सब कें उर निर्भर हरषु पूरित

दोहा ३०० · बालकाण्ड

दोहा पाठ

सब कें उर निर्भर हरषु पूरित पुलक सरीर। कबहिं देखिबे नयन भरि रामु लखनु दोउ बीर॥ ३०० ॥

अर्थ

सबके हृदय में अपार हर्ष है और शरीर पुलक से भरे हैं। [सबको एक ही लालसा लगी है कि] हम श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाइयों को नेत्र भरकर कब देखेंगे।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का दोहा ३०० है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।

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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान