बाँधें बिरद बीर रन गाढ़े

चौपाई १, दोहा २९९ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

बाँधें बिरद बीर रन गाढ़े। निकसि भए पुर बाहेर ठाढ़े॥ फेरहिं चतुर तुरग गति नाना। हरषहिं सुनि सुनि पनव निसाना॥ १ ॥

अर्थ

शूरता का बाना धारण किये हुए रणधीर वीर सब निकलकर नगर के बाहर आ खड़े हुए। वे चतुर अपने घोड़ों को तरह-तरह की चालों से फेर रहे हैं और भेरी तथा नगाड़े की आवाज सुन-सुनकर प्रसन्न हो रहे हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “जनक का दूत, बारात का प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २९९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक के दूत के संदेश पर दशरथजी की बारात का जनकपुर के लिए हर्षपूर्ण प्रस्थान का वर्णन है।

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जनक का दूत, बारात का प्रस्थान