जद्यपि अवध सदैव सुहावनि

चौपाई ३, दोहा २९६ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

जद्यपि अवध सदैव सुहावनि। राम पुरी मंगलमय पावनि॥ तदपि प्रीति कै प्रीति सुहाई। मंगल रचना रची बनाई॥ ३ ॥

अर्थ

यद्यपि अयोध्या सदा सुहावनी है, क्योंकि वह श्रीरामजी की मङ्गलमयी पवित्र पुरी है, तथापि प्रीति-पर-प्रीति होने से वह सुन्दर मङ्गल-रचना से सजायी गयी।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २९६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।

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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान