कुसल प्रानप्रिय बंधु दोउ अहहिं कहहु
कुसल प्रानप्रिय बंधु दोउ अहहिं कहहु
दोहा २९० · बालकाण्ड
दोहा पाठ
कुसल प्रानप्रिय बंधु दोउ अहहिं कहहु केहिं देस। सुनि सनेह साने बचन बाची बहुरि नरेस॥ २९० ॥
अर्थ
हमारे प्राणों से प्यारे दोनों भाई, कहिये सकुशल तो हैं और वे किस देश में हैं ? स्नेह से सने ये वचन सुनकर राजा ने फिर से चिट्ठी पढ़ी।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का दोहा २९० है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।
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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान