प्रेम प्रफुल्लित राजहिं रानी

चौपाई २, दोहा २९५ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

प्रेम प्रफुल्लित राजहिं रानी। मनहुँ सिखिनि सुनि बारिद बानी॥ मुदित असीस देहिं गुर नारीं। अति आनंद मगन महतारीं॥ २ ॥

अर्थ

प्रेम में प्रफुल्लित हुई रानियाँ ऐसी सुशोभित हो रही हैं जैसे मोरनी बादलों की गरज सुनकर प्रफुल्लित होती है। बड़ी-बूढ़ी [अथवा गुरुजनों की] स्त्रियाँ प्रसन्न होकर आशीर्वाद दे रही हैं। माताएँ अत्यन्त आनन्द में मग्न हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २९५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।

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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान