सावँकरन अगनित हय होते
सावँकरन अगनित हय होते
चौपाई ३, दोहा २९९ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सावँकरन अगनित हय होते। ते तिन्ह रथन्ह सारथिन्ह जोते॥ सुंदर सकल अलंकृत सोहे। जिन्हहि बिलोकत मुनि मन मोहे॥ ३ ॥
अर्थ
अगणित श्यामकर्ण घोड़े थे। उनको सारथियों ने उन रथों में जोत दिया है, जो सभी देखने में सुन्दर और गहनों से सजाये हुए सुशोभित हैं, और जिन्हें देखकर मुनियों के मन भी मोहित हो जाते हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २९९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।
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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान