कोटिन्ह काँवरि चले कहारा

चौपाई ४, दोहा ३०० के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

कोटिन्ह काँवरि चले कहारा। बिबिध बस्तु को बरनै पारा॥ चले सकल सेवक समुदाई। निज निज साजु समाजु बनाई॥ ४ ॥

अर्थ

कहार करोड़ों काँवरें लेकर चले। उनमें अनेकों प्रकार की इतनी वस्तुएँ थीं कि जिनका वर्णन कौन कर सकता है। सब सेवकों के समूह अपना-अपना साज-समाज बनाकर चले।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३०० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।

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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान