जे जल चलहिं थलहि की नाईं
जे जल चलहिं थलहि की नाईं
चौपाई ४, दोहा २९९ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जे जल चलहिं थलहि की नाईं। टाप न बूड़ बेग अधिकाईं॥ अस्त्र सस्त्र सबु साजु बनाई। रथी सारथिन्ह लिए बोलाई॥ ४ ॥
अर्थ
जो जल पर भी स्थल की तरह चलते हैं। वेग की अधिकता से उनकी टाप पानी में नहीं डूबती। अस्त्र-शस्त्र और सब साज सजाकर सारथियों ने रथियों को बुला लिया।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २९९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
जनक का दूत, बारात का प्रस्थान