तेहि के रचि पचि बंध बनाए

चौपाई २, दोहा २८८ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

तेहि के रचि पचि बंध बनाए। बिच बिच मुकुता दाम सुहाए॥ मानिक मरकत कुलिस पिरोजा। चीरि कोरि पचि रचे सरोजा॥ २ ॥

अर्थ

उसी नागबेलि को रचकर और पच्चीकारी करके बन्धन (बाँधने की रस्सी) बनाये। बीच-बीच में मोतियों की सुन्दर झालरें हैं। माणिक, पन्ने, हीरे और फिरोजे, इन रत्नों को चीरकर, कोरकर और पच्चीकारी करके, इनके [लाल, हरे, सफेद और फिरोजी रंग के] कमल बनाये।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २८८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।

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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान