लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा

चौपाई ३, दोहा ३०३ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा। सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा॥ मृगमाला फिरि दाहिनि आई। मंगल गन जनु दीन्हि देखाई॥ ३ ॥

अर्थ

लोमड़ी फिर-फिरकर (बार-बार) दिखायी दे जाती है। गायें सामने खड़ी बछड़ों को दूध पिलाती हैं। हरिनों की टोली [बायीं ओर से] घूमकर दाहिनी ओर को आयी, मानो मंगलगण ने ही दिखा दिये हों।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३०३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।

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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान