नीकें। गुर रिनु रहा सोचु बड़ जी कें॥ १ ॥
अर्थ:
लक्ष्मणजी ने कहा--हे मुनि! आपके शील को कौन नहीं जानता? वह संसार भर में प्रसिद्ध है। आप माता-पिता से तो अच्छी तरह उऋण हो ही गये, अब गुरु का ऋण रहा, जिसका जी में बड़ा सोच लगा है।
सुनि कटु बचन कुठार सुधारा। हाय हाय सब सभा पुकारा॥ भृगुबर परसु देखावहु मोही। बिप्र बिचारि बचउँ नृपद्रोही॥ ३ ॥
अर्थ:
लक्ष्मणजी के कड़वे वचन सुनकर परशुरामजी ने कुठार सँभाला। सारी सभा हाय! हाय! करके पुकार उठी। [लक्ष्मणजी ने कहा--] हे भृगुश्रेष्ठ! आप मुझे फरसा दिखा रहे हैं? पर हे राजाओं के शत्रु! मैं ब्राह्मण समझकर बचा रहा हूँ।
मिले न कबहुँ सुभट रन गाढ़े। द्विज देवता घरहि के बाढ़े॥ अनुचित कहि सब लोग पुकारे। रघुपति सयनहिं लखनु नेवारे॥ ४ ॥
अर्थ:
आपको कभी रणधीर बलवान वीर नहीं मिले। हे ब्राह्मण देवता! आप घर ही में बड़े हैं। यह सुनकर "अनुचित है, अनुचित है" कहकर सब लोग पुकार उठे। तब श्रीरघुनाथजी ने इशारे से लक्ष्मणजी को रोक दिया।
राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने। कहि कछु लखनु बहुरि मुसुकाने॥ हँसत देखि नख सिख रिसब्यापी। राम तोर भ्राता बड़ पापी॥ ३ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी के वचन सुनकर वे कुछ ठंडे पड़े। इतने में लक्ष्मणजी कुछ कहकर फिर मुसकरा दिये। उनको हँसते देखकर परशुरामजी के नख से शिखा तक क्रोध छा गया। उन्होंने कहा--हे राम! तेरा भाई बड़ा पापी है।
जौं अति प्रिय तौ करिअ उपाई। जोरिअ कोउ बड़ गुनी बोलाई॥ बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं। मष्ट करहु अनुचित भल नाहीं॥ २ ॥
अर्थ:
यदि धनुष अत्यन्त ही प्रिय हो, तो कोई उपाय किया जाय और किसी बड़े गुणी को बुलाकर जुड़वा दिया जाय। लक्ष्मणजी के बोलने से जनकजी डर जाते हैं और कहते हैं--बस, चुप रहिये, अनुचित बोलना अच्छा नहीं।
थर थर काँपहिं पुर नर नारी। छोट कुमार खोट बड़ भारी॥ भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी। रिस तन जरइ होइ बल हानी॥ ३ ॥
अर्थ:
जनकपुर के स्त्री-पुरुष थर-थर काँप रहे हैं [और मन-ही-मन कह रहे हैं कि] छोटा कुमार बड़ा ही खोटा है। लक्ष्मणजी की निर्भय वाणी सुन-सुनकर परशुरामजी का शरीर क्रोध से जला जा रहा है और उनके बल की हानि हो रही है।
अति बिनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु जोरि जुग पानी॥ सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना। बालक बचनु करिअ नहिं काना॥ १ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी दोनों हाथ जोड़कर अत्यन्त विनय के साथ कोमल और शीतल वाणी बोले-- हे नाथ! सुनिए, आप तो स्वभाव से ही सुजान हैं। आप बालक के वचन पर कान न कीजिए (उसे सुना-अनसुना कर दीजिए)।
बहइ न हाथु दहइ रिस छाती। भा कुठारु कुंठित नृपघाती॥ भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ। मोरे हृदयँ कृपा कसि काऊ॥ १ ॥
अर्थ:
हाथ चलता नहीं, क्रोध से छाती जली जाती है। [हाय!] राजाओं का घातक यह कुठार भी कुंठित हो गया। विधाता विपरीत हो गया, इससे मेरा स्वभाव बदल गया, नहीं तो भला, मेरे हृदय में किसी समय भी कृपा कैसी?
जौं पै कृपाँ जरिहिं मुनि गाता। क्रोध भएँ तनु राख बिधाता॥ देखु जनक हठि बालकु एहू। कीन्ह चहत जड़ जमपुर गेहू॥ ३ ॥
अर्थ:
हे मुनि! यदि कृपा करने से आपका शरीर जला जाता है, तो क्रोध होने पर तो शरीर की रक्षा विधाता ही करेंगे। [परशुरामजी ने कहा--] हे जनक! देख, यह मूर्ख बालक हठ करके यमपुरी में घर (निवास) करना चाहता है।
गुनह लखन कर हम पर रोषू। कतहुँ सुधाइहु ते बड़ दोषू॥ टेढ़ जानि सब बंदइ काहू। बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न राहू॥ ३ ॥
अर्थ:
[ श्रीरामचन्द्रजी ने मन-ही-मन कहा--] गुनाह (दोष) तो लक्ष्मण का और क्रोध मुझ पर करते हैं! कहीं-कहीं सीधेपन में भी बड़ा दोष होता है। टेढ़ा जानकर सब लोग किसी की भी वन्दना करते हैं; टेढ़े चन्द्रमा को राहु भी नहीं ग्रसता।
राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा। कर कुठारु आगें यह सीसा॥ जेहिं रिस जाइ करिअ सोइ स्वामी। मोहि जानिअ आपन अनुगामी॥ ४ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी ने [प्रकट] कहा- हे मुनीश्वर! क्रोध छोड़िए। आपके हाथ में कुठार है और मेरा यह सिर आगे है। जिस प्रकार आपका क्रोध जाए, हे स्वामी! वही कीजिए। मुझे अपना अनुचर (दास) जानिए।
देखि कुठार बान धनु धारी। भै लरिकहि रिस बीरु बिचारी॥ नामु जान पै तुम्हहि न चीन्हा। बंस सुभायँ उतरु तेहिं दीन्हा॥ १ ॥
अर्थ:
आपको कुठार, बाण और धनुष धारण किए देखकर और वीर समझकर बालक को क्रोध आ गया। वह आपका नाम तो जानता था, पर उसने आपको पहचाना नहीं। अपने वंश (रघुवंश) के स्वभाव के अनुसार उसने उत्तर दिया।
देव एकु गुनु धनुष हमारें। नव गुन परम पुनीत तुम्हारें॥ सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे। छमहु बिप्र अपराध हमारे॥ ४ ॥
अर्थ:
हे देव! हमारे तो एक ही गुण धनुष है और आपके परम पवित्र [शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता-ये] नौ गुण हैं। हम तो सब प्रकार से आपसे हारे हैं। हे विप्र! हमारे अपराधों को क्षमा कीजिए।
समिधि सेन चतुरंग सुहाई। महा महीप भए पसु आई॥ मैं एहिं परसु काटि बलि दीन्हे। समर जग्य जप कोटिन्ह कीन्हे॥ २ ॥
अर्थ:
चतुरंगिणी सेना सुन्दर समिधाएँ (यज्ञ में जलायी जानेवाली लकड़ियाँ) हैं। बड़े-बड़े राजा उसमें आकर बलि के पशु हुए हैं, जिनको मैंने इसी फरसे से काटकर बलि दिया है। ऐसे करोड़ों जपयुक्त रणयज्ञ मैंने किए हैं (अर्थात् जैसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्द के साथ आहुति दी जाती है, उसी प्रकार मैंने पुकार-पुकारकर राजाओं की बलि दी है)।
मोर प्रभाउ बिदित नहिं तोरें। बोलसि निदरि बिप्र के भोरें॥ भंजेउ चापु दापु बड़ बाढ़ा। अहमिति मनहुँ जीति जगु ठाढ़ा॥ ३ ॥
अर्थ:
मेरा प्रभाव तुझे मालूम नहीं है, इसी से तू ब्राह्मण के भ्रम में मेरा निरादर करके बोल रहा है। धनुष तोड़ डाला, इससे तेरा घमंड बहुत बढ़ गया है। ऐसा अहंकार है, मानो संसार को जीतकर खड़ा है।
बिप्रबंस कै असि प्रभुताई। अभय होइ जो तुम्हहि डेराई॥ सुनि मृदु गूढ़ बचन रघुपति के। उघरे पटल परसुधर मति के॥ ३ ॥
अर्थ:
ब्राह्मण वंश की ऐसी ही प्रभुता (महिमा) है कि जो आपसे डरता है, वह सबसे निर्भय हो जाता है [अथवा जो भयरहित होता है वह भी आपसे डरता है]। श्री रघुनाथजी के कोमल और रहस्यपूर्ण वचन सुनकर परशुरामजी की बुद्धि के परदे खुल गये।
राम रमापति कर धनु लेहू। खैंचहु मिटै मोर संदेहू॥ देत चापु आपुहिं चलि गयऊ। परसुराम मन बिसमय भयऊ॥ ४ ॥
अर्थ:
[परशुरामजी ने कहा--] हे राम! हे लक्ष्मीपति! धनुष को हाथ में लीजिये और इसे खींचिये, जिससे मेरा सन्देह मिट जाय। परशुरामजी धनुष देने लगे, तब वह आप ही चल गया। तब परशुरामजी के मन में बड़ा आश्चर्य हुआ।
जय रघुबंस बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृसानू॥ जय सुर बिप्र धेनु हितकारी। जय मद मोह कोह भ्रम हारी॥ १ ॥
अर्थ:
हे रघुकुल रूपी कमलवन के सूर्य! हे राक्षसों के कुलरूपी घने जंगल को जलाने वाले अग्नि! आपकी जय हो। हे देवता, ब्राह्मण और गौ का हित करने वाले! आपकी जय हो। हे मद, मोह, क्रोध और भ्रम के हरने वाले! आपकी जय हो।
बिनय सील करुना गुन सागर। जयति बचन रचना अति नागर॥ सेवक सुखद सुभग सब अंगा। जय सरीर छबि कोटि अनंगा॥ २ ॥
अर्थ:
हे विनय, शील, करुणा आदि गुणों के समुद्र और वचनों की रचना में अत्यन्त चतुर! आपकी जय हो। हे सेवकों को सुख देने वाले, सब अंगों से सुन्दर और शरीर में करोड़ों कामदेवों की छबि धारण करने वाले! आपकी जय हो।
कहि जय जय जय रघुकुलकेतू। भृगुपति गए बनहि तप हेतू॥ अपभयँ कुटिल महीप डेराने। जहँ तहँ कायर गवँहिं पराने॥ ४ ॥
अर्थ:
हे रघुकुल के पताका स्वरूप श्रीरामचन्द्रजी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो। ऐसा कहकर परशुरामजी तप के लिये वन को चले गये। [यह देखकर] दुष्ट राजा लोग बिना ही कारण के (मनःकल्पित) डर से डर गये, वे कायर चुपके से जहाँ-तहाँ भाग गये।
जनक कीन्ह कौसिकहि प्रनामा। प्रभु प्रसाद धनु भंजेउ रामा॥ मोहि कृतकृत्य कीन्ह दुहुँ भाईं। अब जो उचित सो कहिअ गोसाईं॥ ३ ॥
अर्थ:
जनक जी ने विश्वामित्र जी को प्रणाम किया [और कहा--] प्रभु की कृपा से श्रीरामचन्द्र जी ने धनुष तोड़ा है। दोनों भाइयों ने मुझे कृतार्थ कर दिया। हे स्वामी! अब जो उचित हो सो कहिये।