मंगल द्रब्य मनोहर नाना
मंगल द्रब्य मनोहर नाना
चौपाई ३, दोहा २९७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
मंगल द्रब्य मनोहर नाना। राजत बाजत बिपुल निसाना॥ कतहुँ बिरिद बंदी उच्चरहीं। कतहुँ बेद धुनि भूसुर करहीं॥ ३ ॥
अर्थ
अनेक प्रकार के मनोहर माङ्गलिक पदार्थ शोभित हो रहे हैं और बहुत-से नगाड़े बज रहे हैं। कहीं भाट विरुदावली (कुलकीर्ति) का उच्चारण कर रहे हैं और कहीं ब्राह्मण वेदध्वनि कर रहे हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २९७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।
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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान