तुरग नचावहिं कुअँर बर अकनि मृदंग

दोहा ३०२ · बालकाण्ड

दोहा पाठ

तुरग नचावहिं कुअँर बर अकनि मृदंग निसान। नागर नट चितवहिं चकित डगहिं न ताल बँधान॥ ३०२ ॥

अर्थ

सुन्दर राजकुमार मृदंग और नगाड़े के शब्द सुनकर घोड़ों को उन्हीं के अनुसार इस प्रकार नचा रहे हैं कि वे ताल के बंधान से जरा भी डिगते नहीं हैं। चतुर नट चकित होकर यह देख रहे हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का दोहा ३०२ है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।

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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान