श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद

धनुषभंग का समाचार पाकर परशुरामजी क्रोध सहित सभा में आते हैं। श्रीरामजी की विनय और श्रीलक्ष्मणजी के तीखे वचनों के बीच संवाद होता है, अंत में परशुरामजी श्रीरामजी का दिव्य स्वरूप पहचानकर शांत हो जाते हैं।

बालकाण्ड · प्रकरण ५४ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥ आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥ १ ॥

अर्थ:

हे नाथ! शिवजी के धनुष को तोड़नेवाला आपका कोई एक दास ही होगा। क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? यह सुनकर क्रोधी मुनि रिसाकर बोले--।

चौपाई

सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥ सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥ २ ॥

अर्थ:

सेवक वह है जो सेवाका काम करे। शत्रु का काम करके तो लड़ाई ही करनी चाहिये। हे राम! सुनो, जिसने शिवजी के धनुष को तोड़ा है, वह सहसबाहु के समान मेरा शत्रु है।

चौपाई

सो बिलगाउ बिहाइ समाजा।न त मारे जैहहिं सब राजा॥ सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥ ३ ॥

अर्थ:

वह इस समाज को छोड़कर अलग हो जाय, नहीं तो सभी राजा मारे जायँगे। मुनि के वचन सुनकर लक्ष्मणजी मुसकराये और परशुरामजी का अपमान करते हुए बोले--।

चौपाई

बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥ एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥ ४ ॥

अर्थ:

हे गोसाईं! लड़कपन में हमने बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डालीं। किन्तु आपने ऐसा क्रोध कभी नहीं किया। इसी धनुष पर इतनी ममता किस कारण से है? यह सुनकर भृगुकुलकेतु परशुरामजी कुपित होकर कहने लगे--।

दोहा

रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँमार। धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥ २७१ ॥

अर्थ:

अरे राजपुत्र! काल के वश होने से तुझे बोलने में कुछ भी होश नहीं है। सारे संसार में विख्यात शिवजी का यह धनुष क्या धनुही के समान है?

दोहा 272 के अंतर्गत
चौपाई

लखन कहा हँसि हमरें जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना॥ का छति लाभु जून धनु तोरें। देखा राम नयन के भोरें॥ १ ॥

अर्थ:

लक्ष्मणजी ने हँसकर कहा--हे देव! सुनिये, हमारे जान में तो सभी धनुष एक-से ही हैं। पुराने धनुष के तोड़ने में क्या हानि-लाभ! श्रीरामचन्द्रजी ने तो इसे नवीन के धोखे से देखा था।

चौपाई

छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू॥ बोले चितइ परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा॥ २ ॥

अर्थ:

फिर यह तो छूते ही टूट गया, इसमें रघुनाथजी का भी कोई दोष नहीं है। मुनि! आप बिना ही कारण किसलिए क्रोध करते हैं? परशुरामजी अपने फरसे की ओर देखकर बोले--ओरे दुष्ट! तूने मेरा स्वभाव नहीं सुना।

चौपाई

बालकु बोलि बधउँ नहिं तोही। केवल मुनि जड़ जानहि मोही॥ बाल ब्रह्मचारी अति कोही। बिस्व बिदित छत्रियकुल द्रोही॥ ३ ॥

अर्थ:

मैं तुझे बालक जानकर नहीं मारता हूँ। अरे मूर्ख! क्या तू मुझे निरा मुनि ही जानता है? मैं बाल ब्रह्मचारी और अत्यन्त क्रोधी हूँ। क्षत्रियकुल का शत्रु तो विश्वभर में विख्यात हूँ।

चौपाई

भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही॥ सहसबाहु भुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा॥ ४ ॥

अर्थ:

अपनी भुजाओं के बल से मैंने पृथ्वी को राजाओं से रहित कर दिया और बहुत बार उसे ब्राह्मणों को दे डाला। हे राजकुमार! सहस्रबाहु की भुजाओं को काटनेवाले मेरे इस फरसे को देख।

दोहा

मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर। गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर॥ २७२ ॥

अर्थ:

अरे राजा के बालक! तू अपने माता-पिता को सोच के वश न कर। मेरा फरसा बड़ा भयानक है, यह गर्भों के बच्चों का भी नाश करनेवाला है।

दोहा 273 के अंतर्गत
चौपाई

बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महा भटमानी॥ पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फूँकि पहारू॥ १ ॥

अर्थ:

लक्ष्मणजी हँसकर कोमल वाणी से बोले--अहो, मुनीश्वर तो अपने को बड़ा भारी योद्धा समझते हैं। बार-बार मुझे कुल्हाड़ी दिखाते हैं। फूँक से पहाड़ उड़ाना चाहते हैं।

चौपाई

इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं॥ देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना॥ २ ॥

अर्थ:

यहाँ कोई कुम्हड़े की बतिया नहीं है, जो तर्जनी को देखते ही मर जाती हैं। कुठार और धनुष-बाण देखकर ही मैंने कुछ अभिमान सहित कहा था।

चौपाई

भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी॥ सुर महिसुर हरिजन अरु गाई। हमरें कुल इन्ह पर न सुराई॥ ३ ॥

अर्थ:

भृगुसुत समझकर और जनेऊ देखकर तो जो कुछ आप कहते हैं, उसे मैं क्रोध को रोककर सह लेता हूँ। देवता, महिषुर, हरिजन और गौ--इन पर हमारे कुल में वीरता नहीं दिखायी जाती।

चौपाई

बधें पापु अपकीरति हारें। मारतहूँ पा परिअ तुम्हारें॥ कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा॥ ४ ॥

अर्थ:

क्योंकि इन्हें मारने से पाप लगता है और इनसे हार जाने पर अपकीर्ति होती है। इसलिये आप मारें तो भी आपके पैर ही पड़ना चाहिये। आपका एक-एक वचन ही करोड़ों वज्रों के समान है। धनुष-बाण और कुठार तो आप व्यर्थ ही धारण करते हैं।

दोहा

जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर। सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गभीर॥ २७३ ॥

अर्थ:

इन्हें देखकर मैंने कुछ अनुचित कहा हो, तो उसे हे धीर महामुनि! क्षमा कीजिये। यह सुनकर भृगुवंशमणि परशुरामजी क्रोध के साथ गम्भीर वाणी बोले--।

दोहा 274 के अंतर्गत
चौपाई

कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु। कुटिलकालबस निज कुल घालकु॥ भानु बंस राकेस कलंकू। निपट निरंकुस अबुध असंकू॥ १ ॥

अर्थ:

हे विश्वामित्र! सुनो, यह बालक बड़ा कुबुद्धि और कुटिल है, काल के वश होकर यह अपने कुल का घातक बन रहा है। यह सूर्यवंशरूपी पूर्णचन्द्र का कलंकू है। यह बिलकुल उद्दण्ड, मूर्ख और निडर है।

चौपाई

काल कवलु होइहि छन माहीं। कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं॥ तुम्ह हटकहु जौं चहहु उबारा। कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा॥ २ ॥

अर्थ:

अभी क्षणभर में यह काल का ग्रास हो जायेगा। मैं पुकारकर कहे देता हूँ, फिर मुझे दोष नहीं है। यदि तुम इसे बचाना चाहते हो, तो हमारा प्रताप, बल और क्रोध बतलाकर इसे मना कर दो।

चौपाई

लखन कहेउ मुनि सुजसु तुम्हारा। तुम्हहि अछत को बरनै पारा॥ अपने मुँह तुम्ह आपनि करनी। बार अनेक भाँति बहु बरनी॥ ३ ॥

अर्थ:

लक्ष्मणजी ने कहा--हे मुनि! आपका सुयश आपके रहते दूसरा कौन वर्णन कर सकता है? आपने अपने ही मुँह से अपनी करनी अनेकों बार बहुत प्रकार से वर्णन की है।

चौपाई

नहिं संतोषु त पुनि कछु कहहू। जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू॥ बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा। गारी देत न पावहु सोभा॥ ४ ॥

अर्थ:

इतने पर भी संतोष न हुआ हो तो फिर कुछ कह डालिये। क्रोध रोककर असह्य दुःख मत सहिये। आप वीरता का व्रत धारण करनेवाले, धैर्यवान् और क्षोभरहित हैं। गाली देते शोभा नहीं पाते।

दोहा

सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु। बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु॥ २७४ ॥

अर्थ:

शूरवीर तो युद्ध में करनी (शूरवीरता का कार्य) करते हैं, कहकर अपने को नहीं जनाते। शत्रु को युद्ध में उपस्थित पाकर कायर ही अपने प्रताप की डींग मारते हैं।

दोहा 275 के अंतर्गत
चौपाई

तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा॥ सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा॥ १ ॥

अर्थ:

आप तो मानो काल को हाँक लगाकर बार-बार उसे मेरे लिये बुलाते हैं। लक्ष्मणजी के कठोर वचन सुनते ही परशुरामजी ने अपने भयानक फरसे को सुधारकर हाथ में ले लिया।

चौपाई

अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालकु बधजोगू॥ बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब यहु मरनिहार भा साँचा॥ २ ॥

अर्थ:

अब लोग मुझे दोष न दें। यह कड़ुआ बोलनेवाला बालक मारे जाने के ही योग्य है। इसे बालक देखकर मैंने बहुत बचाया, पर अब यह सचमुच मरने को ही आ गया है।

चौपाई

कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू॥ खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगें अपराधी गुरुद्रोही॥ ३ ॥

अर्थ:

विश्वामित्रजी ने कहा--अपराध क्षमा कीजिये। बालकों के दोष और गुण को साधु लोग नहीं गिनते। [परशुरामजी बोले--] तीखी धार का कुठार, मैं दयारहित और क्रोधी, और यह गुरुद्रोही और अपराधी मेरे सामने--।

चौपाई

उतर देत छोड़उँ बिनु मारें। केवल कौसिक सील तुम्हारें॥ न त एहि काटि कुठार कठोरें। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें॥ ४ ॥

अर्थ:

उत्तर दे रहा हूँ। इतने पर भी मैं इसे बिना मारे छोड़ रहा हूँ, सो हे विश्वामित्र! केवल तुम्हारे शील (प्रेम) से। नहीं तो इसे इस कठोर कुठार से काटकर थोड़े ही परिश्रम से गुरु से उऋण हो जाता।

दोहा

गाधिसूनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ। अयमय खाँड़ न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ॥ २७५ ॥

अर्थ:

विश्वामित्रजी ने हृदय में हँसकर कहा--मुनि को हरा-ही-हरा सूझ रहा है (अर्थात् सर्वत्र विजयी होने के कारण ये श्रीराम-लक्ष्मण को भी साधारण क्षत्रिय ही समझ रहे हैं)। किन्तु यह लोहमयी (केवल फौलाद की बनी हुई) खाँड़ है, ऊख की खाँड़ नहीं है। खेद है, मुनि अब भी बेसमझ बने हुए हैं; इनके प्रभाव को नहीं समझ रहे हैं।

दोहा 276 के अंतर्गत
चौपाई

कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहिं जान बिदित संसारा॥ माता पितहि उरिन भए नीकें। गुर रिनु रहा सोचु बड़ जी कें॥ १ ॥

अर्थ:

लक्ष्मणजी ने कहा--हे मुनि! आपके शील को कौन नहीं जानता? वह संसार भर में प्रसिद्ध है। आप माता-पिता से तो अच्छी तरह उऋण हो ही गये, अब गुरु का ऋण रहा, जिसका जी में बड़ा सोच लगा है।

चौपाई

सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा। दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा॥ अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली। तुरत देउँ मैं थैली खोली॥ २ ॥

अर्थ:

वह मानो हमारे ही माथे काढ़ा था। बहुत दिन बीत गये, इससे ब्याज भी बहुत बढ़ गया होगा। अब किसी हिसाब करनेवाले को बुला लाइये, तो मैं तुरंत थैली खोलकर दे दूँ।

चौपाई

सुनि कटु बचन कुठार सुधारा। हाय हाय सब सभा पुकारा॥ भृगुबर परसु देखावहु मोही। बिप्र बिचारि बचउँ नृपद्रोही॥ ३ ॥

अर्थ:

लक्ष्मणजी के कड़वे वचन सुनकर परशुरामजी ने कुठार सँभाला। सारी सभा हाय! हाय! करके पुकार उठी। [लक्ष्मणजी ने कहा--] हे भृगुश्रेष्ठ! आप मुझे फरसा दिखा रहे हैं? पर हे राजाओं के शत्रु! मैं ब्राह्मण समझकर बचा रहा हूँ।

चौपाई

मिले न कबहुँ सुभट रन गाढ़े। द्विज देवता घरहि के बाढ़े॥ अनुचित कहि सब लोग पुकारे। रघुपति सयनहिं लखनु नेवारे॥ ४ ॥

अर्थ:

आपको कभी रणधीर बलवान वीर नहीं मिले। हे ब्राह्मण देवता! आप घर ही में बड़े हैं। यह सुनकर "अनुचित है, अनुचित है" कहकर सब लोग पुकार उठे। तब श्रीरघुनाथजी ने इशारे से लक्ष्मणजी को रोक दिया।

दोहा

लखन उतर आहुति सरिस भृगुबर कोपु कृसानु। बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु॥ २७६ ॥

अर्थ:

लक्ष्मणजी के उत्तर से, जो आहुति के समान थे, परशुरामजी के क्रोधरूपी अग्नि को बढ़ते देखकर रघुकुल के सूर्य श्रीरामचन्द्रजी जल के समान (शान्त करनेवाले) वचन बोले--।

दोहा 277 के अंतर्गत
चौपाई

नाथ करहु बालक पर छोहू। सूध दूधमुख करिअ न कोहू॥ जौं पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना। तौ कि बराबरि करत अयाना॥ १ ॥

अर्थ:

हे नाथ! बालक पर कृपा कीजिये। इस सीधे और दूधमुखे बच्चे पर क्रोध न कीजिये। यदि यह प्रभु का कुछ भी प्रभाव जानता, तो क्या यह बेसमझ आपकी बराबरी करता?

चौपाई

जौं लरिका कछु अचगरि करहीं। गुर पितु मातु मोद मन भरहीं॥ करिअ कृपा सिसु सेवक जानी। तुम्ह सम सील धीर मुनि ग्यानी॥ २ ॥

अर्थ:

बालक यदि कुछ चपलता भी करते हैं, तो गुरु, पिता और माता के मन में आनन्द भर जाता है। अतः इसे छोटा बच्चा और सेवक जानकर कृपा कीजिये। आप तो समदर्शी, सुशील, धीर और ज्ञानी मुनि हैं।

चौपाई

राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने। कहि कछु लखनु बहुरि मुसुकाने॥ हँसत देखि नख सिख रिसब्यापी। राम तोर भ्राता बड़ पापी॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के वचन सुनकर वे कुछ ठंडे पड़े। इतने में लक्ष्मणजी कुछ कहकर फिर मुसकरा दिये। उनको हँसते देखकर परशुरामजी के नख से शिखा तक क्रोध छा गया। उन्होंने कहा--हे राम! तेरा भाई बड़ा पापी है।

चौपाई

गौर सरीर स्याम मन माहीं। कालकूटमुख पयमुख नाहीं॥ सहज टेढ़ अनुहरइ न तोही। नीचु मीचु सम देख न मोही॥ ४ ॥

अर्थ:

यह शरीर से गोरा, पर हृदय का बड़ा काला है। यह विषमुख है, दुधमुहा नहीं। स्वभाव से ही टेढ़ा है, तेरा अनुसरण नहीं करता (तेरे जैसा शीलवान् नहीं है)। यह नीच मुझे काल के समान नहीं देखता।

दोहा

लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि क्रोधु पाप कर मूल। जेहि बस जन अनुचित करहिं चरहिं बिस्व प्रतिकूल॥ २७७ ॥

अर्थ:

लक्ष्मणजी ने हँसकर कहा--हे मुनि! सुनिये, क्रोध पाप का मूल है, जिसके वश में होकर मनुष्य अनुचित कर्म कर बैठते हैं और विश्व भर के प्रतिकूल चलते हैं।

दोहा 278 के अंतर्गत
चौपाई

मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोपु करिअ अब दाया॥ टूट चाप नहिं जुरिहि रिसाने। बैठिअ होइहिं पाय पिराने॥ १ ॥

अर्थ:

मैं तुम्हारा अनुचर हूँ, मुनिराज। परित्याग करके क्रोध त्यागिये, अब दया कीजिये। टूटा चाप क्रोध करने से जुड़ नहीं जायेगा। बैठिये, पैर पिराने लगेंगे।

चौपाई

जौं अति प्रिय तौ करिअ उपाई। जोरिअ कोउ बड़ गुनी बोलाई॥ बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं। मष्ट करहु अनुचित भल नाहीं॥ २ ॥

अर्थ:

यदि धनुष अत्यन्त ही प्रिय हो, तो कोई उपाय किया जाय और किसी बड़े गुणी को बुलाकर जुड़वा दिया जाय। लक्ष्मणजी के बोलने से जनकजी डर जाते हैं और कहते हैं--बस, चुप रहिये, अनुचित बोलना अच्छा नहीं।

चौपाई

थर थर काँपहिं पुर नर नारी। छोट कुमार खोट बड़ भारी॥ भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी। रिस तन जरइ होइ बल हानी॥ ३ ॥

अर्थ:

जनकपुर के स्त्री-पुरुष थर-थर काँप रहे हैं [और मन-ही-मन कह रहे हैं कि] छोटा कुमार बड़ा ही खोटा है। लक्ष्मणजी की निर्भय वाणी सुन-सुनकर परशुरामजी का शरीर क्रोध से जला जा रहा है और उनके बल की हानि हो रही है।

चौपाई

बोले रामहि देइ निहोरा। बचउँ बिचारि बंधु लघु तोरा॥ मनु मलीन तनु सुंदर कैसें। बिष रस भरा कनक घटु जैसें॥ ४ ॥

अर्थ:

तब श्रीरामचन्द्रजी पर एहसान जनाकर परशुरामजी बोले--तेरा छोटा भाई समझकर मैं इसे बचा रहा हूँ। यह मन का मैला और शरीर का कैसा सुन्दर है, जैसे विष के रस से भरा हुआ सोने का घड़ा।

दोहा

सुनि लछिमन बिहसे बहुरि नयन तरेरे राम। गुर समीप गवने सकुचि परिहरि बानी बाम॥ २७८ ॥

अर्थ:

यह सुनकर लक्ष्मणजी फिर हँसे। तब श्रीरामचन्द्रजी ने तिरछी नजर से उनकी ओर देखा, जिससे लक्ष्मणजी सकुचाकर, विपरीत बोलना छोड़कर, गुरुजी के पास चले गये।

दोहा 279 के अंतर्गत
चौपाई

अति बिनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु जोरि जुग पानी॥ सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना। बालक बचनु करिअ नहिं काना॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी दोनों हाथ जोड़कर अत्यन्त विनय के साथ कोमल और शीतल वाणी बोले-- हे नाथ! सुनिए, आप तो स्वभाव से ही सुजान हैं। आप बालक के वचन पर कान न कीजिए (उसे सुना-अनसुना कर दीजिए)।

चौपाई

बररै बालकु एकु सुभाऊ। इन्हहि न संत बिदूषहिं काऊ॥ तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा। अपराधी मैं नाथ तुम्हारा॥ २ ॥

अर्थ:

बड़े और बालक का एक स्वभाव है। संतजन इन्हें कभी दोष नहीं लगाते। फिर उसने (लक्ष्मण ने) तो कुछ काम भी नहीं बिगाड़ा है, हे नाथ! आपका अपराधी तो मैं हूँ।

चौपाई

कृपा कोपु बधु बँधब गोसाईं। मो पर करिअ दास की नाईं॥ कहिअ बेगि जेहि बिधि रिस जाई। मुनिनायक सोइ करौं उपाई॥ ३ ॥

अर्थ:

अतः हे स्वामी! कृपा, क्रोध, वध और बन्धन, जो कुछ करना हो, दास की तरह (अर्थात् दास समझकर) मुझ पर कीजिए। जिस प्रकार से शीघ्र आपका क्रोध दूर हो, हे मुनिराज! बताइए, मैं वही उपाय करूँ।

चौपाई

कह मुनि राम जाइ रिस कैसें। अजहुँ अनुज तव चितव अनैसें॥ एहि कें कंठ कुठारु न दीन्हा। तौ मैं काह कोपु करि कीन्हा॥ ४ ॥

अर्थ:

मुनि ने कहा- हे राम! क्रोध कैसे जाए; अब भी तेरा छोटा भाई टेढ़ा ही ताक रहा है। इसकी गर्दन पर मैंने कुठार न चलाया, तो क्रोध करके किया ही क्या?

दोहा

गर्भ स्रवहिं अवनिप रवनि सुनि कुठार गति घोर। परसु अछत देखउँ जिअत बैरी भूपकिसोर॥ २७९ ॥

अर्थ:

मेरे जिस कुठार की घोर गति सुनकर राजाओं की स्त्रियों के गर्भ गिर पड़ते हैं, उसी फरसे के रहते मैं इस शत्रु राजपुत्र को जीवित देख रहा हूँ।

दोहा 280 के अंतर्गत
चौपाई

बहइ न हाथु दहइ रिस छाती। भा कुठारु कुंठित नृपघाती॥ भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ। मोरे हृदयँ कृपा कसि काऊ॥ १ ॥

अर्थ:

हाथ चलता नहीं, क्रोध से छाती जली जाती है। [हाय!] राजाओं का घातक यह कुठार भी कुंठित हो गया। विधाता विपरीत हो गया, इससे मेरा स्वभाव बदल गया, नहीं तो भला, मेरे हृदय में किसी समय भी कृपा कैसी?

चौपाई

आजु दया दुखु दुसह सहावा। सुनि सौमित्रि बिहसि सिरु नावा॥ बाउ कृपा मूरति अनुकूला। बोलत बचन झरत जनु फूला॥ २ ॥

अर्थ:

आज दया मुझे यह दुःसह दुःख सहा रही है। यह सुनकर लक्ष्मणजी ने मुसकराकर सिर नवाया [और कहा--] आपकी कृपारूपी मूर्ति भी आपकी अनुकूल ही है, वचन बोलते हैं, मानो फूल झड़ रहे हैं।

चौपाई

जौं पै कृपाँ जरिहिं मुनि गाता। क्रोध भएँ तनु राख बिधाता॥ देखु जनक हठि बालकु एहू। कीन्ह चहत जड़ जमपुर गेहू॥ ३ ॥

अर्थ:

हे मुनि! यदि कृपा करने से आपका शरीर जला जाता है, तो क्रोध होने पर तो शरीर की रक्षा विधाता ही करेंगे। [परशुरामजी ने कहा--] हे जनक! देख, यह मूर्ख बालक हठ करके यमपुरी में घर (निवास) करना चाहता है।

चौपाई

बेगि करहु किन आँखिन्ह ओटा। देखत छोट खोट नृपु ढोटा॥ बिहसे लखनु कहा मन माहीं। मूदें आँखि कतहुँ कोउ नाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

इसको शीघ्र ही आँखों की ओट क्यों नहीं करते? यह राजपुत्र देखने में छोटा है, पर है बड़ा खोटा। लक्ष्मणजी ने हँसकर मन-ही-मन कहा--आँख मूँद लेने पर कहीं कोई नहीं है।

दोहा

परसुरामु तब राम प्रति बोले उर अति क्रोधु। संभु सरासनु तोरि सठ करसि हमार प्रबोधु॥ २८० ॥

अर्थ:

तब परशुरामजी हृदय में अत्यन्त क्रोध भरकर श्रीरामजी से बोले-- अरे शठ! तू शिवजी का धनुष तोड़कर उलटा हमीं को ज्ञान सिखाता है!

दोहा 281 के अंतर्गत
चौपाई

बंधु कहइ कटु संमत तोरें। तू छल बिनय करसि कर जोरें॥ करु परितोषु मोर संग्रामा। नाहिं त छाड़ कहाउब रामा॥ १ ॥

अर्थ:

तेरा यह भाई तेरी ही सम्मति से कटु वचन बोलता है और तू छल से हाथ जोड़कर विनय करता है। या तो युद्ध में मेरा संतोष कर, नहीं तो राम कहलाना छोड़ दे।

चौपाई

छलु तजि करहि समरु सिवद्रोही। बंधु सहित न त मारउँ तोही॥ भृगुपति बकहिं कुठार उठाएँ। मन मुसुकाहिं रामु सिर नाएँ॥ २ ॥

अर्थ:

अरे शिवद्रोही! छल त्यागकर मुझसे युद्ध कर। नहीं तो भाई सहित तुझे मार डालूँगा। इस प्रकार परशुरामजी कुठार उठाए बक रहे हैं और श्रीरामचन्द्रजी सिर झुकाए मन-ही-मन मुसकरा रहे हैं।

चौपाई

गुनह लखन कर हम पर रोषू। कतहुँ सुधाइहु ते बड़ दोषू॥ टेढ़ जानि सब बंदइ काहू। बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न राहू॥ ३ ॥

अर्थ:

[ श्रीरामचन्द्रजी ने मन-ही-मन कहा--] गुनाह (दोष) तो लक्ष्मण का और क्रोध मुझ पर करते हैं! कहीं-कहीं सीधेपन में भी बड़ा दोष होता है। टेढ़ा जानकर सब लोग किसी की भी वन्दना करते हैं; टेढ़े चन्द्रमा को राहु भी नहीं ग्रसता।

चौपाई

राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा। कर कुठारु आगें यह सीसा॥ जेहिं रिस जाइ करिअ सोइ स्वामी। मोहि जानिअ आपन अनुगामी॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी ने [प्रकट] कहा- हे मुनीश्वर! क्रोध छोड़िए। आपके हाथ में कुठार है और मेरा यह सिर आगे है। जिस प्रकार आपका क्रोध जाए, हे स्वामी! वही कीजिए। मुझे अपना अनुचर (दास) जानिए।

दोहा

प्रभुहि सेवकहि समरु कस तजहु बिप्रबर रोसु। बेषु बिलोकें कहेसि कछु बालकहू नहिं दोसु॥ २८१ ॥

अर्थ:

स्वामी और सेवक में युद्ध कैसा? हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! क्रोध का त्याग कीजिए। आपका [वीरों का-सा] वेष देखकर ही बालक ने कुछ कह डाला था; वास्तव में उसका भी कोई दोष नहीं है।

दोहा 282 के अंतर्गत
चौपाई

देखि कुठार बान धनु धारी। भै लरिकहि रिस बीरु बिचारी॥ नामु जान पै तुम्हहि न चीन्हा। बंस सुभायँ उतरु तेहिं दीन्हा॥ १ ॥

अर्थ:

आपको कुठार, बाण और धनुष धारण किए देखकर और वीर समझकर बालक को क्रोध आ गया। वह आपका नाम तो जानता था, पर उसने आपको पहचाना नहीं। अपने वंश (रघुवंश) के स्वभाव के अनुसार उसने उत्तर दिया।

चौपाई

जौं तुम्ह औतेहु मुनि की नाईं। पद रज सिर सिसु धरत गोसाईं॥ छमहु चूक अनजानत केरी। चहिअ बिप्र उर कृपा घनेरी॥ २ ॥

अर्थ:

यदि आप मुनि की तरह आते, तो हे स्वामी! बालक आपके चरणों की धूलि सिर पर रखता। अनजाने की भूल को क्षमा कर दीजिए। ब्राह्मणों के हृदय में बहुत अधिक दया होनी चाहिए।

चौपाई

हमहि तुम्हहि सरिबरि कसि नाथा। कहहु न कहाँ चरन कहँ माथा॥ राम मात्र लघु नाम हमारा। परसु सहित बड़ नाम तोहारा॥ ३ ॥

अर्थ:

हे नाथ! हमारी और आपकी बराबरी कैसी? कहिए न, कहाँ चरण और कहाँ मस्तक! कहाँ मेरा राममात्र छोटा-सा नाम और कहाँ आपका परशु सहित बड़ा नाम।

चौपाई

देव एकु गुनु धनुष हमारें। नव गुन परम पुनीत तुम्हारें॥ सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे। छमहु बिप्र अपराध हमारे॥ ४ ॥

अर्थ:

हे देव! हमारे तो एक ही गुण धनुष है और आपके परम पवित्र [शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता-ये] नौ गुण हैं। हम तो सब प्रकार से आपसे हारे हैं। हे विप्र! हमारे अपराधों को क्षमा कीजिए।

दोहा

बार बार मुनि बिप्रबर कहा राम सन राम। बोले भृगुपति सरुष हसि तहूँ बंधु सम बाम॥ २८२ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी ने परशुरामजी को बार-बार 'मुनि' और 'विप्रवर' कहा। तब भृगुपति (परशुरामजी) कुपित होकर [अथवा क्रोध की हँसी हँसकर] बोले-- तू भी अपने भाई के समान ही टेढ़ा है।

दोहा 283 के अंतर्गत
चौपाई

निपटहिं द्विज करि जानहि मोही। मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही॥ चाप स्रुवा सर आहुति जानू। कोपु मोर अति घोर कृसानू॥ १ ॥

अर्थ:

तू मुझे निरा ब्राह्मण ही समझता है? मैं जैसा विप्र हूँ, तुझे सुनाता हूँ। धनुष को स्रुवा, बाण को आहुति और मेरे क्रोध को अत्यन्त घोर अग्नि जान।

चौपाई

समिधि सेन चतुरंग सुहाई। महा महीप भए पसु आई॥ मैं एहिं परसु काटि बलि दीन्हे। समर जग्य जप कोटिन्ह कीन्हे॥ २ ॥

अर्थ:

चतुरंगिणी सेना सुन्दर समिधाएँ (यज्ञ में जलायी जानेवाली लकड़ियाँ) हैं। बड़े-बड़े राजा उसमें आकर बलि के पशु हुए हैं, जिनको मैंने इसी फरसे से काटकर बलि दिया है। ऐसे करोड़ों जपयुक्त रणयज्ञ मैंने किए हैं (अर्थात् जैसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्द के साथ आहुति दी जाती है, उसी प्रकार मैंने पुकार-पुकारकर राजाओं की बलि दी है)।

चौपाई

मोर प्रभाउ बिदित नहिं तोरें। बोलसि निदरि बिप्र के भोरें॥ भंजेउ चापु दापु बड़ बाढ़ा। अहमिति मनहुँ जीति जगु ठाढ़ा॥ ३ ॥

अर्थ:

मेरा प्रभाव तुझे मालूम नहीं है, इसी से तू ब्राह्मण के भ्रम में मेरा निरादर करके बोल रहा है। धनुष तोड़ डाला, इससे तेरा घमंड बहुत बढ़ गया है। ऐसा अहंकार है, मानो संसार को जीतकर खड़ा है।

चौपाई

राम कहा मुनि कहहु बिचारी। रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी॥ छुअतहिं टूट पिनाक पुराना। मैं केहि हेतु करौं अभिमाना॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा-- हे मुनि! विचार कर बोलिए। आपका क्रोध बहुत बड़ा है। और मेरी भूल बहुत छोटी है। पुराना धनुष था, छूते ही टूट गया। मैं किस कारण अभिमान करूँ?

दोहा

जौं हम निदरहिं बिप्र बदि सत्य सुनहु भृगुनाथ। तौ अस को जग सुभटु जेहि भय बस नावहिं माथ॥ २८३ ॥

अर्थ:

हे भृगुनाथ! यदि हम सचमुच ब्राह्मण कहकर निरादर करते हैं, तो यह सत्य सुनिए, फिर संसार में ऐसा कौन योद्धा है जिसे हम डर के मारे मस्तक नवाएँ?

दोहा 284 के अंतर्गत
चौपाई

देव दनुज भूपति भट नाना। समबल अधिक होउ बलवाना॥ जौं रन हमहि पचारै कोऊ। लरहिं सुखेन कालु किन होऊ॥ १ ॥

अर्थ:

देवता, दैत्य, राजा या और बहुत-से योद्धा, वे चाहे बल में हमारे बराबर हों, चाहे अधिक बलवान हों, यदि रण में हमें कोई भी ललकारे तो हम उससे सुखपूर्वक लड़ेंगे, चाहे काल ही क्यों न हो?

चौपाई

छत्रिय तनु धरि समर सकाना। कुल कलंकु तेहिं पावँर आना॥ कहउँ सुभाउ न कुलहि प्रसंसी। कालहु डरहिं न रन रघुबंसी॥ २ ॥

अर्थ:

क्षत्रिय का शरीर धरकर जो युद्ध में डर गया, उस नीच ने अपने कुल पर कलंक लगा दिया। मैं स्वभाव से ही कहता हूँ, कुल की प्रशंसा करके नहीं, कि रघुवंशी रण में काल से भी नहीं डरते।

चौपाई

बिप्रबंस कै असि प्रभुताई। अभय होइ जो तुम्हहि डेराई॥ सुनि मृदु गूढ़ बचन रघुपति के। उघरे पटल परसुधर मति के॥ ३ ॥

अर्थ:

ब्राह्मण वंश की ऐसी ही प्रभुता (महिमा) है कि जो आपसे डरता है, वह सबसे निर्भय हो जाता है [अथवा जो भयरहित होता है वह भी आपसे डरता है]। श्री रघुनाथजी के कोमल और रहस्यपूर्ण वचन सुनकर परशुरामजी की बुद्धि के परदे खुल गये।

चौपाई

राम रमापति कर धनु लेहू। खैंचहु मिटै मोर संदेहू॥ देत चापु आपुहिं चलि गयऊ। परसुराम मन बिसमय भयऊ॥ ४ ॥

अर्थ:

[परशुरामजी ने कहा--] हे राम! हे लक्ष्मीपति! धनुष को हाथ में लीजिये और इसे खींचिये, जिससे मेरा सन्देह मिट जाय। परशुरामजी धनुष देने लगे, तब वह आप ही चल गया। तब परशुरामजी के मन में बड़ा आश्चर्य हुआ।

दोहा

जाना राम प्रभाउ तब पुलक प्रफुल्लित गात। जोरि पानि बोले बचन हृदयँ न प्रेमु अमात॥ २८४ ॥

अर्थ:

तब उन्होंने श्रीरामजी का प्रभाव जाना, [जिसके कारण] उनका शरीर पुलकित और प्रफुल्लित हो गया। वे हाथ जोड़कर वचन बोले--प्रेम उनके हृदय में समाता न था--।

दोहा 285 के अंतर्गत
चौपाई

जय रघुबंस बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृसानू॥ जय सुर बिप्र धेनु हितकारी। जय मद मोह कोह भ्रम हारी॥ १ ॥

अर्थ:

हे रघुकुल रूपी कमलवन के सूर्य! हे राक्षसों के कुलरूपी घने जंगल को जलाने वाले अग्नि! आपकी जय हो। हे देवता, ब्राह्मण और गौ का हित करने वाले! आपकी जय हो। हे मद, मोह, क्रोध और भ्रम के हरने वाले! आपकी जय हो।

चौपाई

बिनय सील करुना गुन सागर। जयति बचन रचना अति नागर॥ सेवक सुखद सुभग सब अंगा। जय सरीर छबि कोटि अनंगा॥ २ ॥

अर्थ:

हे विनय, शील, करुणा आदि गुणों के समुद्र और वचनों की रचना में अत्यन्त चतुर! आपकी जय हो। हे सेवकों को सुख देने वाले, सब अंगों से सुन्दर और शरीर में करोड़ों कामदेवों की छबि धारण करने वाले! आपकी जय हो।

चौपाई

करौं काह मुख एक प्रसंसा। जय महेस मन मानस हंसा॥ अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता। छमहु छमामंदिर दोउ भ्राता॥ ३ ॥

अर्थ:

मैं एक मुख से आपकी क्या प्रशंसा करूँ? हे महादेवजी के मनरूपी मानसरोवर के हंस! आपकी जय हो। मैंने अनजान में आपको बहुत-से अनुचित वचन कहे। हे क्षमा-मंदिर दोनों भाई! मुझे क्षमा कीजिये।

चौपाई

कहि जय जय जय रघुकुलकेतू। भृगुपति गए बनहि तप हेतू॥ अपभयँ कुटिल महीप डेराने। जहँ तहँ कायर गवँहिं पराने॥ ४ ॥

अर्थ:

हे रघुकुल के पताका स्वरूप श्रीरामचन्द्रजी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो। ऐसा कहकर परशुरामजी तप के लिये वन को चले गये। [यह देखकर] दुष्ट राजा लोग बिना ही कारण के (मनःकल्पित) डर से डर गये, वे कायर चुपके से जहाँ-तहाँ भाग गये।

दोहा

देवन्ह दीन्हीं दुंदुभीं प्रभु पर बरषहिं फूल। हरषे पुर नर नारि सब मिटी मोहमय सूल॥ २८५ ॥

अर्थ:

देवताओं ने नगाड़े बजाये, वे प्रभु के ऊपर फूल बरसाने लगे। नगर के नर-नारी सब हर्षित हो गये। उनका मोहमय (अज्ञान से उत्पन्न) शूल मिट गया।

दोहा 286 के अंतर्गत
चौपाई

अति गहगहे बाजने बाजे। सबहिं मनोहर मंगल साजे॥ जूथ जूथ मिलि सुमुखि सुनयनीं। करहिं गान कल कोकिलबयनीं॥ १ ॥

अर्थ:

खूब जोर से बाजे बजने लगे। सभी ने मनोहर मंगल-साज सजे। सुन्दर मुख और सुन्दर नेत्रों वाली तथा कोयल के समान मधुर बोलने वाली स्त्रियाँ झुंड-झुंड मिलकर सुन्दर गान करने लगीं।

चौपाई

सुखु बिदेह कर बरनि न जाई। जन्मदरिद्र मनहुँ निधि पाई॥ बिगत त्रास भइ सीय सुखारी। जनु बिधु उदयँ चकोरकुमारी॥ २ ॥

अर्थ:

जनक जी के सुख का वर्णन नहीं किया जा सकता; मानो जन्म का दरिद्री धन का खजाना पा गया हो! सीता जी का भय जाता रहा; वे ऐसी सुखी हुईं जैसे चन्द्रमा के उदय से चकोर की कन्या सुखी होती है।

चौपाई

जनक कीन्ह कौसिकहि प्रनामा। प्रभु प्रसाद धनु भंजेउ रामा॥ मोहि कृतकृत्य कीन्ह दुहुँ भाईं। अब जो उचित सो कहिअ गोसाईं॥ ३ ॥

अर्थ:

जनक जी ने विश्वामित्र जी को प्रणाम किया [और कहा--] प्रभु की कृपा से श्रीरामचन्द्र जी ने धनुष तोड़ा है। दोनों भाइयों ने मुझे कृतार्थ कर दिया। हे स्वामी! अब जो उचित हो सो कहिये।

चौपाई

कह मुनि सुनु नरनाथ प्रबीना। रहा बिबाहु चाप आधीना॥ टूटतहीं धनु भयउ बिबाहू। सुर नर नाग बिदित सब काहू॥ ४ ॥

अर्थ:

मुनि ने कहा--हे चतुर नरेश! सुनो, यों तो विवाह धनुष के अधीन था; धनुष के टूटते ही विवाह हो गया। देवता, मनुष्य और नाग, सब किसी को यह मालूम है।

दोहा

तदपि जाइ तुम्ह करहु अब जथा बंस ब्यवहारु। बूझि बिप्र कुलबृद्ध गुर बेद बिदित आचारु॥ २८६ ॥

अर्थ:

तथापि तुम जाकर अब जैसा वंश-व्यवहार हो, ब्राह्मण, कुलवृद्ध गुरु और वेद में विदित आचार पूछकर वैसा करो।