तिन्ह सब छयल भए असवारा
तिन्ह सब छयल भए असवारा
चौपाई ४, दोहा २९८ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
तिन्ह सब छयल भए असवारा। भरत सरिस बय राजकुमारा॥ सब सुंदर सब भूषनधारी। कर सर चाप तून कटि भारी॥ ४ ॥
अर्थ
उन सब घोड़ों पर भरतजी के समान अवस्थावाले सब छैल-छबीले राजकुमार सवार हुए। वे सभी सुन्दर हैं और सब आभूषण धारण किये हुए हैं। उनके हाथों में बाण और धनुष हैं तथा कमर में भारी तरकस बँधे हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २९८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।
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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान