असन सयन बर बसन सुहाए
असन सयन बर बसन सुहाए
चौपाई ४, दोहा ३०४ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
असन सयन बर बसन सुहाए। पावहिं सब निज निज मन भाए॥ नित नूतन सुख लखि अनुकूले। सकल बरातिन्ह मंदिर भूले॥ ४ ॥
अर्थ
और जहाँ बारात के सब लोग अपने-अपने मन की पसंद के अनुसार सुहावने उत्तम भोजन, बिस्तर और वस्त्र पाते हैं। मन के अनुकूल नित्य नये सुखों को देखकर सभी बरातियों को अपने घर भूल गये।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३०४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।
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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान