अगवानन्ह जब दीखि बराता

चौपाई ४, दोहा ३०५ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

अगवानन्ह जब दीखि बराता। उर आनंदु पुलक भर गाता॥ देखि बनाव सहित अगवाना। मुदित बरातिन्ह हने निसाना॥ ४ ॥

अर्थ

अगवानी करनेवालों को जब बारात दिखाई दी, तब उनके हृदय में आनन्द छा गया और शरीर रोमांच से भर गया। अगवानों को सज-धज के साथ देखकर बरातियों ने प्रसन्न होकर निसान बजाये।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३०५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
जनक का दूत, बारात का प्रस्थान