पठए बोलि गुनी तिन्ह नाना

चौपाई ४, दोहा २८७ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

पठए बोलि गुनी तिन्ह नाना। जे बितान बिधि कुसल सुजाना॥ बिधिहि बंदि तिन्ह कीन्ह अरंभा। बिरचे कनक कदलि के खंभा॥ ४ ॥

अर्थ

उन्होंने अनेक कारीगरों को बुला भेजा, जो मण्डप बनाने में कुशल और चतुर थे। उन्होंने ब्रह्मा की वन्दना करके कार्य आरम्भ किया और [पहले] सोने के केले के खंभे बनाये।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २८७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।

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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान